ज्ञान भी भ्रष्टाचार को जनम देता हैं और आप इससे सवाल भी नही कर सकते बस यही कहिये की परमात्मा के सामने तो हम लाचार हैं. (भाग ३)

Self-Published

२०११, फेबुअरी का महीना दूसरे बच्चे के जन्म से पहले अस्पताल में खड़े थे, ये एक अनजान शहर और एक अनजान डॉक्टर, लेकिन डॉक्टर के रूप इस समय अगर एक महिला हो तो आत्म विश्वास कही बड़ जाता हैं. तो इस महिला डॉक्टर ने हमारी पत्नी जी की जाँच कर सब कुछ अच्छा हैं, कह कर भरोसा दिया और हम वापस घर आ गये. हाँ,डॉक्टर साहबा ने कुछ ताकत की दवाई लिख दी और कुछ खान पान के बारे में नसीयत भी दी, जो इस समय अमूमन डॉक्टर देते हैं. लेकिन,अभी नवराज के रूप में एक आलोद के होने से हमारे परिवार को सब कुछ पता था, की क्या क्या दिशा निर्देश को फॉलो करना हैं. लेकिन,2010 में नवराज जिस तरह डॉक्टर की लापरवाही से बीमार हो गया था और बड़ी मुश्किल ये ठीक हुआ था, उसी के चलते हम यही दुआ कर रहे थे की इस बार हमें कोई खराब अनुभव ना हो.

तीसरे महीने पर, अमूमन डॉक्टर मैडिकल स्कैन टेस्ट करवाते हैं, इसी समय ये पत्ता चलता हैं की बच्चे के दिल की धडकन बनी हैं या नही. में इसलिये जानता ही क्युकी, नवराज के पहले, साल २००७ और २००८ में दोनों बार तीसरे महीने में ही मैडिकल स्कैन से पता चला था की बच्चे के दिल की धडकन नही बन पा रही हैं. मतलब शरीर हैं लेकिन जान नही. इस के चलते माँ की जान को भी खतरा हो सकता हैं इसके चलते डॉक्टर बच्चा गिरा देते हैं और इसी के तहत, डॉक्टर द्वारा एबॉर्शन करवाना पड़ा था. आप सोच सकते हैं, किस दुःख की पीड़ा से होकर हम और हमारा परिवार गुज़रा होगा. आज भी वह दिन याद हैं, बस इसी के तहत आज यानी के मई महीने में हमारी महिला डॉक्टर ने इसी मैडिकल स्कैन के लिये एक पर्ची लिख दी और बता दिया की हमें किस लेबोरेटरी में  सुबह और बिना खाये पिये जाना हैं.  हमारी आस्था के अनुसार उस परमात्मा को नमन कर हम चले गये, मन में डर था और कुछ ही पल में टेस्ट के बाद हमें रिपोर्ट मिल गई. रिपोर्ट में लिखे माप-दंड के हिसाब से सब कुछ ठीक था. और इसी के फलस्वरूप शाम को, हम डॉक्टर साहबा को रिपोर्ट दिखाने चले गये. डॉक्टर जी ने कहा “सब कुछ ठीक हैं लेकिन बच्चे की एक किडनी थोड़ी छोटी थी और दूसरी बिलकुल समान्य. ये दवाई लिख देती हूं, लेकिन एक महीने में फिर से स्कैन करवायेगे, इसके पश्चात ही कुछ फैसला ले पायेगे.” मेरी हिम्मत नही थी ये सवाल पूछने की “अब ये एक महीने बाद कौन सा फैसला ?”.अब आप समझ रहे होंगे की हम पर क्या बीत रही थी ?

उस दिन अस्पताल तो अकेले ही गये थे तो घर आकर कह दिया की“डॉक्टर साहबा नही मिली सुबह बात हो पायेगी.” में रात के समय किसी भी तरह से परिवार को परेशान नही करना चाहता था. लेकिन नजरों को नही मिला पा रहा था, तो मेरी माँ और पत्नी जी समझ गई थी,लेकिन उन्हें सुबह ही बताया. लेकिन इस बार में मानसिक रूप से मजबूत था. मन में सवाल थे ? तीन महीने के गर्भ में पल रहे सीसू की किस तरह जाँच से पता चल सकता हैं कि एक किडनी छोटी हैं और दूसरी सामान्य ? उसी दिन ऑफ़िस गये, गूगल किया और सारी जानकारी इकठी की, पता चला, किसी किडनी का छोटा होना एक सामान्य बात हैं, इसे कोई खतरा नही हैं. लेकिन मन में शक था, ये इसी तरह हैं की आप का एक हाथ जिसे ज्यादा काम किया जाता हैं हो सकता दूसरे हाथ से ज्यादा सक्षम हो और बहुत मामूली ये दूसरे हाथ से ज्यादा बड़ा हो, इतना सूक्ष्म की आप को पता भी ना चले की कुछ फर्क हैं. कुछ और जानकारी इकट्ठा करने के बाद, थोड़ा सा आत्म विश्वास जगा पाये और इस बात को तय कर लिया था की अब आगे की जाँच में डॉक्टर को बदल देंगे. खासकर, में अनजान शहर में इस अनजान डॉक्टर के पास अब और नही जाना चाहता था.

