इंटरनेट पर देशभक्त नहीं हुए तो क्या खाक रिपब्लिक डे मनाया!

Posted by Anurag in Hindi, Politics
January 26, 2017

सर्वप्रथम गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

सवेरे झंडा-रोहण देखने पास के सरकारी स्कूल चला गया था! कोई नेताजी आये हुए थे! भाषण सुना, लड्डू खाए और परेड देखा! भाषण सुनते समय कक्षा एक-दो के बच्चों को गणतंत्र का अर्थ समझाते हुए नेताजी को हो रही मुश्किल पर थोड़ी दया आई और थोड़ी हंसी. सच है, उस उम्र में गणतंत्र, संविधान इत्यादि भारी-भड़कम शब्द कहाँ समझ आते हैं!

उम्मीद है कि सभी पाठक स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के बीच का अंतर समझते होंगे! यह अंतर स्थापित करना इसलिए आवश्यक है क्योंकि मेरे कुछ मित्र-गण फेसबुक पर एक दूसरे को सवेरे अंग्रेजों पर मिली ‘जीत’ पर बधाई देते हुए दिखे!

उनका जज्बा देख कर दो मिनट के लिए मैंने भी अपनी इतिहास की पढ़ाई दरकिनार कर मान लिया कि सचमुच भारत 26 जनवरी को ही आज़ाद हुआ होगा!

मूलभूत अंतरों के बावजूद, कुछ एक समानताएं भी हैं दोनों त्योहारों के बीच जो कई सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं! जैसे-जैसे बरस बीत रहे हैं, ये समानताएं रस्म बनती जा रही हैं और इन रस्मों का पालन करना देशभक्ति का एक मानक!

मसलन देशभक्ति गीत!

माध्यम बदल गये हैं, यू-ट्यूब का ज़माना है पर गाने वही पुराने दर्जन भर हैं! ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’, ‘वन्दे मातरम्’, ‘संदेसे आते हैं’, ‘मेरे देश की धरती’ वगैरह! मैं भी स्कूल से लौटते वक्त एक महंगे वातानुकूलित सैलून में पूरा का पूरा ‘देशभक्ति playlist’ सुन कर ही निकला!

निकलते वक़्त चौक पर सौ ग्राम जलेबी खा कर एक और कोरम पूरा हुआ! सामने एक बूढ़ी मां ने भीख मांगी और देने का मूड भी हुआ पर भिखारी अभी तक कैशलेस नहीं हुए हैं न! न कार्ड मशीन थी उसके पास, न paytm accept करने को तैयार थी! कैश ऐसे ही तो नहीं लुटा सकते! जलेबी देने की कोशिश की तो उसने यह कहकर मना कर दिया कि बेटा आज गुरुवार का व्रत है!

फिर वहाँ से सिनेमा का प्रोग्राम बन गया! ज़रूरी भी था क्योंकि अभी तक नये साल में राष्ट्रगान पर सिनेमा हॉल में तन कर खड़े होने का सौभाग्य नहीं मिला था! 2016 में यह भी एक आवश्यक मानक बन गया है देशभक्ति दर्शाने का!

इधर आजकल चुनाव का माहौल है और भिन्न-भिन्न नेताओं के विशालकाय पोस्टरों से शहर पटा पड़ा है! सिनेमा हाल के सामने भी एक पोस्टर था. नेताजी फोटो में iphone पर किसी से बात करते हुए बड़े ही खुश दिख रहे थे। उनके बड़े से चित्र के बगल में दस अलग-अलग लोगों के छोटे-छोटे चित्र थे!

पोस्टर की नाक के ठीक नीचे एक औरत बड़ी ही दयनीय हालत में बैठी थी! उसके दो बच्चे अपने नन्हे हाथों से बार-बार नाक पोंछ रहे थे! उन्हें न अपनी नग्नता की फिकर थी, न गरीबी की और न ही भूख की, जो बेशर्मी से उनके चिपटे पेट से झाँक रही थी!

नेता उनके तो घर जाते हैं, रहते हैं, डिनर, लंच करते हैं, जिनके घर होते हैं. पर जिनके घर नहीं, जो फुटपाथ पर रहते हैं, उनसे वोट मांगने का, साथ फुटपाथ पर सोने का दुस्साहस शायद नहीं कर पाते!

बहरहाल, घर लौट कर फेसबुक पर मैंने भी एक पोस्ट डाला और DP चेंज की। इस इंटरनेट के ज़माने में अगर आप फेसबुक पर देशभक्त नहीं हुए तो लानत है ऐसी भारतीयता पर। इस बात का खास ध्यान रखा कि DP में तिरंगा dominantly दिख रहा हो! twitter पर #RepublicDay लगा कर एक ट्वीट लिखा और instagram पर बुर्ज खलीफा की तिरंगे वाली फोटो फ़िल्टर करके शेयर की।

अब मैं और क्या ही कर सकता हूँ? और ज्यादा भारतीय कैसे दिखूं, कैसे बनूँ? फिलहाल तो indianness लेवल इतना ज्यादा है कि मैं Dragonball Z के सुपर-scion mode में आ चुका हूँ।

सूरज सर के पार हो चला है, अब शायद बिस्तर में बैठ कर कोई विदेशी sitcom देखूँगा! आखिर केवल Republic Day ही नहीं है, holiday भी है।

आधे लोग long weekend मनाने गोवा गये हैं। सुना है वहाँ 26 जनवरी को भी सूखा नहीं पड़ता, शराब ‘मैनेज’ हो जाती है! जिनके पास गोवा जाने के पैसे नहीं हैं, वे दुकान वालों से ब्लैक करने की कोशिश में लगे हैं। सुबह सुबह बीवी को पीट कर, हाथ से पैसे छीन कर, दृढ़ निश्चय कर के निकले हैं कि खाली हाथ नहीं लौटेंगे। कतार लम्बी है। आखिर केवल Republic Day ही नहीं है, Dry Day भी है।

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