पंजाब राज्य की चुनाव की तारीख की घोषणा के साथ राजनीतिक दलों ने कमर कस ली हैं और लड़ाई का बिगुल बजा दिया, मुकाबला त्रिकोण हैं, देखते हैं जीत किस की होगी ?

Posted by हरबंश सिंह
January 5, 2017

Self-Published

फाइनली, २०१७ के शुरुआत में होने वाले कई महत्वपूर्ण राज्य सरकारो के चुनाव की तारीख की घोषणा हो गई हैं, राजनीतिक गलियारों से लेकर हर सामान्य नागरिक में ये चर्चा का विषय बना हुआ हैं की पंजाब राज्य में चुनाव की तारीख ४ फेबुअरी को तय की गयी हैं जो चुनाव की तारीख घोषित होने से मसलन १ महीने बाद या यु कहैं की कुछ ३० दिनों बाद की हैं. इसी के चलते आज सुबह घर की छत पर चड कर देखा तो कुछ घरों पर अलग अलग पार्टियों की झंडिया लगी हुई थी, ये वह घर हैं जो सार्वजनिक रूप से किसी ना किसी पार्टी से जुड़े हुये हैं या किसी ना किसी रूप में किसी राजनीतिक पार्टी के समर्थन में हैं लेकिन जिन घरों पर ये झंडियाँ नही हैं, वही एक महत्वपूर्ण किरदार को निभायेगे अपना मत देकर  ये तय करेंगे के अगली राज्य सरकार की बारडोर किस राजनीतिक पार्टी की होगी. इस बार महत्वपूर्ण रूप से सियासी प्रतिद्वंदी कांग्रेस का मुकाबला पिछले १० साल से राज्य सरकार में मौजूद राजनीतिक गठजोड़ शिरोमणि अकाली दल बादल और भारतीय जनता पार्टी के बीच तो हैं ही लेकिन २०१४ के चुनावो में पंजाब से ४ लोकसभा सीट को जीत कर आम आदमी पार्टी ने भी इस बार अपनी मौजूदगी का एहसास पंजाब की राजनीतिक दलों के साथ साथ एक सामान्य पंजाबी नागरिक को भी करवाया हैं. इस बार मुकाबला त्रिकोण हैं. जमीनी स्तर पर इन तीनों का अवलोकन आज की तारीख में किया जा सकता हैं.

शिरोमणि अकाली दल बादल जिसका ९० के दशक से भारतीय जनता पार्टी के साथ राजनीतिक गठजोड़ हैं और इसी के चलते पिछले ४ राज्य सरकार के चुनाव में इस गठजोड़ ने तीन बार जीत दर्ज कर अपनी राज्य सरकार बनाई हैं. अमूमन शिरोमणि अकाली दल की पकड़ पंजाब के गाव में जमीनी स्तर तक हैं जहाँ धार्मिक रूप से सिख समाज की ही मौजूदगी हैं क्युकी शिरोमणि अकाली दल बादल सिख धर्म और समाज के हितों की रक्षा की रूप रेखा में खुद को पेश करता रहा हैं. वही शहर में सिख समाज के साथ साथ उतनी ही संख्या में हिंदू समाज की भी मौजूदगी हैं जहाँ भारतीय जनता पार्टी अपनी मौजूदगी का एहसास करवा रही हैं. इसी के चलते भारतीय जनता पार्टी के हिस्से में शहरी चुनावी हल्का या सीट  आती हैं जब की शिरोमणि अकाली दल के हिस्से में गाव का हल्का या सीट  आती हैं. लेकिन इनके पिछले पांच साल के अंतराल पर अगर नजर डाले तो ये काफी विवादास्पद रूप से घिरा हुआ रहा हैं. फिर वह चाहे गुरु ग्रन्थ साहिब जी की बेअदबी का मामला हो, इसी के चलते शांतमयी रूप से विरोध दर्ज कर रहे लोगो पर चली पुलिस गोली से दो नागरिक की हुई मोत हो गयी ,  बंदी सिख की रिहाई के चलते बापू सुरत सिंह की अनियमित रूप से जारी भूख हडताल  ये वह बंदी सिख हैं जो पंजाब के काले दोर के दौरान किसी ना किसी अपराध के चलते जेलों में बंद हैं लेकिन अपनी सजा पूरी होने के बाद भी इन्हें रिहाई नही दी जा रही. अब ये सवाल उठ रहे हैं की क्यों शिरोमणि अकाली दल बादल सिख धर्म और समाज के हितों की रक्षा नही कर पा रही खास कर जब इसकी गठजोड़ पार्टी भारतीय जनता पार्टी की एक तरह से केंद्र में सरकार हैं, दूसरी और अगर विकास या रोजगार का हवाला दे वहा भी यह सरकार विफल रही हैं. साल २००७ और २०१२ में भी यही नारा लगा की पंजाब को अब की बार कैलिफ़ोर्निया बना देंगे लेकिन जमीनी स्तर बतर हालत बया कर रहा हैं, वही २०१४ के लोकसभा चुनाव के बाद अचानक से पंजाब में सरकारी अस्पतालों में नशे के रोक थाम के बंदोबस्त करने के भ्रम दिखाये गये, यहाँ लंबी लंबी लाइन देखकर पता चलता था की नशा ये पंजाब में कितनी बड़ी समस्या हैं लेकिन वह सारे अस्पताल आज कही भी मौजूद नही दिख रहे, कहने का तात्पर्य की सरकार की नशे के खिलाफ लड़ाई में इमानदारी नही दिख रही, वही हद तब हो गयी जब नशे की तस्करी में पकड़ा गया मुलजिम भोला पहलवान ने कई शिरोमणि अकाली दल बादल के नेताओ को नशे के व्यपार में शामिल होने का दोष लगाया.  वही आये दिन पंजाब से खबर आती रहती हैं की बहुत सारे  अध्यापक जो कांट्रैक्ट पर हैं उन्हें सरकार पक्की नौकरी नही दे रही, अब जब अध्यापक का ये हाल हैं तो शिक्षा प्रणाली तो बिखर ही जायेगी. ये सरकार सुरक्षा, शिक्षा, विकास, लोक हितों की रक्षा, इत्यादि हर पैमाने पर विफल दिखाई दे रही हैं, अभी भी सुखबीर सिंह बादल की वह छवि उभर कर नही आ रही जिस तरह ९० के दशक में प्रकाश सिंह बादल ने लोक नेता होने की छवि बनाई थी. लेकिन अभी भी गाव में इस दल के लोग कट्टर समर्थक हैं. लेकिन इस बार इस गठजोड़ की चुनावी लड़ाई मुश्किल नजर आ रही है.

