परंपरा की दरकार या मनोरंजन की चाह

Posted by Vishu Singh
January 21, 2017

भारत एक विभिन्न धर्मों वाला देश होने के साथ-साथ विभिन्न परंपराओं और संस्कृति वाला देश भी है। यहां के वासी अपने पूर्वजों की बनाई संस्कृति और परंपरा को आगे ले जाने मे विश्वास तो रखते ही है साथ ही उसे भरपूर जीते भी हैं और यही वजह है कि पिछले कुछ दिनों से तमिलनाडु मे लोग अपने परंपरा के ऊपर मंडरा रहे खतरे को बचाने के लिए रोड पर उतरने को मजबूर हैं।

जल्लीकट्टू तमिलनाडु में सक्रांति के दौरान मनाई जाने वाली हज़ारों सालों पुरानी परंपरा है जिसमें बैल और युवाओं के बीच एक खेल का आयोजन होता है, युवा को बैल के सिंग पर लगे पोटली को निकालना होता है और साथ ही खेल को उत्तेजक बनाने के लिए बैलों को शराब पिलाई जाती है और उनकी आंखों में मिर्च भी डाली जाती है। मानवता के आधार पर देखें तो यह पहलू जानवरों से की जाने वाली क्रूरता की श्रेणी में तो आता ही है साथ में यह भी दिखाता है कि इंसान अपने मनोरंजन के लिए जानवरों को सताने में जरा भी नहीं कतराता।

अब हम बात जानवरों पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने वाली संस्थाओं में से एक पेटा पर करेंगे जिसने सुप्रीम कोर्ट में जल्लीकट्टू के खिलाफ याचिका दायर की थी। देश में हर साल लाखों करोड़ों भेड़-बकरियों को पर्व व बलि के नाम पर कुर्बान होना पड़ता है, लाखों घोड़ों को टमटम-बग्घा में जोतकर यातनाएं दी जाती हैं, गधों को कपड़े धोने के नाम पर बोझ सहना पड़ता है, तब पेटा जैसी संस्थाएं कोई याचिका क्यो नहीं डालती?

वहीं, अगर इस पूरे परिदृश्य को हम राजनीतिक चश्मे से देखें तो यह कह सकते हैं कि जल्लीकट्टू पर लगे पाबंदी का विरोध राज्य का एक बड़ा तबका कर रहा है, इस वजह से राज्य सरकार से लेकर विपक्ष तक बढ़-चढ़कर उनको अपना समर्थन दे रहें हैं और साथ-साथ केंद्र सरकार भी मौके की अहमियत को समझते हुए राज्य सरकार को अध्यादेश लाने की अनुमति दे चुकी है।

बहरहाल,  इन सभी घटनाओं के बीच एक दिलचस्प बात सामने निकल कर आ रही है कि जो जनता अभी कुछ ही महीने पहले कावेरी के पानी की मांग को लेकर उग्र रवैया अपनाए हुए थी, आज ठीक उसके उलट चेन्नई के विभिन्न इलाकों में बड़े शांत तरीके से पाबंदी का विरोध करते दिख रही है जो दिखाता है कि हम एक जिम्मेदार लोकतांत्रिक नागरिक हैं।
क्योंकि हम एक संवैधानिक देश में रहते हैं यहां कोर्ट को पूरा अधिकार है कि वह सभी मामलों को गंभीरता से ले मगर साथ-साथ लोगों के आस्था व परंपरा का भी ख़याल रखे। अंततः कोर्ट को  जल्लीकट्टू मे मामूली बदलाव के साथ उस पर लगा प्रतिबंध हटाने के बारे में एक बार जरूर सोचना चाहिए।