“आखिर दोष किसका है?”

Posted by Harsh vardhan Kr
January 9, 2017

Self-Published

शहरों में छात्रों द्वारा आत्महत्या की बढ़ती खबरें रोंगटे खड़े कर देने वाली है। आखिर दोष किसका है? मेरे ख्याल से तो बच्चों का कतई नहीं। वे तो बच्चे है जैसा सिखाओगे, बनाओगे वैसा ही वो बनेंगे। आत्महत्या से पहले छिपाकर छोड़ी गयी पर्चियां लिखते वक्त इन मासूमों पर क्या गुज़रती होगी। उन पर्चियों के शब्दों पर गौर करें तो पता चलता है कि प्यार और अपराध बोध की कितनी कश्मकश से गुजरते होंगे ये बच्चे।

हमारे देश में इससे ज़्यादा संवेदनशील मुद्दा और क्या हो सकता है, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि ऐसी किसी खबर या घटना पर देश के बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों ने कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। ऐसी ख़बरें न्यूज़ चैनेलों के फटाफट 100 और अख़बारों के छोटे कॉलमों में ही सिमट के रह जाती है। ऐसी घटनाओं को आत्महत्या के बजाय हत्या का नाम देना ज़्यादा सही रहेगा।

बचपन से ही थोपे गए सपनों को पूरा ना कर पाने की हताशा में माँ-बाप, दोस्तों, समाजों की टेढ़े व्यंग से भयभीत होकर अपनी ही जान दे देते हैं। यह तो बरसों से होता चला आ रहा है लेकिन दिनोंदिन इसमें होती बढ़ोतरी हमारे लिए एक चिंता का विषय बनता चला जा रहा है। समाज में पसरी चुप्पी इस बात की ओर इशारा करती है कि हम सब कहीं न कहीं इन आत्महत्याओं के लिए दोषी है।

इस देश के राजनेता इस बात पर तो इतराते है कि सबसे ज़्यादा नौजवान भारत में हैं, लेकिन क्या इन नौजवानों के सपने को वो सही जगह दे पाते है? न प्रारंभिक शिक्षा के लिए अच्छे स्कूल है ना ही शोध के लिए अच्छे शोध-संस्थान। आई.आई.टी. जैसे संस्थान तो आजकल ब्रांड बन गए हैं, दस लाख परीक्षा देने वाले और सीट मात्र दस हज़ार। बचे कॉलेजों की बात करें तो फीस के नाम पे खून चूसा जाता है, वहां न अच्छे शिक्षक मिलते है और न ही अच्छी सुविधा। आखिर क्यों सरकार इस मुद्दे पर नाकारा बन चुकी है? क्यों इन आत्महत्याओं में एक बड़ा हिस्सा बिहार और उत्तर-प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्यों का है?

दूसरे दोषी माँ-बाप खुद हैं, जो बच्चों को स्कूल के दिनों से ही आई.आई.टी. या एन.आई.टी. जैसे शब्दों के बोझ तले दबा देते हैं, अपनी ख्वाहिशों का वास्ता देकर दिल्ली, कोटा जैसे शहरों की तरफ भेज देते हैं। माँ-बाप का भी कुछ कम योगदान नहीं रहता है, कुछ अपनी जमीन बेच देते है तो कुछ बैंकों से लोन ले लेते है। आखिर करेंगें भी क्या एक तो कोचिंग की भारी-भरकम फीस उपर से रहना-खाना, किताबें इत्यादि का बोझ।

इन सपनों और अच्छे भविष्य का बोझ लेकर बच्चे कोटा जैसे कोचिंग संस्थानों में पहुंच तो जाते है लेकिन उस माहौल में अपने आप को रातों-रात फिट नहीं कर पाते है। आखिर कर भी कैसे पाएंगे? पहली बार ही तो घर से दूर जाते हैं, न माँ-बाप, न भाई-बहन का प्यार, न खाने पीने की अच्छी सुविधा- मानों एक ही रात में पूरी ज़िंदगी बदल गयी हो। ऊपर से ये रोज़-रोज़ के क्लास टेस्ट, ये क्लास टेस्ट के परिणाम प्रतिदिन हजारों बच्चों को हताश, निराश करके एकाकीपन के कुएं की तरफ धकेल देते हैं। इसमें से कुछ कंप्यूटर गेम्स, कुछ नशीली ड्रग्स और कुछ चोरी-फिरौती जैसे कारनामों में शामिल हो जाते है। वहीं कुछ बच्चे दिन-रात गणित, भौतिक, रसायन के फॉर्मूले रटते-रटते मानसिक रोगी हो जाते है।

आजकल की शिक्षा पद्धति पर गौर करें तो पता चलता है कि हम लोग रटंत विद्या के शिकार होते चले जा रहे हैं। देश के शीर्ष संस्थानों में पहुँचने वाले छात्रों की प्रतिभा पर भी सवाल उठने लगे है, न भाषा पर अधिकार न समाज के प्रति संवेदनशीलता, मानों हम मनुष्य रहे ही नहीं।इन शीर्ष संस्थानों में पढ़ रहे बच्चों में कल्पनाशीलता, रचनात्मकता का निरंतर ह्रास होता चला जा रहा है जो हमारे विकासशील देश के लिए एक चिंता का विषय है।

अगर भविष्य में हमें ऐसी अप्रिय घटनाओं से निजात पाना है तो इसका हल हमें पूरी शिक्षा व्यवस्था में ही ढूंढना ही होगा, वो भी जल्द से जल्द। अब वक्त आ गया है जब केंद्र सरकार और राज्य सरकारें मिलकर शिक्षा के पूरे ढांचे पर पुनः विचार करें, प्रतिस्पर्धा कोई बुरी बात नहीं है लेकिन बच्चों को इतना मजबूत बनाना ज़रूरी है कि जीवन में एक-दो परीक्षाओं में असफल होना उनके लिए बहुत मायने न रखे।

प्रारंभिक शिक्षा में आईन्स्टाइन से लेकर अमिताभ बच्चन, प्रेमचंद, मंटो जैसे व्यक्तियों की जीवनी पढ़ाई जाए ताकि बच्चे मानसिक रूप से परिपक्व बन सके। बच्चों से ज़्यादा ज़रुरी है उनके माँ-बाप, स्कूल के शिक्षकों की मानसिकता को बदलना कि तुम अपने नकली सपनों की खातिर इनकी ज़िन्दगी की कुर्बानी देने पर क्यों तुले रहते हो? यह सब करना इतना आसान नहीं है लेकिन अगली पीढ़ियों की खातिर यह करना बेहद जरुरी है।

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