विमुद्रीकरण और बलि

Posted by durba chattaraj
January 23, 2017

Self-Published

विमुद्रीकरण की तत्कालीन स्थिति को देख निसंदेह यह प्रतीत होता है की सबसे ज़्यादा पीड़ित ग़रीब वर्ग है. इस पहल के परिणामस्वरूप देश भर मे 100 से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है. समाधान के तौर पर ग़रीब एक वक़्त की रोटी से काम चला रहा है. मंहगाई के इस दौर मे बाल पोषण और स्वास्थ्य संबंधी व्यय मे कटौती भी स्वाभाविक ही है.

हमे हमेशा से त्याग करना और साहसी बनना सिखाया गया है, बतौर एक शहरी मध्यम वर्गीय पेशेवर मैने भी संघर्ष किया है. पिछले कई दिनों मे मैने भी औसतन 6 से 8 घंटे शहर के अलग अलग ए. टी. म. मशीनों और बैंको की लगी लाइन में काटे हैं. पिछली दफ़ा रोल की दुकान पे क्रेडिट कार्ड पेमेंट फेसिलिटी ना होने की वजह से मुझे काठी रोल की जगह पास्ता खा के कम चलना पड़ा. हालाँकि सहिष्णुता के ये दोनो ही उदाहरण त्याग के समपरिणाम हैं, परंतु शायद ही कोई बेहतर दर्जे का पास्ता किसी साधारण से रोल के समतुल्य स्वादिष्ट होता होगा.

बात यह उभर कर आती है की काले धन और अमीरों की असीमित संपत्ति के विरुद्ध उठाया गया कोई भी कदम ग़रीब वर्ग द्वारा त्याग और संघर्ष की अपेक्षा रखता है.

मानवविज्ञान का ज्ञान मुझे इस परिस्थिति को देखने की नयी समझ प्रदान करती है. विश्व की अनेक सभ्यताओं में बलिदान या आहुति देने का प्रचलन रहा है. प्रचलन यह रहा है कि सामूहिक पापों से निवृत्त होने के लिए दोषी की जगह मासूम और बेकसूर की भेंट ईश्वर को दी जाती है.

युद्ध से हुई हानि, हिंसा, लालच जैसे पापों के प्रायश्चित्त की बात हो, चाहे अमरता की चाहत, त्याग हमेशा से उन्ही को करना पड़ता है जो दोषमुक्त हों – कुँवारी कन्या, नवजात शिशु, घोड़े, बकरी या बच्चे.

शायद उपरोक्त तर्क विमुद्रीकरण के लिए भी उतना ही उपयुक्त है. कालेधन और भ्रष्टाचार जैसी गंभीर समस्या के निदान के लिए तर्क़ हमेशा से रहा है – कुछ बड़ा करने का, बड़ा बदलाव जिससे कि वर्षों से जमी धूल पल भर मे समाप्त हो जाए. पर विमुद्रीकरण की परिस्थिति मे शायद इसके प्रभाव का दायरा ही सबसे गंभीर समस्या है.

यहाँ हम विमुद्रीकरण की बात कर रहें हैं और यह बलिदान से भिन्न है, जहाँ बलिदान कई के पापों के बदले कुछ का दिया जाता है वहीं विमुद्रीकरण मे गिने चुने के पापों और गुनाहों के बदले हम लाखों करोड़ों लोगों से त्याग और संघर्ष की माँग कर रहें हैं.

आँकड़ो की माने तो आमीर एक प्रतिशत भारतीयों के पास देश का 58.4 प्रतिशत धन है. यक़ीनन कालेधन का अधिकतम हिस्सा इसी वर्ग के हिस्से आता है बजाए उन 50 प्रतिशत भारतीयों के जिनके पास आज भी बैंक खाते नही हैं, जो अनौपचारिक रोज़गार मे हैं और अपनी बचत कैश में रखते हैं.

