“दलित अछूत हैं, उनके वोट नहीं”- मार्टिन मक्वान

Translated from English to Hindi by Sidharth Bhatt.

जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ पिछले 30 सालों से, ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट मार्टिन मक्वान (Martin Macwan) दलित समुदाय के साथ काम कर रहे हैं। मार्टिन उन्हें संगठित करने की ओर भी प्रयासरत हैं। इसी क्रम में मार्टिन ने 1989 में नवसर्जन ट्रस्ट की स्थापना की। इसी दौरान दलित समुदाय के लिए ज़मीन अधिकार अभियान भी चलाए गएं। ऐसे ही एक अभियान में मार्टिन के चार साथियों को गोली मार दी गई। ये गोलियां सरकारी तंत्र के इशारों पर ही चलाई गई थी।

नवसर्जन ट्रस्ट की स्थापना और उत्पत्ति के पीछे दलित अधिकार ही एक मात्र उद्देश्य है। ये ट्रस्ट दलितों के साथ होने वाले भेदभाव, छुआछूत और मैन्युअल स्केवेंजिंग (मैला ढ़ोने) जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ लगातार मज़बूती से आवाज़ उठा रही है। 2016 में ऊना में दलितों को सार्वजनिक रूप से बेरहमी से मारा गया। इसी के विरोध में हुए दलित आन्दोलन में भी इस संस्था ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ऊना की घटना के कुछ महीनों बाद सरकार ने इस ट्रस्ट को मिलने वाली फॉरेन फंडिंग यानि कि विदेशी सहायता पर रोक लगा दी। वजह बताई गई  कि “इस संस्था को ऐसी अवांछित गतिविधियों में शामिल होने का दोषी पाया गया है” जिससे राज्य के विभिन्न समुदायों के बीच सौहार्द को नुकसान पहुंचा है।

Youth Ki Awaaz  ने मार्टिन से दलित अधिकार, दलित दमन और मौजूदा वक्त में दलितों की स्थिति पर बात की। मार्टिन ने संगठित दलित वोट, गुजरात में दलित समुदाय-सरकार के बीच बढ़ते फासले, रोहित वेमुला और खुद को मिले राष्ट्रविरोधी के तमगे पर बेबाकी से अपनी राय रखी।

शिखा शर्मा: गृह मंत्रालय ने आपकी संस्था के FCRA (फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट) लाइसेंस की दोबरा जांच की है और आपकी संस्था के ‘अवांछित’ गतिविधियों में शामिल होने की बात कही है। सरकार ने हाल में देश के सभी NGO पर भी सख्ती दिखाई है। ऐसे में आप अपने खिलाफ सरकार के इस आदेश को कैसे देखते हैं?

मार्टिन मक्वान: मैं इस सरकारी आदेश के तकनीकी पहलू से ज़्यादा संस्था पर लगे आरोपों को लेकर परेशान हूं। इसमें कहा गया है कि हमारी संस्था देश के हितों के लिए नुकसानदायक है और विभिन्न जातियों के बीच पूर्वाग्रहों और तनाव को बढ़ावा दे रही है। ये एक ऐसी संस्था के बारे में कहा जा रहा है जो पिछले 30 सालों से दलितों के अधिकारों को लेकर काम कर रही है। जिसने देश में पहली बार मैन्युअल स्केवेंजिंग जैसे मुद्दे के खिलाफ आवाज़ उठाई। एक ऐसी संस्था जो कहती है कि दलित केवल जाति का ही मुद्दा नहीं है बल्कि समाज में बराबर मौकों की उपलब्धता का हकदार भी है।                       

इस आदेश से साफ तौर पर ज़ाहिर होता है कि इस सरकार को जाति या पहचान आधारित राजनीति करने से कोई गुरेज़ नहीं है। वो दलितों के संगठित वोट से डरे हुए हैं। दलित भले ही अछूत हों लेकिन साफ तौर पर उनके वोट अछूत नहीं हैं। यह बदले की भावना से उठाया गया कदम है। एक संस्था के रूप में हमने सरकार के लिए कई परेशनियां खड़ी की हैं। ये सरकारी आदेश मुझ पर भी एक निजी हमला है। एक टेलीविजन इंटरव्यू के दौरान गौरक्षकों पर बोलते हुए मैंने कहा था कि मैं प्रधानमंत्री के पद का पूरा सम्मान करता हूँ लेकिन मुझे मोदी पर बिलकुल भी भरोसा नहीं है।

