डिजिटल इंडिया के जंग लगे वेबसाइट

Posted by Kumar Gaurav
January 25, 2017

Self-Published

‘डिजिटल इंडिया’ प्रधानमंत्री ‘नरेन्द्र मोदी’ का विज़न रहा है। इसका एक लक्ष्य सबके बीच सूचना की पहुंच को सुनिश्चित करना भी है। इसके लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है, जिसमें डिजिटल उपकरणों के देश में निर्माण से लेकर सबको डिजिटल साक्षर बनाने का लक्ष्य शामिल है।

वेबसाइट एक सशक्त एवं संभावनाओं से भरा माध्यम है। लेकिन सरकारी वेबसाइटों पर कोई जानकारी खोज पाना समुद्र से मोती निकाल लाने जैसा काम रहा है, कुछ वेबसाइटों को छोड़कर। जब हम सरकारी वेबसाइट पर जाते हैं, यह काफी देर से खुलती है और अगर खुल भी जाए तो वह परचून की दूकान जैसी लगती है। जहां हर सूचना बिखरी औऱ बेतरतीब तरीके से रख दी गई हो। अगर कोई जानकारी मिल भी गई तो यह पता लगा पाना मुश्किल है कि यह ‘एक्सपायर’ है या नहीं।

कई वेबसाइट एेसी हालत में हैं, जहां कब सूचना अपडेट की गयी इसकी जानकारी नहीं है। अगर अपडेट की तारीख मिल जाए तो ज़्यादातर मामलों में यह एक्सपायर्ड होती हैं।

हर सरकार, सरकारी योजनाओं का जमकर प्रचार करती है। अखबार में, सरकारी रेडियो और टीवी चैनल पर (अब प्राइवेट एफएम और टीवी पर भी) ढिंढोरा पीटती हैं। बड़ी-बड़ी सभाओं में करोड़ो खर्च कर यह बताया जाता है कि कितने अरब-करोड़ लोगों के कल्याण के लिए खर्च किए गए। इस काम के लिए एक अलग विभाग हर राज्य और केन्द्र में है- सूचना एवं जनसंपर्क विभाग।

अभी हाल में दिल्ली की सरकार पर स्वराज इंडिया ने आरोप लगाये कि 3.15 लाख का स्टूडेंट लोन देने के लिए सरकार ने 30 लाख विज्ञापन में खर्च कर दिया। असल में यह विज्ञापन इस लोन स्कीम के बारे में नहीं था, यह सरकार के उपलब्धियों को गिनाने के लिए था। इसलिए लोगों को बस यह पता चल पाया कि सरकार की कोई स्कीम है, जिसमें लोन मिलता है। लेकिन योजना की दूरूह प्रक्रिया की जानकारी बहुत कम लोगों को हो पाती है और यह आम इंसान के लिए दूरूह ही बनी रहती है।

पिछले दिनों सरकारी योजनाओं की खबरें सुर्खियां बनी। झारखंड के गढ़वा जिले के एसडीओ दफ्तर पर एक 80 साल की महिला ने कई दिनों तक चक्कर लगाने के बाद दम तोड़ दिया। वह ठंड से बचने के लिए कंबल चाहती थी। वृद्दों के लिए सरकार की वृद्धावस्था पेंशन योजना है, शायद उन्हे मदद मिल सकती थी। फेसबुक पर यह खूब वायरल हुआ। इससे पहले एक मजदूर की अपनी पत्नी का शव ढ़ोते हुए दिखने वाली तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई। इसके बाद सरकार को सफाई देनी पड़ी थी। लेकिन ज़्यादातर मामलों में लोगों को पता नहीं चल पाता।