तो तय किया, ये शहर ही छोड़ देगें और गाँव चलेगे, में यहाँ किसी पीजी में रह लुंगा. फिर क्या, बाधा सारा सामान और सबसे पहले अपने गाव आकर, फिर से नये सिरे से मैडिकल स्कैन करवाई, तो पता चला कुछ ऐसा नही हैं कि चिंता की जाये, सब कुछ सामान्य हैं. इसके विपरीत यहाँ जानकार ने बताया की “बच्चे का विकास थोड़ा ज्यादा ही हैं और इसका वजन भी थोड़ा मामूली ज्यादा हैं, इसके तहत हो सकता हैं की किसी प्रकार की जांच में कोई मामूली अंदेशा रह गया हो.” इसकी पश्चात थोड़े दिनों बाद,  फिर अहमदाबाद आ गये. समय अनुसार बच्चे का जन्म हुआ, सब ठीक था. बच्चे का वजन कुछ ३.५ किलो से ज्यादा था. हमने नामकरण साहेब सिंह रखा. आज कुछ ही समय पहले, साहेब का 5वां जन्म दिन पूरे हर्ष और उल्लास के साथ मनाया हैं. आज साहेब कराटे भी खेल रहा हैं और उसी जोश से मैदान में दोड भी लगाता हैं. उसकी एक किक मेरे शरीर को झगझोड़ देती हैं. आज साहेब पूरी तरह तंदुरूस्त हैं. दौड़ में फ़र्स्ट आता हैं. सब कुछ सामान्य हैं.

लेकिन आज भी सोचता हूं, की उस दिन डॉक्टर साहबा किस फैसले की बात कर रही थी. हो सकता हैं ये कुछ दवाई तक सीमित हो, शायद कुछ और मेडिकल स्कैन करवाने हो, या अपने हॉस्पीटल का बिल बढ़वाना हो, लेकिन इस से भी ज्यादा कुछ और हो सकता था ?. आज यहां इसलिये लिख रहा हु, की हम, तो थोड़ी सी बुद्धिमानी और मुस्तैदी से बच गये, हां, मुझे कुछ समय तक  पीजी में रहना पड़ा, हमें उसी समय काल में ना चाहते हुये भी कुछ 1400 किलो मीटर तक का रेलमार्ग सफर करना पड़ा, लेकिन आज हम खुश हैं. यहाँ अपने व्यक्तिगत अनुभव से ये ज़रुर कहना चाहूंगा की ये मैडिकल लैबोरेट्री, अस्पताल आज एक मैडिकल बिल बनाने में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं ना की डाक्टरी पेशे को एक सेवा के रूप में, तो हम सभी को उस मानसिकता का त्याग करना पड़ेगा, जो अस्पताल में हो रही मोत को परमात्मा की मर्जी समझ कर भूल जाता हैं. कई हादसे या शरारत या लापरवाही के चलते भी गंभीर प्रणाम आये होंगे. इसी के तहत अब थोड़ी सी मुस्तैदी रखनी पड़ेगी. की मैडिकल जांच में कौन सी दवाई दी जा रही हैं और कौन सा टेस्ट हो हैं, और इस प्रयास में हमारा सबसे बड़ा मित्र गूगल ही हो सकता हैं. जय हिंद.

 

नोट: मेंने यहा, शहर का या उस महिला डॉक्टर का नाम नही लिखा और ना ही में लिखना चाहता हु, में अपने इस अनुभव से उस मानसिकता की बात कर रहा हु जो मरीज को एक मैडिकल बिल या लाभार्थ ही देखती हैं. ये हर शहर में मौजूद हैं, इससे बचने की जरूरत हैं.

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