मैं मणिपुर बोल रहा हूं

Posted by Nilesh Mishra
January 27, 2017

Self-Published

मैं मणिपुर बोल रहा हूं। वही मणिपुर जिसे पूरब का स्विटजरलैंड भी कहा जाता है। पूर्वोत्तर में होने के कारण अक्सर मैं दिल्ली से अपनी दूरी महसूस करता हूँ। खासकर जब चुनाव आते हैं या कोई सरकारी घोषणाएं होती हैं तो खुद को अकेला पाता हूं।

मैं मानता हूं कि उत्तर-प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्य मेरे बड़े भाई हैं और उनकी जरूरतें भी मुझसे कहीं ज्यादा हैं लेकिन इससे छोटों को मिलने वाला प्यार और उनका हक़ कम तो नहीं हो जाना चाहिए ना। मैं खुद अपने यहाँ चल रही गतिविधियों से अक्सर परेशान हो उठता हूँ, ऐसे में जब मैं अपने बड़े भाइयों की तरफ उम्मीद की नज़र से देखता हूँ तो मुझे शंका की नज़र से देखकर चुप करा दिया जाता है. मुझ पर नक्सली, माओवादी और आतंकी होने जैसे आरोप गढ़ दिए जाते हैं.

छोटे बच्चों की तरह मैं भी भारत माँ का बहुत खूबसूरत बच्चा हूँ. नदियाँ, घाटियाँ, पहाड़, तालाब और जंगल क्या नहीं है मेरे पास? फिर भी मुझे अपने और भाइयों जैसा प्यार ना जाने क्यों नहीं मिल पाता है. इतना तो मैं तब भी बर्दाश्त कर ही जाता हूँ लेकिन जब मेरे बच्चों को दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में विदेशी समझा जाता है, उन्हें अपमानित किया जाता है कुछ विशेष शब्दों से उन्हें बुलाया जाता है. तब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता है. मेरे बच्चों से सबूत माँगा जाता है उनके भारतीय होने का, उनके देशभक्त होने का.

अक्सर एयरपोर्ट पर, ऐतिहासिक विरासतों पर और अन्य जगहों पर पूछ लिया जाता है कि “पक्का इन्डियन ही हो ना?” अब इसके लिए मैं और मेरे बच्चे आखिर ऐसा क्या सबूत लेकर घूमें? क्या मैं अपने बच्चों की शक्ल बदलवा दूं तब मुझे वो स्नेह और और प्यार मुझे मिल जाएगा जो मेरे दूसरे भाइयों को मिलता है. या तब भी मुझे ये दूरी महसूस होती ही रहेगी.

फरवरी मार्च में मेरे साथ मेरे चार और भाइयों के यहाँ चुनाव होने हैं. इसे लेकर हम सब बहुत उत्साहित है. चुनावों के बारे में रोज टीवी पर खूब चर्चा होती है और अखबारों में एक या दो पेज विशेष रूप से चुनावों के लिए ही रखे जाते हैं. मैं भी जब टीवी पर अपने भाइयों और उत्तर प्रदेश और पंजाब को देखता हूँ तो मुझे बड़ी खुशी होती है लेकिन जब कई सारे चैनल बदलने और कई सारे अखबारों को पलटने के बाद भी खुद का कोई जिक्र नहीं पाता हूँ तब लगता है कि मैंने ना जाने क्या गुनाह किया है?

आपको बता दूं कि सालों से मैं संगीनों के साए में रखा गया हूँ. मुझपर आरोप है कि मैं आतंकियों और विद्रोहियों को पनाह देता हूँ. इस ज्यादती के खिलाफ सालों से लड़ रहे लोगों के साथ खड़ी मेरी बेटी इरोम शर्मिला भी इस बार चुनाव लड़ रही है. ये वही लड़की है जिसे आपने कुछ महीने पहले ही अपना सोलह साल पुराना अनशन तोड़ते हुए टीवी पर देखा होगा. लेकिन आज उससे भी सभी टीवी चैनलों के कैमरों ने मुंह मोड़ लिया है.

ऐसा नहीं है कि मैं टीवी पर दिखने के लिए मैं मरा जा रहा हूँ लेकिन इस तरह की अनदेखी भी सही नहीं जाती. फिर भी उम्मीद लगाये देखता रहता हूँ कभी मेरे भी दिन बहुरेंगे. मैं भी कभी महत्वपूर्ण समझा जाऊँगा. कभी तो मेरे बच्चों को उनके छोटे चेहरे की वजह से ‘चिंकी’ जैसे शब्दों से नहीं बुलाया जाएगा. उन्हें भी कभी भारतीय समझा जाएगा.

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