धर्म भेदभाव है छाया

Posted by Madhu Bhagat
January 19, 2017

Self-Published

अगर इतिहास के पन्नो को पलटे तो ये ज्ञात होगा कि धर्म के नाम पर भेद भाव होना आज की परंपरा नही हैं, ये तो बीते उन पलों से चला आ रहा है जब हमने अपने कदम भी दुनिया में न रखी होगी। लेकिन आज भी हम उसे भगवान का दिया तोहफा समझकर आज भी निभा रहे है । क्या यही भगवान् ने कहा है ? अगर आप अपनी आत्मा से इसका जवाब पूछे तो इसका उत्तर न में ही आएगा । भगवान ने  सभी धर्मों को एक रहने के लिए कहा, लेकिन कहा मंजूर इस मानव को ।
मैं आज आपको अपने जीवन की एक घटना बताने जा रही हूं,जो  धर्म भेद-भाव के मुद्दे से जुड़ा हैं । मैं मूल रूप से बिहार की रहने वाली हू,लेकिन करीब दस सालो से मैं हल्द्वानी यानी उत्तराखंड रह रही हूं । गर्मियों की छुट्टियो में मैं अपने गांव पूर्वी चंपारण रहने के लिए गयी । वहां हिन्दू धर्म के लोगो की अधिकता है । वहां का जन जीवन ठीक उसी तरह था, जिस तरह मैं छोड़कर गयी थी । मैं कॉफी खुश थी । जैसे ही मेरे कदम गाव की धरती पर पड़े एक आवाज आती हैं । “पापा नही मत मारिये , गलती मेरी हैं।  मारना है तो मुझे मारिये ” एक सवाल जहन में आया ये पुकार किसकी है ?और क्यों । नजर घुमाई तो इसका जवाब मिला एक लड़की,जिसके हाथ बंधे हुए हैं,और उसके आखो में आंसू हैं । साथ ही साथ एक लड़का है जिसे पीटा जा रहा हैं । लेकिन क्यों ऐसा रहा है,जो पास कड़ी महिलाओ ने बताया कि लड़का और लड़की दोनों एक दूसरे से प्यार करते थे । सिर्फ उनकी गलती ये थी कि वे एक ही धर्म के नही थे यानी लड़का मुस्लिम था और लड़की हिन्दू । क्या ये भारत है जहा ये माना जाता है कि हिन्दू मुस्लिम,सिक्ख और ईसाई सभी भाई है तो आखिरकार ये लड़ाई क्यों ?जहा एक तरफ दोनों के परिजन धर्म भेद भाव को अपने आदर्शो में महत्वपूर्ण स्थान देते है वही दूसरी तरफ वो दोनों यानि लड़का और लड़की इन सभी विचारो से पर है। परिणाम स्वरुप इस घटना का वही परिणाम निकला,जिस पर मुझे पूरा विश्वास था । खून से सने मिटटी ने पूरी घटना का सारांश बता दिया । ऐसी घटनाएं आप आये दिन सुनते रहते है। देश से धर्म भेद भाव का कीड़ा निकालने के लिए हिंदी सिनेमा ने कई फिल्मे बनाई,लेकिन परिणाम वही । इस धर्म भेद भाव से किसी को कुछ नही मिलेगा सिवाय एक दूसरे के रक्त बहाने के अलावा । एक सवाल फिर मन में दस्तक दे रहा है कि आखिर क्यों है ये धर्म भेद भाव

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