नोटबंदी के बाद राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने कई जनकल्याणकारी योजनाओं की घोषणा की। इनमें में से एक गर्भवती महिलाओं को मिलने वाली राशि 6,000 को देश के सभी जिलों में लागू करने की घोषणा है। अब तक यह योजना 53 जिलों में थी। इन जिलों में इसके परिणाम संतोषजनक नहीं हैं। सेंटर फार ईक्वटी स्टडीज़ नाम की शोध संस्था ने साल 2014 में चार राज्यों में इस योजना के लागू किए जाने का विश्लेषण किया और पाया कि इसमें बहुत कमी है। क़रीब 40 फ़ीसदी औरतों तक इस योजना की जानकारी पहुंची ही नहीं और जिन तक पहुंची उनमें से कई के पास अधूरी या ग़लत जानकारी थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, “झारखंड की एक महिला को लगा कि उसे मिलनेवाली धन राशि 1500 रुपए है, तो कई थी जिन्हें बताया गया था कि बच्चों के पैदा होने के बीच में तीन साल का फ़र्क होना ज़रूरी है।” योजनाओं के लिए कई शर्तें हैं। उन शर्तें को समझना भी आम महिलाओं के लिए कम मुश्किल नहीं है। समझ लेने के बाद भी उन्हे लेने के लिए तमाम तरह की औपचारिकता पूरी करते-करते होने वाला खर्चा कई बार तो मिलने वाले लाभ से भी अधिक हो जाता है।

बात हम झारखंड के विभिन्न विभागों की करते हैं। अगर आप पढ़े लिखे हैं, आपके पास डिजिटल साधन हैं और आप कंम्प्युटर चलाना भी जानते हैं। फिर भी सरकार की किसी भी योजना के बारे में आप जानकारी नहीं ले सकते हैं।

जब हम बात ई-गर्वनेंस के जरिये बिना ऑफिस के चक्कर लगाये योजनाओं का लाभ लेने की बात कर रहे हैं। वहीं झारखंड सरकार के विभागों में योजनाओं के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। कई विभागों की दो-दो वेबसाइट हैं। कुछ वेबसाइट साल 2012 के बाद अपडेट ही नहीं की गयी हैं।

झारखंड सरकार की कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग की वेबसाइट पर कोई संपर्क नहीं है, जहां शिकायत या जानकारी ली जा सकती हो।

यही हाल  स्वास्थ्य, चिकित्सा एवं परिवार कल्याण विभाग का है। यहां भी योजना के खंड में कोई जानकारी नहीं दी गई है। संपर्क की डायरेक्टरी में किसी सहायता नंबर या किसी अधिकारी नाम नहीं है, हां इस विभाग के मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी का नाम है, लेकिन उनका फोन नंबर या इमेल आइडी देने से बचा गया है।

पशुपालन एवं मत्स्य विभाग की दो-दो वेबसाइट है। कौन नयी है या कौन पुरानी यह तय कर पाना मुश्किल है। दोनों में विभाग के बारे में जानकारी के अलावा कोई अन्य सूचनाओं के अलावा कुछ नहीं है।

झारखंड सरकार के कल्याण विभाग के संपर्क डायरेक्टरी में अधिकारियों के नाम तो हैं, लेकिन किसी का फोन नहीं लगता। जिस अधिकारी से बात हुई, वो बताते हैं कि उनके रिटायर हुए 6 माह हो चुके हैं। कल्याण विभाग के अनुसार विभाग सिर्फ दो योजनाएं ही चलाता है। इसमें साल 2015 दर्ज है। जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि ये योजनाएं अभी भी चल रही हैं। मजे की बात यह है, हर पेज को खोलने में घंटो समय लग जाते हैं।

किसी योजना का पूरा लाभ लाभार्थियों को मिले इसके लिए ज़रूरी है कि उससे जुड़ी पूरी जानकारी लोगों तक पहुंचाई जाए। लेकिन इसके उलट योजनाओं के निर्देश अधिकारियों के लिए होते हैं। हालांकि यह दस्तावेज भी वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं हैं। डिजिटल क्रांति के दौर में लाभार्थी अधिकारियों के भरोसे हैं। यह अधिकारी पर निर्भर करता है कि वह कितनी और क्या जानकारी लाभार्थी को देते हैं। योजना का लाभ देने में भी और सूचना देने में भी सरकार की मनमर्जी।

 

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