स्कूल ड्रेस पहने पूजा के हाथो में सब्ज़ी की टोकरी नहीं किताब होने थे

Posted by Akash Kumar in Hindi, Society
January 22, 2017

“देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर”, बिहारी जी की ये एक पंक्ति आज से एक साल पहले मेरे ज़हन में घर कर गयी थी। मेरी ये कहानी कहीं न कहीं इन्हीं पंक्तियों को सत्य करती दिखाई देती है। राजस्थान के उस छोटे और खूबसूरत शहर ‘डूंगरपुर’ ने ना केवल मुझे परिस्थितियों से अवगत कराया था बल्कि मेरे खुद के होने का एवं मेरे दायित्वों का भी एहसास हुआ था। ये छोटी सी कहानी…..

एक छोटी बच्ची स्कूल ड्रेस में बाज़ार में खड़ी थी। उसके हाथ में एक छोटी सी टोकरी थी और उसमें थी कुछ सब्ज़ियां। वो आवाज़ लगा रही थी सब्ज़ी ले लो, सब्जी ले लो! मुझे न चाहते हुए भी उसके पास रुकना पड़ा। उसकी मासूमियत उस सरकारी स्कूल ड्रेस में और भी खिल रही थी! मैंने उससे उसका नाम पूछा। बहुत ही मासूमियत के साथ उसने जवाब दिया पूजा!

फिर मैंने पूछा किस कक्षा में पढ़ती हो और तुम्हारा गांव कहा है? जवाब आया तीसरी कक्षा में और मेरा गावं न दूर है यहाँ से। अब फिर सवाल, कितना दूर है? वो बहुत दूर है, पैदल चलना पड़ता है फिर टेम्पो से यहाँ आती हूँ! अच्छा…. उसके बातों ने मंत्रमुग्ध कर दिया मुझे।

अब मुझे अपने सवाल बेवजह और फालतू लग रहे थे। ऐसा उसकी जवाबों से भी लगने लगा था और ये बहुत जायज़ भी था। भला पेट के सामने सवाल किस को रास आते हैं! वहां मेरे और उसके साथ अजीब सवाल थे! अब तक मैं इस बात को समझ चुका था कि मैं उसकी भावनाओं को बिना किसी बेहतरी के वादे के साथ कुरेद रहा हूं।

खैर, उसे सब्र की आदत थी और इसी के आसरे उसने मुझसे पूछा, भैय्या कुछ लेना है आपको कि ऐसे ही बातें कर रहे हो? इतनी छोटी उम्र, सुबह हाथ में किताबें तो शाम में सब्ज़ी की टोकरी। भरे बाज़ार में खूब शोर-शराबे के बीच उस मासूम की नज़रे और दृढ़ता अपने अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ रही थी! इस उम्र में जब बच्चे अपने पिता की ऊंगलियां पकड़ बाज़ार में हर कुछ जानने की कोशिश कर रहे होते हैं, वो एक गाइड की तरह उस बाज़ार के चप्पे-चप्पे से वाकिफ थी।

अब सवाल ये था कि क्या ये समाज की देन थी? या सरकार की नाकामियां? शिक्षा का अधिकार का ही ये दूसरा रूप है जिसका सवाल लिए वो छोटी बच्ची 3 घंटे बाज़ार में खड़ी रहती है! किताब की चाहत की जगह शायद पैसों की ज़रूरत उसे ज़्यादा थी। आह्ह! उसका और हमारे समाज का ये दर्द, गरीबी की जंज़ीरो में जकड़ी ज़िंदगी।

उस मासूम सी आँखों ने सब बयां कर दिया था। सर्व शिक्षा अभियान 2001 का नारा है ‘सब पढ़ें सब बढें।’  लेकिन, शिक्षा के पहले शायद भूख भी आती है, नहीं तो हर मजदूर बोझ की जगह किताब उठाता।

बहुत ही अजीब लगा मुझे जब मैंने आज सुबह की अखबार में ये पढ़ा कि अंग्रेजी स्कूलों में जाने वाले बच्चों के टिफिन की जाँच की जाये कि क्या उसमे जंक फूड है? जिससे की उनकी सेहत का ख्याल रखा जा सके! मेरी इस कहानी में जहाँ पूजा हरी सब्जियां बेच रही है और उसे खुद नहीं पता की कल की दोपहर स्कूल में उसे चावल मिलेगा या उसमें पड़ा कीड़ा! एक तरफ मिड डे मील की गुणवत्ता है जिसकी जांच पता नहीं कैसे होती है और एक तरफ घर से आने वाले टिफिन की जांच, विडंबना किसी अलग स्तर पर है।

अगर मेरी जगह पूजा इस खबर को पढ़ रही होती तो शायद यही सोचती आखिर सरकार क्यों ये चाउमीन, समोसा, रोल, पास्ता, इत्यादि बंद करवा रही है? हमें दे देते तो कितना अच्छा होता? पूजा जैसे बच्चों के लिए ये जंक फूड और फास्ट फूड, ड्रीम फूड के जैसे होते हैं।

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