औपचारिक बलिदान भले ही खून ख़राबे को बढ़ावा देता है पर यक़ीनन इस विधा मे अनुपात की समझ दिखती है. एक-दो बच्चे एक गाँव के लिए, हद से हद कुछ 100 घोड़े एक राज्य को पाप मुक्त कर सकते हैं. इस अवस्था मे बेहतर होगा की कोई अर्थशास्री जिसे बलिदान के इतिहास का ज्ञान हो, विमुद्रीकरण मे आवश्यक त्याग के लिए आदर्श संख्या के साथ आए. शायद यही एक तरीका हो सकता है इस समस्या से निदान का.

दु:खद यह है कि कुछ विशेषाधिकृत अमीर लोगों को पाप निवृत्त करने का खेमा लगभग आधे से आधिक आबादी पर मढ़ दिया गया है, और क्रेडिट कार्ड के यूज में निपुण है और उन्हे लाइन मे नहीं लगना पड़ेगा. वहीं मे इस बदलाव ने अनौपचारिक रोज़गार, फसल व्यवस्था को भारी चोट पहुँचाई हैं जो कि आबादी का अत्यधिक भाग है.

यह भी सच है की बैंक के आगे लगी दिन भर की लाइन में शायद ही कालेधन संजोए नागरिक हों, जिनसे हम लड़ने की कोशिश कर रहे हैं.

यक़ीनन काला धन संजोने वाले कोई बाहरी नही है, हम आप मे ही हैं जो या तो काला धन रखते हैं, या फिर उसे प्रोत्साहित करते हैं, या जाने अंजाने में ब्लेक मनी से प्रभावित रहते हैं. इनमे से ज़्यादातर मध्यम या अमीर की श्रेणी मे आते हैं.

अगर हम कालेधन धारक हैं, तो हम जानते हैं हम कौन हैं. अगर हम क़ानून और व्यवस्था का जीवन जीने वाले हैं और तनिक भी काला धन नही रखते, फिर भी बहुत मायनों मे हम इस व्यापार मे लिप्त हैं, पिछले 20 वर्ष में जो मकान हमने खरीदें हैं, यक़ीनन पेमेंट का कुछ हिस्सा तो ब्लेक मे ही दिया था. ज़ोहरी की दुकान से जो गहने हमने बनवाए थे उसपे भी कैश पेमेंट पर भारी डिसकाउंट ऑफर मिला था. बी. एम. डब्ल्यू. धारक जूनियर इंजिनियर साहब को भी तो क्लियरेन्स के लिए भेंट की थी हमने. और अपने ब्लेक को वाइट मे करवाने के लिए तो अनेकों इनवेस्टमेंट किए होंगे. और अगर फिर भी हम इनमे से किसी श्रेणी मे नही आते, तो ज़रूर हम जानते हैं अपने दोस्तों को, संबंधी को, जो ब्लेक मनी की इस विधा मे लिप्त हैं. यक़ीनन ब्लेक मनी रखने वाले हम लोग हैं न कीग़रीब किसान, या मजदूर जो की इस वक़्त पैसों की मुसीबत से सबसे ज़्यादा स्नघर्ष कर रहा है.

हम यह भी जानते हैं की हमारे मित्र, रिस्तेदार और परिचित इन सब के बीच भी ठीक ठाक जिंदगी जी रहे हैं. शायद हमे ही असहज महशूस होता होगा उनकी रफ़्तार भरी प्रगति देखकर. जैसा कि एक परिचित ने बताया मुझे की उसके मित्र का सारा काला धन गोल्ड और प्रॉपर्टी मे इनवेस्ट है. बचा हुआ क्रेडिट कार्ड या विदेशी अकाउंट मे है. पर मोदी सरकार को यह सब पता है, और विमुद्रीकरण के बाद अगला नंबर बेनामी प्रॉपर्टी और गोल्ड का है. सवाल यह उठता है की अगर यह बात हमे पता है तो हमने गोल्ड और प्रॉपर्टी से क्यूँ शुरुआत नही की? और पहले उनपे सर्जिकल स्ट्राइक क्यूँ नही की जो असीमित विषम संपत्ति संजोए हुए हैं.

