ख़ुदकुशी अचानक नही होती.

Posted by हरबंश सिंह
January 9, 2017

Self-Published

शायद दशक ९० का आखरी साल १९९९ या २००० होगा, मेरे घर के साथ एक घर छोड़ कर, तीसरे घर में एक ख़ुदकुशी हुई थी, लाश पंखे से लटक रही थी, सड़क के किनारे पर घर होने की वजह से और यही पर खड़े होकर खिड़की से, भीतर लाश लटकती हुई साफ़ साफ़ दिखाई दे रही थी. मरने वाला मेरा दोस्त था किसी का बेटा था, कोई रो रहा था लेकिन एक राहगीर के लिये ये शायद तमाशा था. कुछ अगर लब्जो में कहूं “ये दर्द मेरा, अक्सर अजनबी का जशन होता हैं.”. कुछ इसी तरह गाव में सामने के घर में एक ख़ुदकुशी हुई, यहाँ भी वही दर्द का मंजर था. लेकिन जो जज्बात दोनों जगह बयान हो रहे थे वह एक ही थे मसलन “ये अचानक से हो गया. कल शाम तक तो सब ठीक था. अगर कुछ बात थी तो हमें बताई होती, इस तरह रुख़सत होना, कहा की शराफ़त हैं”. हर कोई चेहरा अनजान बना होता हैं की उन्हें कुछ पता ही नहीं.

सबसे पहले, ये समझ ले की जीवन में कुछ भी अचानक नही होता. रोटी, कपड़ा और मकान, ये हमारे शरीर या जीवन की मांग हैं, अगर यही एक पैमाना होता जिसके तहत ख़ुदकुशी की जाती तो ये आंकड़ा हमारे देश में कुछ ज्यादा ही खतरनाक हो सकता हैं. लेकिन ख़ुदकुशी तो वहा भी होती हैं जिस देश में अमीरों की संख्या ज्यादा हैं या अमीर देश हैं. अगर अपराध के तहत या किसी भी रूप से किसी को तंग किया जा रहा हैं, इसके तहत ख़ुदकुशी हो रही हैं तो इसे एक हत्या गिना जा सकता हैं लेकिन जहां मानसिक परेशानी हैं या फिर किसी भी रूप से सामाजिक या परिवार से बहिष्कार की भावना हैं या किसी भी रूप में जीवन की निराशा अपनी चरमसीमा पर पोहच गयी हैं और इसी के तहत ख़ुदकुशी हो रही हैं, इस तरह की घटना को थोड़ी सी मुस्तैदी से रोका जा सकता हैं. यहाँ समाज, परिवार और दोस्त एक अहम भूमिका निभा सकते हैं. अमूमन, निराशा, जीवन को खत्म भी कर देती हैं और इसका कारण भी किसी और रुपरेखा में प्रगट होता हैं ना की जीवन की निराशा.

मानसिक या इंसानी जज्बात, अगर शुद्ध भाषा में कहूं तो इंसान की कल्पना, ये इतनी प्रबल हैं की मोबाइल फ़ोन की तरंगों से भी कही ज्यादा गति से अपनी एक पृष्टभूमि बनाती हैं, सफलता का भी यहाँ जिक्र होता हैं और निराशा का भी. ये कुछ इस तरह की छवि हैं जहा इंसान खुद को कैद कर लेता हैं, और कभी कभी इसकी सलाखे इतनी मजबूत होती हैं की इंसान किसी भी संवाद को अपने भीतर आने से रोकता हैं. इंसानी निराशा भयंकर रूप लेने से पहले अपनी कुछ निशानदेही करती हैं. मसलन, सबसे पहले यहाँ इंसान, ज्यादा बोलना बंद कर देता हैं, अगर सच कहूं तो चुप हो जाता हैं. अगर कोई संवाद ये करता भी हैं तो उसमे निराशा का जिक्र ही होगा. मसलन, “दुनिया खत्म होने वाली हैं या जल्द ही मंदी के चलते लोगो की जॉब चली जायेगी. पड़ के क्या करना हैं, इससे किसी का भला हुआ हैं.” एक विधार्थी से लेकर एक कर्मचारी या उद्योगपति अपने अपने संवाद में निराशा को शामिल करता हैं. कही कही ये निराशा कुछ समय तक ही होती हैं लेकिन अगर ये अपना उग्र रूप धारण कर ले तो इसकी निशानदेही और जटिल हो जाती हैं या तो इंसान अति उग्र रूप को अपनाता हैं या अति शालीन और कमजोर. दोनों सुरत में, संवाद ही माध्यम हैं इनकी पहचान करने के, अगर बार बार इंसान, लड़ाई के लिये प्रेरित होता हैं तो यकीनन अपराध होने की गुंजाइश हैं या तो किसी ना किसी रूप में ये अपना नुकसान करेगा या किसी और निकट का. लेकिन यहाँ अगर संवाद अति शांत, गंभीर और निराशाजनक हैं तो यकीनन यहाँ जीवन को खत्म करने की कोशिश की जा सकती हैं.

