पत्रकारिताः जहां सिर्फ बेचने की तरकीबें खोजी जाती हैं

Posted by Shalini Shrinet
January 31, 2017

Self-Published

कहां जा रही है पत्रकारिता? पत्रकारों की छवि धूमिल होती जा रही है। जहां पहले पत्रकारों का नाम सुनकर एक सम्मान और आदर का भाव आता था, वहीं अब लोग कद्र ही नहीं करते। एक समय था 1997-98 में जब मैं बीए कर रही थी तो कुछ सहेलियां पत्रकारों का नाम सुनकर कहती थीं, अरे बाप रे, वो तो पत्रकार हैं, बाल की खाल निकालेंगे या बातों की तह तक जाकर तहकीकात करेंगे।

आज के पत्रकार बातों की तह तक नहीं जाते या असलियत नहीं जानना चाहते, उनको इस बात से मतलब है कि कौन सी खबर कितनी बिकेगी। कौन सी खबर किस तरह लगाई या दिखाई जाए कि ज्यादा बिके। पत्रकारिता भी अब दुकानदारी हो गई है। आज की आधी पत्रकारिता तो जान-पहचान पर चलती है। जबकि अच्छे अखबार या चैनल को जान-पहचान की जरूरत नहीं होती।

कुछ जानने वाले दोस्तों ने पत्रकारिता की नौकरी छोड़ दी और अब काम की तलाश में हैं। वो सिर्फ इसलिए कि वे जिस भी टीवी चैनल या अखबार में थे, वहां पर खुद को कठपुतली की तरह महसूस करते रहे। अब वहां इस बात पर जोर दिया जाता है कि कौन सी खबर की हेडिंग कितनी वल्गर और सनसनीखेज होगी कि ज्यादा से ज्यादा लोग उसे पढ़ेंगे और देखेंगे। कुछ दोस्तों ने इन बातों पर प्रतिक्रिया की तो उनको परेशान करके नौकरी से निकाल दिया गया और आगे नौकरी मिलना मुश्किल हो गया।

माना जाता है कि पत्रकारिता सही खबरों को लोगों तक पहुंचाने का मंच है। लेकिन हमारे पत्रकार जो बोलना या लिखना चाहिए, वो न बोल या लिखकर वे वो बोलते हैं जो विवादित हो, क्योंकि उनका मानना है कि ऐसी खबरें लोग देखते हैं।

मेरा रंग पर इंटरव्यू के दौरान एक वरिष्ठ पत्रकार से मुलाकात हुई। उन्होंने बातचीत में बताया कि मैंने तमाम टीवी चैनलों में काम किया लेकिन मुझे कभी ये नहीं लगा कि जो खबर जानी चाहिए वो जा रही है। हमेशा इस बात का दबाव रहता था कि ऐसी खबर हो कि ज्यादा लोग देखें या पढ़ें, उसकी सत्यता से कोई मतलब नहीं होता था। एक समय के बाद वहां मेरा दम घुटने लगा और मैंने नौकरी छोड़ दी और अपना काम शुरू कर लिया।

उनका कहना है कि अब पत्रकारिता दुकानदारी हो गई है। जहां सिर्फ बेचने की तरकीबें खोजी जाती हैं, न कि लोगों तक कोई अच्छी या सच्ची खबर पहुंचाने की।

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