जनता की आवाज सुने

Posted by Madhu Bhagat
January 14, 2017

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पाँच राज्यो में चुनावी बिगुल बज चुका हैं । इसकी तैयारी जोर शोर से चल रही हैं । कही कोई कमी नही छोड़  रहे है हमारे नेता । हर कोई प्रचार-प्रसार में जुट गया है । लेकिन चुनावो की सरगर्मी में मतदाताओ का आक्रोश भी नेताओ के सामने उभर कर आ रहा हैं । आलम ये हो चूका है कि नेता जनता के बीच में आने पर कतरा रहे है । जनता से नेता सत्ता में आने के लिए न जाने कितने वादे करते हैं ,लेकिन जैसे ही वे सत्ता में आ जाते है, तो वे उन वादों को जंग लगने के लिए छोड़ देते हैं । जब उन्हें कुर्सी मिलती है, तो उन्हें याद नही रहता, आखिर क्या वादे किये थे उन्होंने जनता से ?आखिर कितने गरीबो के आसुओ को मुस्कान में बदलने का वादा किया था, सिवाय इसके की आगामी चुनाव में किस तरह वादे से लोगो को प्रभावित करना हैं । इन दिनों विधानसभा चुनावो की रैली हो रही हैं,जिसमे नेता जनता के बीच आ रहे हैं और लोग अपना गुस्सा जूते और पत्थर फेंककर जाहिर कर रहे है। बीते बुधवार को पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल पर एक शख्स ने जूता फेक दिया। जोकि उनकी आंख पर जा कर गिरा। वह घायल हो गए । इस साल नए साल की शुरुआत ही जनता के जूता फेकने से हुई । ये जूता अरविन्द केजरीवाल पर एक शख्स ने मारा, और उन्होंने इसे नरेंद्र मोदी का पिट्ठू मान लिया। उसके बाद यानी 2 दिन पूर्व ही बादल के बेटे और सुखवीर सिंह बादल पर फाजिल्का में पथराव हुआ। पिछले साल पर अगर नजर डाले तो देश के मफलर मैन यानी अरविन्द केजरीवाल दो बार हमला हो चूका हैं,कभी स्याही से, तो कभी जूते से। अगर इतिहास के पन्नों को पलटे तो ऐसी घटनाएं पहले भी हो चुकी है,और इसके शिकार पूर्व बिहार मुख्यमंत्री जीतन राम माझी,राहुल ग़ांधी, वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी,उमर अब्दुल्लाह और पूर्व मनमोहन सिंह हो चुके हैं । कुर्सी पर बैठे नेता जनता की आवाज को नही सुनते,वह भूल जाते है कि जनता की वजह से ही वह इस कुर्सी पर बैठे है। अपनी  शान में रहने वाले ये नेता आम लोगो की आवाज  को या तो कुचल दी है या नही सुनते । मजबूरन जनता को ऐसे कदम उठाना पड़ते है। ऐसी वारदात भविष्य में न हो, तो नेताओ को जनता की आवाज और उनसे किये वादों को नही नजरअंदाज करना चाहिए ।

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