सोशल मीडिया पर हर तस्वीर आप को प्रभावित करती है, क्रोधित भी और एक पक्ष मे खड़े होने को मजबूर भी. बचके यहाँ सब कुछ सच नही दिखाया जाता

Self-Published

संवाद, अक्सर इसे हम यही मानते हैं की इसे बोल कर या शब्दों को लिखकर ही किया जा सकता हैं लेकिन आज के इस डिजिटल युग में, कुछ ऐसी भी चीजें हैं जो तस्वीरो के माध्यम से हमसे संवाद करती हैं और हमारी मानसिकता पर भी इसका प्रभाव पड़ता हैं. मसलन, अक जगह लिखा हैं की “यहाँ कचरा ना फैके, अन्यथा क़ानूनी कार्यवाही की जायेगी.” फिर भी लोग इसे बिना कुछ समझे यहाँ आते-जाते कचरा फैक देते हैं. लेकिन उसी जगह, एक कैमरा की तस्वीर लगाई गयी हैं और उसके नीचे, अगल, बगल कुछ भी नही लिखा गया. इसके चलते, अमूमन लोग वह कचरा फैकना तो दूर लेकिन खड़े भी नही होते. कैमरा की ये तस्वीर, इस सवांद को जन्म दे रही हैं की यहाँ पर होने वाली हरेक प्रकार की गति विधि इस कैमरा में रिकॉर्ड हो रही हैं और इसी रिकार्डिंग के तहत किसी पर भी क़ानूनी कार्यवाही की जा सकती हैं. लेकिन, हकीकत में ये कोई दिलचस्पी नही रखता की वहा कोई कैमरा हैं भी या नहीं ? इसी तरह, के सवांद वह हर अनजान तस्वीर हम से करती हैं जो कही-कही से होती हुई हमारे सोशल मीडिया पेज पर आ गयी, अब ये संवाद की रूप रेखा में क्या कह रही हैं ? क्या ये हकीकत हैं ? इसका अवलोकन करना जरूरी हैं.

मसलन ये ऊपर की तस्वीर, यहाँ अक बच्चा हाथ जोड़कर खड़ा हैं और स्कूल की वर्दी में हैं. इसके जेब में, एक रोटी हैं जिसे ध्यान से देखा जाये तो उस रोटी की एक बुर्की पहले खा ली गयी हैं. अब इस में कयी चीजें अवलोकन करने वाली हैं, जिस तरह स्कूल की वर्दी, तो स्कूल में या तो प्रार्थना होती हैं या फिर राष्ट्रगान. लेकिन राष्ट्रगान में, अमूमन हमें सावधान खड़ा होना सिखाया जाता हैं, लेकिन प्रार्थना, में आप हाथ जोड़ सकते हैं. प्रार्थना भी यहाँ किसी रूप में भगवान को याद करती हैं या फिर देश भक्ति की रूप रेखा में ही होती हैं. चाहे, सुनने वाले शब्द कुछ भी हो, लेकिन हाथ जोडकर खडे होने से उन कहे जाने वालो शब्दों में अपनी सहमती बता रहे है, और जो शब्द कह रहा है वह एक व्यवस्था है मसनल स्कूल की व्यवस्था, समाज की व्यवस्था, देश की व्यवस्था. अब जब एक बच्चा अपनी आधी रोटी छोड़कर, हाथ जोडकर खड़ा हो गया और इस व्यवस्था मे अपनी सहमती दिखा रहा है. तो बाकी सब लोग युवा, पुरुष, महिला, बुजुर्ग, इत्यादि, की जवाब देही तो कही ज्यादा बनती हैं. लेकिन, इसी तस्वीर में किसी भी तरह इस बच्चे का चेहरा साफ़-साफ़ नही दिखाया गया, ना ही किसी और बच्चे का. इसी तरह, कोई भी ऐसा चिन्ह नही हैं की ये तस्वीर कहा से ली गयी हैं मसलन यूनिफार्म पर कही भी कोई भी स्कूल का बेज नजर नही आ रहा. उसी तरह, जमीन भी छुपा ली गयी हैं.

