ज्ञान भी भ्रष्टाचार को जनम देता हैं और आप इससे सवाल भी नही कर सकते बस यही कहिये की परमात्मा के सामने तो हम लाचार हैं. (भाग २)

Posted by हरबंश सिंह
January 1, 2017

Self-Published

यकीन मानिये, अगर में कहूं की हमारी व्यवस्था परमात्मा की एजेंट हैं तो आप इसे सच नहीं मानेंगे. लेकिन हकीकत हैं,पुलिस स्टेशन में, अदालतों में, सरकारी दफ्तरों में, इत्यादि जगह पर अक्सर हमें हमारे ईष्ट, भगवान, खुदा, गुरु याद आते हैं. क्युकी ये व्यवस्था हमें कमजोर होने का एहसास कराती हैं आप यहाँ किसी से भी सवाल नही कर सकते लेकिन भगवान के सामने प्रार्थना करने से आपको यहाँ मनाही नही हैं. और अगर आप यहाँ इस व्यवस्था में कुचल दिये जाये, मार दिये जाये तो आप के रिश्तेदार, दोस्त यही कहेगे “ये तो परमात्मा की मर्जी थी”. लेकिन यही दोस्त इस व्यवस्था से किसी भी तरह से कोई सवाल या इसके खिलाफ विद्रोह नहीं करेंगे. दबी ज़ुबान में कहूं तो कोई नहीं चाहता की वह भी इतिहास बन जाये ओर कहा जाये भगवान की मर्जी थी.

इसी के चलते में भी अपने भगवान श्री गुरु नानक जी के सामने खड़ा होकर अरदास कर रहा था. अब मेरे ज़ेहन में उस बुजुर्ग डॉक्टर की मानसिकता की पूरी तस्वीर पूर्ण रूप से दिख रही थी. में किसी भी कीमत में नवराज को, यानिके मेरी जिंदगी को उसके हाथों में नही देना चाहता था. लेकिन करू तो क्या करू,अनजान शहर में लोग भी अनजान थे. अब यकीन भी तो नही रहा था, बुजुर्ग अगर इस हद तक गिर सकता हैं तो हर किसी की मानसिकता पर तो शक होना लाजमी ही हैं. थोड़ा सा खुद में आत्म विश्वास पैदा कर हमारे घर की मालकिन से बात की और उनके कहने पर हमने तय किया की हम दूसरे डॉक्टर से इलाज करवायेगे. में बैंक गया एटीएम से जितने हो सकते थे पैसे निकाल कर ले आया. घर पर भी फ़ोन कर दिया की कुछ लोग यहाँ हमारे पास आ जाये क्युकी अगर नवराज को दाखिल कर लिया गया तो किसी के साथ होने की जरूरत ज़रुर होगी. हम एक्टिवा पर बैठे और चलने ही वाले थे, की घर की मालकिन और बाकी सारी महिलाये इस तरह से खड़ी थी की कुछ अनर्थ हो सकता हैं. शायद ये मेरे मन का डर भी हो सकता था जो सामने आकर मेरे साथ संवाद कर रहा था. शायद में ही था जो ना चाहकर भी सोच रहा था की कुछ अनर्थ हो सकता हैं.

हम मालकिन के बताये पत्ते पर जा ही रहे थे लेकिन मन किया की रास्ते में एक सरदार जी से बात करू जिनकी रास्ते में एक फर्नीचर की दुकान थी. अनजान थे, तो खुल कर बात नही कर पा रहा था. लेकिन फिर हिम्मत कर, बात कर ही ली और पूरा दर्द बता दिया. उन्होने मुझे कुछ नहीं कहा, ना ही उस बुजुर्ग डॉक्टर के बारे में और ना ही किसी और के बारे में. बस कहा“तुम डॉक्टर गुप्ता के पास चले जाओ. हमारे फैमिली डॉक्टर हैं और चाइल्ड स्पेशलिस्ट हैं.”. हम अब और दुविधा में हो गये थे,कहा जाये मालकिन के बताये डॉक्टर के पास या डॉक्टर गुप्ता के पास. लेकिन दोनों ही डॉक्टर के क्लिनिक बस एक दुकान छोड़ कर पास पास में उस सडक पर थे जो पुराने गुडगाव को गुडगाव रेलवे स्टेशन से जोड़ता हैं. हम वहा पोहचै डॉक्टर गुप्ता की क्लिनिक के सामने लंबी सी लाइन लगी थी लेकिन दूसरे डॉक्टर के यहाँ कोई नहीं था. अभी कोई भी डॉक्टर अपनी क्लिनिक में नहीं पोहचा था, हम मालकिन के बताये डॉक्टर के वहा अपना नाम लिखा दिया लेकिन मन था की उस लाइन से संवाद करू की यहाँ इतनी भीड़ क्यों हैं. बात की तो किसी अनजान ने कहा “इस डॉक्टर के हाथ में जस हैं, ये एडमिट नहीं करता, बस २ मिनिट देखता हैं और दवाई दे देता हैं. बस फिर क्या आप का बच्चा एक दम हंसता खेलता हो जाता हैं.” हमारे लिये हालात अब और भी खराब हो रहे थे, नवराज को उलटी और दस्त के साथ साथ अब बुखार भी हो रहा था. हमारे लिये फैसला लेना आसान नही था की किस डॉक्टर से नवराज की मैडिकल जांच करवाये. में और नवराज की माँ एक दूसरे को दिलासा दे रहे थे की हम बिखर ना जाये. बस यही वजह थी की आशु आख के  भीतर ही समा जाते थे बस बाहर नही आ रहे थे.