उनके गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान ही खुद को कानून से बढ़कर समझने वाली संस्थाएं (जैसे गौरक्षक) पनप रही थी और फल-फूल रही थी। अगर उन्हें सही में दलितों की फिक्र होती तो वो उनके हित में भूमि-सुधार का काम शुरू करते। मैन्युअल स्केवेंजिंग को खत्म करने के लिए, इसे उनके स्वछता मिशन का हिस्सा बनाते। मैंने हमेशा से ही उनकी राजनीति की तीखी आलोचना की है चाहे वो गुजरात के मुख्यमंत्री रहे हों या फिर देश के प्रधानमंत्री।

हम एक संस्था के रूप में हमेशा से ही दलितों को संगठित करने में कामयाब रहे हैं और ऊना की घटना ने इसमें खास भूमिका निभाई है। ज़रूरी मुद्दों को उठाना इस सरकार की नज़रों में हमें देशद्रोही बना देता है। अगर सही मुद्दों को उठाना मुझे देशद्रोही बनाता है तो मुझे देशद्रोही कहलाने में भी खुशी होगी।

शिखा: हमें ऊना की घटना के बारे में कुछ बताइये। दलित समुदाय के साथ आप इतने सालों से काम कर रहे हैं, ऐसा क्या हुआ कि ये इतना बड़ा मुद्दा बन गया?

मार्टिन: ऊना तो होना ही था। मुझे लगता है कि इसकी शुरुआत रोहित वेमुला की ‘आत्महत्या’ से हुई। बेशक गुजरात में भी लोग तुरंत बदलाव चाहते हैं। मेरे विचार में, ऊना की घटना के वायरल हुए विडियो ने लोगों के अंदर ज़बरदस्त गुस्सा भर दिया था। उस वीडियो में जिस तरह से सरेआम दलितों को मारते हुए, इसपर पुलिस को हंसते हुए दिखाया गया उसने लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया।

वीडियो से सीधा लोगों तक ये संदेश गया कि सरकार को उनकी कोई परवाह नहीं है। सरकार उनके लिए कुछ भी नहीं करने वाली है और वो उनके खिलाफ है। कश्मीर से आने वाली तस्वीरों ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई। पूरे गुजरात ने कश्मीरी युवा को पत्थर फेकते हुए देखा। इस वीडियो ने बस एक ट्रिगर का काम किया और फिर लोगों की भावनाएं खुलकर सामने आ गई।

शिखा: आपने अभी रोहित वेमुला का ज़िक्र किया, 17 जनवरी 2016 को रोहित की आत्महत्या को दो साल गुज़र गए। आपको लगता है कि रोहित को इंसाफ मिल पाएगा?

मार्टिन: मुझे नहीं लगता कि कुछ होगा। क्या हैदराबाद के वाईस चांसलर को प्रधानमंत्री ने सम्मानित नहीं किया था? ये एक बेहद ही अफ़सोस की बात है। यहां केवल एक ही बात नहीं है, आपको एक उदहारण देता हूं- मुझे पिछले साल नैशनल ज्यूडिशियल अकैडमी, भोपाल आमंत्रित किया गया था। आपको पता है उस दौरान उत्तर प्रदेश से आए एक जज ने मुझे क्या बताया? “सर ये सब कुछ वेदों और पुराणों में भी लिखा है। अगर हमारा देश इन धर्म ग्रंथों के हिसाब से चले तो, देश को किसी भी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।” ये एक जज का कहना है, हम नेताओं की तो आलोचना कर सकते हैं लेकिन न्यायपालिका या ज्यूडिशियरी की नहीं।

आप देखिये सरकारी स्तर पर क्या हो रहा है? जब हमने 2001 में पहली बार यूनाइटेड नेशंस (संयुक्त राष्ट्र संघ) में जाति का मुद्दा उठाया तो तत्कालीन यू.पी.ए. सरकार बेहद नाराज़ हो गयी। सरकार का कहना था कि देश में छुआछूत खत्म हो चुका है, इसलिए देश में जाति व्यवस्था का भी अस्तित्व नहीं है। ज़ाहिर है कि इससे कोई भी सहमत नहीं था। कहा गया कि जाति व्यवस्था देश का अंदरूनी मामला है।

शिखा: अगर रोहित के केस को देखें तो क्या ये पूरा मामला जाति पर ही आकर रुकता है?