सोशल मीडिया पर इस तरह की तस्वीरों का आज खूब चलन हैं तो राजनीति भी किस तरह इससे अछूत रह सकती हैं, मसलन ऊपर की तस्वीर में चेक दिखाया गया हैं, जिसमें पे टू में अक पार्टी का नाम लिखा हुआ हैं (जिसे यहाँ मिटा दिया गया है.) और नीचे अमाउंट लिखी गयी हैं. और यहाँ भुगतान करने वाले के दस्तकार भी मौजूद हैं. अब इस तस्वीर के जरिये ये बताया जा रहा हैं की इतनी बड़ी रकम इस पार्टी को चंदै के रूप में दी जा रही हैं और इसे काले धन और उसी के मध्यनजर इसे नोट बंदी की रूप रेखा में दिखाया जा रहा हैं की ये राजनीति पार्टी किस तरह काले को सफेद धन में बदल रही हैं. लेकिन, यहाँ ग़ोर करने लायक कुछ बातें हैं की इस चेक में से तारीख कही भी नहीं लिखी गयी. चेक का भुगतान करने के समय, बैंक की स्लिप भी भरी जाती हैं जहाँ पूरी जानकारी दी जाती हैं की ये चेक कहा और किसके अकाउंट मे जमा करवाना हैं. लेकिन वह स्लिप यहाँ नदागर हैं. सिर्फ और सिर्फ भुगतान करने वाले का बैंक अकाउंट का नंबर ही यहाँ मौजूद हैं. अगर कहीं भी एक चेक के रूप में किसी को भुगतान किया जा रहा हैं, तो ये अपराध अमूमन नही हैं. अगर हैं तो सरकार की नजर में आ जायेगा. लेकिन कही भी किसी भी तरह की खबर नही आई की इस तरह का कोई अपराध में किसी भी राजनीतिक पार्टी की मौजूदगी पाई गयी हैं. व्यक्तिगत रूप से में इस तस्वीर से सहमत नही हु और मुझे लगता है यहाँ, ये तस्वीर, सच नो होकर एक भ्रम को ही रच रही है.

लेकिन कुछ तस्वीर इस से भी भयानक रूप ले लेती हैं और अक्सर इन्ही के चलते समाज का में दंगे फसाद  होने की संभावना बन जाती हैं. मसलन, भारत देश में गाय के बछड़े, बड़े बेल, को बैच दिया जाता हैं, और सरकार की अनुमति से पूरे देश में कई ऐसे कारखाने चल रहे हैं जहाँ इनका कत्ल करके, इनके मास को आगे बेचा जाता हैं. अगर इस तस्वीर को देखा जाये तो शार्रीरिक रचना से ये एक बेल को कत्ल होता हुआ दिखाया गया है. लेकिन जब इनके कत्ल होने की तस्वीर सोशल मीडिया पर आती हैं तो ये भ्रम पैदा होता हैं की यहा गाय को कत्ल किया जा रहा हैं. गाय, आर्य समाज के तहत एक पवित्र धार्मिक चिन्ह हैं और कही भी इसके कत्ल की परवानगी नही हैं. इससे सामाजिक दंगे होने की संभावना बन जाती हैं. अब ये समझना जरूरी हैं, की ये कत्ल सरकार की परवानगी से ही हो रहें हैं तो सवाल सरकार से क्यों न पूछा जाये ? बजाय, सडक पर हथियारों की नुमाइश की जाये.

कुछ विडियो भी अपलोड होते हैं जो तस्वीरों से ज्यादा खतरनाक प्रभाव करते हैं. मसलन किसी भी सोशल मीडिया पर अगर आप कोई आर्टिकल या किसी और साइट का लिंक डाल दे तो यह सारी सोशल मीडिया साइट्स, आप को क्लिक पर वह पेज खोल देगी लेकिन अपने ब्राउज़र के भीतर. मतलब, कही भी ये आपको उस साईट पर ना तो सीधे तोर पर ट्रांसफ़र करेगी और ना ही उनका वेब एड्रेस लिंक दिखाया जायेगा. ताकि सोशल मीडिया का यूजर इसी पे बना रहे और वह अपना रुख सोशल मीडिया से हटाकर किसी और साईट पर ना ले जाये. अब, इसका भी एक फायदा हैं, मसलन कोई आपत्तिजनक आर्टिकल लिखा गया और इसमें कई तस्वीर दिखाई भी गयी और यहाँ विडियो भी मौजूद हैं. और इसका लिंक सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया गया.  मसलन, यूजर सोशल मीडिया से होते हुये आप की साईट पर आयेगा और इसे देखेगा भी और प्रभावित भी होगा. लेकिन अगर कानून की नजर आप पर पड़ गयी, तो आप अपनी साईट से वह सारे आपत्तिजनक सामग्री हटाकर अपराध मुक्त हो सकते हैं क्युकी सोशल मीडिया पर आपने सिर्फ लिंक पोस्ट किया है कोई भी कंटेंट नही. कहने का तात्पर्य सोशल मीडिया पर हो रहे अपराध जल्दी पकड़ में नही आते.

लेकिन इस तरह के सवांद से और तस्वीरों या विडियो के प्रभाव से बचने का एक ही तरीका हैं, वह हैं यूजर की मुस्तैदी, देखे और अवलोकन करे, प्रभावित ना हो, गहराई में देखे तो इन तस्वीरों से हो रहे छल को देख पायेगे. ध्यान रखिये, सोशल मीडिया, आखो को धोखा देता हैं और हमारे बुजुर्ग पहले ही कह गये हैं की हर दिखने वाली वस्तु असली नही होती. जय हिंद.

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.