ज्यादातर, जीवन की असफलता या जिस कोण से हमने अपने जीवन की पृष्टिभूमि, अपनी कल्पना में बनाई थी, उस को पाने की विफलता या डर, निराशा को जन्म देता हैं. लेकिन इसकी दवाई भी हैं, जिसका नाम संवाद हैं. और यही संवाद, यहाँ बहुत महत्वपूर्ण हैं. यकीन रखिये, संवाद के माध्यम से किसी की जिंदगी बनाई भी जा सकती हैं और बचाई भी जा सकती हैं. इस समय, यही संवाद जरूरी हैं, सोचिये, हम एक दिन में कितनी बार संवाद करते हैं मसलन सोसाइटी के वाच मैंन से लेकर, लिफ्ट मैन, सहकर्मी, इत्यादि, और अब सोचिये की अगर आप ये सारे संवाद ना करे तो क्या होगा ? मसलन कुछ २-३ दिन में अपना अपने अंदर निराशा को जन्म दे सकते हैं. लेकिन इस तरह के संवाद में कही भी क्रोध, तानशाही, इत्यादि ना होकर एक जरूरी और सामान्य संवाद हो रहा हैं, जो की महत्वपूर्ण ना  होकर भी महत्वपूर्ण हैं. कुछ इसी तरह से एक सामान्य संवाद जरूरी हैं किसी भी निराश व्यक्ति से. यहाँ, उसकी तनहाई या मुश्किल पूछने की बजाय उससे कुछ अति सामान्य संवाद करे जो की उसका विश्वास आप में जगा सके. जब ये विश्वास बन जाये तब बड़ी शालीनता से उसकी तकलीफ के बारे में बात करे लेकिन एक सामान्य व्यक्ति बन कर. यहाँ किसी भी तरह के ज्ञान या सलाह या अपनी सफलता दिखाने की बजाय, अपनी तकलीफों को संवाद के जरिये, निराश व्यक्ति से सांझा करे. यकीनन, आप एक जिंदगी को नयी उम्मीद या नई दिशा दे सकते हैं. अति महत्वपूर्ण, आप एक जिंदगी को बचा सकते हैं.

में कोई मानसिक डॉक्टर नही हु की कुछ किताबी जानकारी या किसी रिपोर्ट के माध्यम से कुछ जानकारी दू, लेकिन मेरा जीवन ही मेरे लिये एक पाठशाला हैं, उसी के तहत कुछ लिख रहा हु, अगर कही भी देहलीज को पार कर जाऊ तो माफ़ कर दीजियेगा. जीवन, में कुछ भी अचानक नही होता, सफलता और असफलता इस की परिभाषा देना मुश्किल हैं लेकिन जिन्होंने जीवन में प्रयास किया और इसकी तपश को समर्पित हुये, वही इसमें सफल हो पाये हैं लेकिन जो नहीं हो पाये, उनको निराश होने की बजाय अपनी असफलता से कुछ सिख लेकर, निरंतर सफलता के लिये प्रयास करते रहने चाहिये. और कही भी किसी भी रूप रेखा में अपने भीतर निराशा को जन्म ना लेने दे. और इसका एक ही हल हैं, संवाद और प्रयास. जय हिंद.

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