मार्टिन: देखिये यहाँ दो बातें हैं। एक देश के रूप में, बाकी दुनिया के सामने जाति एक मुद्दा है इस बात को हम स्वीकार ही नहीं करना चाहते। जब आप ये स्वीकार करने की स्थिति में होंगे कि समस्या है, तभी उसका हल भी खोज पाएंगे। उसे ना मानने से मुश्किलें और बढ़ जाती हैं।

रोहित के मामले में जाति के मुद्दे ने न्याय मिलने की प्रक्रिया से भटकाया ही है। तमाम सरकारी अफसर और संसाधन ये ही पता करने में लगा दिए गए कि वो दलित या आदिवासी है या नहीं। जो ज़रूरी सवाल थे उन पर कुछ कहा ही नहीं गया कि रोहित को किस आधार पर निष्कासित किया गया, वो क्यों एक टेंट में रह रहा था, या कैंपस में हुआ उसका उत्पीड़न… ये तो जैसे कोई मुद्दा था ही नहीं।

शिखा: काफी समय से ‘वाइब्रेंट गुजरात’ की बातें की जा रही हैं। लेकिन मानवीय विकास के आंकड़ों को देखें तो गुजरात की तस्वीर कुछ और ही नज़र आती है। गुजरात में आखिर चल क्या रहा है?

मार्टिन: अभी गुजरात में तीन चीजें हो रही हैं- पहला ये कि वहां धार्मिक पहचान से जुड़ा एक चरमपंथी माहौल तैयार किया जा रहा है, दूसरा धनी व्यापारियों का अपने हितों के लिये नेताओं की फंडिंग और तीसरा, इन सब पर पुलिस और मीडिया की खामोशी। अब इशरत जहां का ही केस ले लीजिये, जितने भी बड़े अधिकारी आइजी और डीआइजी के खिलाफ जांच बिठाई गयी थी, सब के सब फ्री हैं। और तो और उनको पदोन्नति तक मिल चुकी है। देश के बाकी के राज्य गुजरात की इस कहानी को नहीं देख रहे हैं। लेकिन वहां के लोग ये सब जानते हैं और उनके अन्दर विरोध बढ़ता जा रहा है, ब्राह्मण और पटेल जैसी सवर्ण जातियों में भी। वो कह रहे हैं- हमने विकास के बारे में सुना तो है लेकिन वो हम तक पहुंचा नहीं है। ये सब है जो गुजरात में हो रहा है।

शिखा: नवसर्जन ट्रस्ट की अब आगे की क्या योजनाएं है?

मार्टिन: हमें मिलने वाली फंडिंग (आर्थिक सहायता) का 85 फ़ीसदी हिस्सा विदेशी फंड्स से आता है तो सरकार के इस आदेश का निश्चित रूप से हम पर बड़ा असर होगा। पिछले कुछ महीने काफी परेशान करने वाले रहे हैं।एक विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में, मैं सुंदरनगर में था जहां सारी व्यवस्था लोगों ने खुद ही की। लोगों ने हमें 5000 रूपए की सहायता राशि भी दी। आपको बता दूं कि ये सभी बेहद गरीब लोग हैं तो ये उनके लिए एक बड़ी धन राशी है। ऐसे कई लोग हमारी सहायता के लिए सामने आए हैं।

मुझे समझ नहीं आता कि विदेशी सहायता से क्या परेशानी है। सरकार खुद विदेशों से बड़ी मात्रा में सहायता हासिल करती है। अगर सरकार को मिलने वाली सहायता व्यापार, अर्थव्यवस्था और बुनियादी सुविधाओं के लिए फायदेमंद है तो लोगों की भलाई के लिए काम करने वाली गैर सरकारी संस्थाएं क्यों विदेशी फंड का इस्तेमाल नहीं कर सकती?

हालांकि मुझे इस बात की खुशी ज़रूर है कि हम अच्छा काम कर रहे हैं और सरकार का ध्यान भी हमने अपने काम से हमारी ओर खींचा है। सरकार से इनाम बड़ी आसानी से मिल जाते हैं। इस सरकार द्वारा नोटिस किया जाना हमारे लिए एक सम्मान की बात है। हम जो करते आये हैं वो आगे भी करते रहेंगे, पैसों की कमी न तो हमें तब रोक पायी थी जब हमने ये काम शुरू किया था और ना ही अब रोक पाएगी।

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