नए साल में 1 पत्रकार का प्रॉमिस

Posted by Rajan Raj
January 24, 2017

Self-Published

साल दर साल खत्म होते ही रहे हैं इसी तरह साल 2016 भी खत्म हो गया है। लोग नए साल पर कई कसमें खातें हैं, सोचता हूँ खुद से भी मै एक नया वादा कर ही दूँ। यह वो दौर है जब पत्रकारिता की परिभाषा बदल रही है। पत्रकारिता में मेरा बहुत ज्यादा इंट्रेस्ट पहले से रहा नहीं है। 2 से 3 सालों का सफ़र है जब मुझे लगा इस लाइन मे आना चाहिए। 2012 का वो साल जब मै काफी कसमकस में था की किस तरफ जाये। हालाँकि पत्रकारिता ने अपनी ओर मुझे आकर्षित किया। खैर इन सब बातों में ज्यादा वक़्त न जाया कर सीधे मुद्दे पर आना ही सही होगा। 2014 से पहले पत्रकारिता जिन कारणों से जानी जाती थी उसमें कई बदलाव हुए। इनमे से एक था पत्रकारिता का पार्टीकरण इस से पहले भी ये था पर इतना नहीं जितना 2014 मे दिखा। . नरेंद्र मोदी जी के सरकार को केंद्र मे लाने मे पत्रकारिता का बहुत अहम योगदान रहा है . चाहे वो सोशल नेटवर्किंग से हो या फिर न्यूज़ चैनल्स पर लाइव उनके भाषणों को दिखाया जाना हो .
मै इस बार तय किया हूँ की अपनी पत्रकारिता का पार्टीकरण नही होने दूंगा. आदर्श के बिना कोई भी कार्य करना शायद सही नहीं होता इसी लिए मेरे आदर्श मेरे साथ रहेगें पर उसका पार्टीकरण नहीं होगा . अगर मै भूलवश किसी राजनीतिक पार्टी का सपोर्ट भी करता हूँ तो उस पार्टी का सबसे बड़ा विरोधी मैं ही रहूँगा. ये एक समय है जहाँ एक भी ऐसा नेता या पत्रकार नही है जो अपनी पार्टी के खामियों को दिखाये या अपने पार्टी को उसके गलतियों के बारे में बताये. पत्रकार डेमोक्रेसी के लिए बहुत जरुरी है और सबसे ज्यादा जरुरी है अपनी ही पार्टी की विरोध करने वाली पत्रकारिता की. जैसा कबीर ने कहा था “निंदक नियरे राखिये”। ताकि अपने ही पार्टी को ज्यादा से ज्यादा लोकतान्त्रिक या श्रेष्ठ बनाया जा सके. मुझे खुद के पत्रकार होने पर तब सबसे ज्यादा शर्म आती है जब कोई पत्रकारिता के साथ चाटुकारिता का नाम लगाता है. शायद ये शब्द सही भी है। जबकि मै इस प्रोफेशन से जुड़ा हुआ हूँ और यह मुझे बहुत आहत करती है.चाटुकारिता कही न कही डेमोक्रेसी को खतरे मे डाल रही है। कही न कही किसी एक पार्टी को ऑटोक्रेटिक {autocratic} बनाने में लगी हुई है .अगर अपने देश में डेमोक्रेसी को बचाना हो तो पत्रकारिता का डेमोक्रेटिक होना बहुत जरुरी है .वो भी निष्पक्ष भाव से
मुझे नहीं पता की कौन सही है या कौन गलत, मेरा काम है तथ्यों को सामने लाना न की भविष्यवाणी करना… कदापि मेरा काम एक लीडर की प्रशंशा करने की नहीं है . ये काम है विद्वानों का या फिर आम जनता का ? पत्रकारिता का राजनीतिकरण एक डेमोक्रेसी के लिये खतरनाक है पत्रकार कुछ करना जाने या न जाने उसे विरोध करना सबसे पहले जानना चाहिए और वो भी सही तथ्यों के साथ . बिना तथ्य की पत्रकारिता शायद बिना ऑक्सीजन के जिन्दा रहने जैसा है .नए साल मे मेरी पार्टी मुझसे सावधान रहे और सभी पार्टी भी ।

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