उस दिन मालकिन के बताये डॉक्टर साहिब नहीं आया लेकिन डॉक्टर गुप्ता आ गये, हमने हिम्मत कर डॉक्टर साहिब को नवराज दिखा दिया और उन्होने सिर्फ दो-तीन सिरप लिख कर दी. कहा “६-६ घंटे के अंतराल में देते रहना. अगर फिर भी उलटी ना रुके तो ३-३ घंटे के अंतराल में ये सिरप ओंदेम देते रहना. कुछ भारी खाने को मत देना, दूध मे भी पानी मिलकर और मलाई बिना का देना. कल सुबह फिर दिखा जाना”. मैने पूछा नहीं की क्या एडमिट करने की जरूरत हो सकती हैं. इतनी मरीजो की लाइन देख कर कुछ भरोसा हो रहा था. हम घर गये, नवराज को दवाई दी. थोड़ा सा दूध भी गरम कर के दिया. अभी भी नवराज की दस्त नहीं रुक रही थी. और हमने ३ घंटे बाद फिर से ओंदेम दे दी. रात को २ बजे के साथ नवराज की हालात में कुछ सुधार आया. और सुबह होते होते नवराज का बुखार भी उत्तर गया और उसकी उलटी और दस्त में भी सुधार आ रहा था. उस रात हम सोये नहीं थे लेकिन मुझे मानो अब जीने की फिर से तमन्ना हो रही थी. हम फिर अगली सुबह डॉक्टर साहिब के पास गये उन्होने वही दवाई शुरू रखी और अब २ दिनों के बाद बुलाया था. आते आते उस अनजान सरदार जी का भी शुक्रिया कर आये और नवराज की तस्वीरे भी फोटो स्टूडियो में खिंचवा ली थी. शाम होते होते सब ठीक हो रहा था. और दूसरे दिन नवराज पहले की तरह स्वस्थ हो चूका था.

मैने सोचा पता करू की ये ५० रुपये के भीतर आने वाली ओंदेम की दवाई में ऐसा क्या हैं की नवराज बिना एडमिट किये ठीक हो गया. मैडीकल स्टोर से बात की तो पता चला की ये सबसे बेहतरीन दवाई हैं उलटी और दस्त को रोकने के लिये और सभी डॉक्टर यही दवाई देते हैं बच्चो को. लेकिन उस बुजुर्ग डॉक्टर ने ये दवाई क्यों नहीं दी थी ? मन तो था की एक बार बात करके आऊ लेकिन अनजान शहर में अनजान विद्रोह नही करना चाहता था. में भी इस हादसे को परमात्मा की मर्जी कहकर ही आगे निकल आया, मेरे लिये बहुत हैं की नवराज ठीक था लेकिन इन दिनों  में ३ दिन ऑफ़िस नहीं गया, कुल मिलाकर हम ३६ घंटे लगातार जागते रहे और इसी बीच नवराज को हो रही परेशानी से हम हर पल मर रहे थे. मेरे माँ-बाप और रिश्तेदार गुरुद्वारा साहिब जाकर नवराज की तंदुरूस्ती की अरदास कर रहे थे. उस दिन गुडगाव के ही एक बड़े से अस्पताल की बिल्डिंग के सामने खड़ा हो कर देख रहा था की यहाँ किस तरह जिंदगी बिखर जाती होगी ? किस तरह डॉक्टर जो की हमारा भगवान हैं लेकिन कही इसमें शैतान ने जन्म ले लिया तो हमारा माई-बाप कोन होगा ? हमारी अज्ञानता के चलते जो कत्ल अस्पताल में होते होंगे उन्हें कही भी अपराध का दर्जा नही दिया जाता होगा बस परमात्मा की मर्जी कहकर लोग आगे बड़ जाते होंगे. शायद आज भी कई बच्चे नवराज जैसे हमारी अज्ञानता के कारण युही अस्पताल में दाखिल होंगे. आखिर हम ख़ुदकुशी के सिवा कर भी क्या सकते हैं ? लेकिन उस दिन मुझे अपना गुस्सा तो कही निकालना था तो बस में एक समान्य नागरिक बन कर इस व्यवस्था को मन ही मन कोष रहा था और में कर भी क्या सकता था ? जय हिंद.

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