दहेज़ प्रथा पूरी तरह से समाप्त क्यों नहीं होती?

Posted by prashant jatin
January 22, 2017

Self-Published

http://jhinuk11.blogspot.in/2015/06/dowry-system-in-india-are-we-deaf-to.html?m=1
दहेज़ प्रथा को पूरी तरह समाप्त हो

आज हमारे देश यूँ तो बहुत तेज़ी से विकास कर रहा है।डिजिटल इंडिया से लेकर स्वच्छ भारत अभियान तक कई विकास के कार्यक्रम चलाये जा रहे।इसके साथ ही साथ महिला शशक्तिकरण को लेकर भी कई कार्यक्रम बहुत जोर-शोर से चलाये जा रहे है चाहे वो ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ या अन्य और कई कार्यक्रम सभी पहलो का एक ही लक्ष्य है की महिलाओं में भी पुरुष के मुकाबले किसी भी तरह का भेदभाव न किया जाये और उन्हें भी वही स्थान दिया जाये जो हमारे समाज में पुरुषो को दिए जाते है। इस दिशा में हमारे समाज में काफी बदलाव देखने को भी मिला है , जिसमे बहुत सारी कुप्रथाओ का समाज ने बहिष्कार भी किया गया जो महिलाओं के अधिकारों का हनन भी किया करते थे।सती प्रथा से लेकर दहेज़ प्रथा तक को ख़त्म करने के लिए कड़े नियम-कानून भी बनाये गए।जहा अब सती प्रथा पूरी तरह से समाप्त हो चूका है ,लेकिन अगर हम दहेज़ प्रथा की बात करे तो इसकी जटिलता आज भी हमारे समाज में बनी हुई है।यूँ तो हमारे भारतीय कानून में दहेज़ लेना और देना दोनों ही अपराध मन जाता है।इसके बावजूद ये प्रथा हमारे समाज में आज भी मजूबती से अपनी जड़े फैलाये हुई है।आज भी पुरे देश में इससे जुड़े अपराधो की खबरे हमारे अखबारो और न्यूज़ चैनल में पढ़ने और देखने को मिल जाते है।अगर हम इस प्रथा से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को समझे तो ये प्रथा सबसे ज्यादा मध्यम वर्ग परिवारो में इस कुप्रथा को खुब बढ़ावा मिलता है।उच्च वर्ग और निम्न वर्ग में मध्यम वर्ग की तुलना में दहेज़ प्रथा को कम ही उपयोग में लाते है ।ये भी बात गौर करने लायक है की लड़की के परिवार की तरफ से भी ये पेशकश देना आम बात होती है।लड़के के परिवार वालो को इससे और बढ़ावा मिलता है।दोनों ही पक्षों से इस कुप्रथा को बढ़ने का पर्याप्त मौका मिलता रहता है।यहाँ तक की सम्पन्न परिवारो में भी दहेज़ लेना और देना एक आम बात है।बहुत से मामलों में महिला द्वारा ससुराल पक्ष पे दहेज़ कानून का गलत केस दर्ज़ कराने के भी बहुत से मामलें देखने को मिलते है।

हाल ही में ओलिंपिक पदक विजेता योगेश्वर दत्त की शादी काफी चर्चा का विषय बानी हुई थी जहाँ उन्होंने लड़की के परिवार से शगुन के तौर पर सिर्फ एक रुपए लिए थे।काश की हमारे समाज में भी ऐसें ही दहेज़ प्रथा को तयाग कर विवाह हुआ करें।इस कुप्रथा के खिलाफ हमे अभी भी जमीनी स्तर पर समाज को जागरूक करने की जरुरत है।

 

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