मैं समझता हूँ एक शहरी अभिजात वर्ग की पीड़ा जिसे भी नज़रअंदाज नही किया जा सकता. एक तो हवा इतनी प्रदूषित है कि न तो हम न हमारे बच्चे साँस ले पा रहे हैं और ये मास्क और प्यूरिफाइयर भी कोई काम नही आ रहे हैं. हमें डर लगता है मजदूरों और ग़रीबों की पीड़ा से और गुस्सा भी आता है. हम शायद सुरक्षित नहीं महसूस करते हैं. हर तरफ विकार ही दिख रहा है. पर हमने अपने घरों मे, काम पर और मॉल मे अपना जीवन सरल बना लिया है. शायद बाहर भी हम यही उम्मीद रखते हैं. घंटों यातायात से संघर्ष गुस्सा पैदा करता है, पर हम बेचैन हैं, इस बात से कि हमारी सारी संपन्नता भी इस बेचैनी को दूर नही कर सकती. इसलिए हमे उस बदलाव, परिवर्तन की उम्मीद है जो हमारे भविष्य को आसान और सुखद बना सके. एक मित्र ने डिनर पार्टी मे कहा की अगर एक तिहाई आबादी किसी महामारी मे मर जाए तो शायद यह मुमकिन है की हम इन समस्याओं से छुटकारा पा जाएँ. उस पर किसी विद्यार्थी ने बताया की अच्छा है हमारे देश के किशान आत्मयाहत्या कर रहें हैं. एक तिहाई का हट जाना प्रगति के लिए ज़रूरी है. शायद अपने बीच हम इसी प्रकार की प्रगतिशील चर्चाएँ करते हैं जो हम पब्लिक में नहीं कर सकते.

ऐसे परिवेश में माँग सामूहिक़ त्याग की होती है. बहुत से लोग मानते हैं कि पहली बार घंटों लाइन मे लग कर उन्होने किसी बड़ी प्रगतिशील मुहिम में हिस्सा लिया. हमने अपने मित्र मंडली में, फ़ेसबुक पर अपने इस त्याग भावना का प्रचार किया, दिखाया कि किस तरह से हमारा त्याग स्वतंत्रता सेनानियों के समतुल्य है. पर धीरे धीरे हम भी थकने लगे और विकल्प ढूढ़ने लगे, और बुक माई छोटू डॉट कॉम जैसी वेबसाइट के ज़रिए अपनी जगह दूसरों को लाइन मे खड़ा करने लगे.

यह कतई ज़रूरी नही है की पाप हमारा है तो बलिदान भी हमें ही देना चाहिए. हम अपने भेड़, बकरियों, और घोड़ों का भी बलिदान दे सकते हैं. उसी प्रकार क्यूँ ना अमीरों के कालेधन के बदले ग़रीबों के भोजन का बलिदान दिया जाए.

पर अनुपात का ध्यान रखना होगा. शायद 100-200 पर्याप्त होंगे और हमें अपनी पूरी ग्रामीण आबादी, थोक बाज़ारी, किशान और मजदूरों और देश की प्रगति, जी डी पी ग्रोथ का बलिदान नही देना होगा.

100-200 भी क्यूँ, हम इसे घटाकर एक पर भी ला सकते हैं.

गाँधीजी ने कहा है, “जो सबसे गरीब और कमज़ोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शकल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा. क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा ? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा ? यानी क्या उससे उन करोड़ो लोगों को स्वराज मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है ? तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम् समाप्त हो रहा है.”

तो फिर याद करने की कोशिश करते हैं सबसे ग़रीब और कमजोर को जिसे हमने कहीं देखा होगा और पकड़ने की कोशिश करते हैं क्यूँकि हमारी समस्या का हाल उसी को बलि का बकरा बनाने मे हैं.

Author: Dr. Durba Chattaraj, Assistant Professor of Anthropology

Translator: Nikhil Tripathi, Young India Fellow, Ashoka University

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