वही कांग्रेस, ने १९८४ के सिख दंगो का दाग अभी भी लगा हुआ हैं, हो सकता हैं बाकी भारत भूल गया हो, लेकिन भारत के इस राज्य में इसके जख़्म आज भी खरोचे जाते हैं. खासकर चुनाव के समय ये एक लाजमी मुद्दा होता हैं और इसी की रूप रेखा में कांग्रेस बेकफूट पर होती हैं. लेकिन साल २००२ से २००७ के दौरान कैप्टेन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में बनी कांग्रेस की राज्य सरकार ने पंजाब के पानी की बात की जिसे दूसरे राज्य को दिया जा रहा हैं और किसान को हो रही मुश्किल को आगाज करते हुये खेतों में बिजली ज्यादा दी, मंडी में किसान का अनाज हाथों हाथ बिका, इत्यादि फैसलों से कैप्टेन अमरिंदर सिंह एक लोकनेता के रूप में उभर कर आये, यही कारण था की २०१४ के लोकसभा चुनाव में अमृतसर से अरुण जेटली को मतों के बड़े फर्क से हरा कर सांसद बने. आज लोग कांग्रेस से जुड़ सकते हैं, और उम्मीद भी की जा सकती हैं की कांग्रेस यहाँ विजयी परचम लेहरा सकती हैं खास कर कैप्टेन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में. बस पार्टी को अपनी अंदरुनी बयानों से और राजनीति से बचना होगा.

साल २०११, देल्ही में एक आंदोलन चला जिसकी रूप रेखा में इसकी अगुवाई करने वाले और इस आंदोलन में हिस्सा लेने वाले हर आम और खास नागरिक की सर की टोपी पर लिखा था की में भी अन्ना हु, थोड़े समय बाद इसी आंदोलन से अरविन्द केजेरिवाल एक नेता के रूप में उभरे और एक नयी पार्टी का जन्म हुआ नाम था आम आदमी पार्टी और टोपी पर लिखा गया आम आदमी, हर ख़ास अब आम हो गया था. इसी की लोकप्रियता के चलते २०१५ में पूर्ण बहुमत से देल्ही में इस पार्टी ने अपनी सरकार बनाई. और अरविंद केजेरिवाल यहाँ के मुख्यमंत्री बने. लोकप्रियता का ये आलम हैं की ये पंजाब में देल्ही से ज्यादा लोकप्रिय हैं, यहाँ इनकी सभा में भारी भीड़ जुट रही हैं जो अपने आप यहाँ आ रही हैं. इस पार्टी के कुछ साल पुरानी होने के कारण अभी कोई दाग इसके दामन पर नही हैं. लेकिन अरविंद केजरीवाल अपने बयानों के चलते अक्सर विवादों में रहते हैं. और प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के विरोधी होने की छवि को पैदा कर रहे हैं. यहाँ इस पार्टी के लिये उम्मीद हैं और जीत दर्ज हो सकती हैं लेकिन अगर कही चुनाव में नतीजा विपरीत दिशा में आया तो इसका पतन राष्ट्रीय स्तर पर भी हो सकता हैं.

मुकाबला तो त्रिकोण हैं, कोन जीतेगा ये मतदाता ही तय करेगा लेकिन इस बार मुद्दे पुश्तैनी मुद्दों से अलग हैं अब यहाँ समाज की सुरक्षा की बात हो रही हैं, नशा, रोजगार, शिक्षा की बात हो रही हैं, करप्शन, बेटी बचाओ, सामाजिक एकता, इत्यादि मुद्दों पर भी चर्चा हो रही हैं. समाज के हर तप के की बात हो रही हैं फिर वह चाहे जात पात हो या पुरुष या महिला को एक समान अधिकार की बात हो. हर मसला चर्चा का विषय बना हुआ हैं, यहाँ अब धर्म के नाम पर लोगो को डरा कर वोट नही लिया जा सकता अब काम करना होगा या काम करने की इमानदारी दिखा नी होगी तभी जनता वोट देगी. शायद ये बदले हुये भारत के नागरिक की बदली हुई सोच हैं. अंत में राजेश खन्ना की मशहूर फिल्म रोटी का गीत लिखकर अपनी बात पूरी करता हु “ये जो पब्लिक हैं सब जानती हैं ये पब्लिक हैं” जय हिंद.

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