अब मान भी लीजिए कि यह गिरी हुई सोच हमारी सभ्यता है, वेस्टर्न नहीं।

Posted by gaurow gupta in Hindi, Sexism And Patriarchy, Society
January 7, 2017

बेंगलुरु की घटना देख कर हम और आप हैरान हो गएं। होना भी चाहिये, हम और आप संवेदनशील जो ठहरे। अख़बार, न्यूज़ चैनल जब तक दिखा रहे हैं, हम उनपर बहस करेंगे। फिर दो चार दिन बाद किसी नुक्कड़ पर वड़ा – पाव खाते हुए, देखेंगे कि बगल से गुज़र रही लड़की काश मान जाये। पब- डिस्क में हम बियर ऑफर करेंगे महज़ इसलिय क्योकि यहाँ आयी लड़की जल्द ही सोने के लिये तैयार हो जाती है। बहुत खुली हुई विचार की होती है, जो सिगरेट, शराब पीती है, हॉलीवुड मूवी देखती है। जो सेक्स पर खुल कर बात करती है, और ये फेमिनिस्ट टाइप तो सेक्स के बारे में ही सोचते रहती है।

आखिर ऐसे सोच क्यों पनपते हैं। ये हमारी आधुनिक सोच नहीं है, और न ही पाश्चात्य का असर है। हम और आप अपनी दूषित मानसिकता छुपाने के लिये बड़ी आसानी से ठीकरा आधुनिकता और पाश्चात्य संस्कृति पर फोड़ देते है। मान लीजिए अब कि यह गिरी हुई सोच सिर्फ और सिर्फ हमारी है।

कोई भी संस्कृति हमे यह नहीं सिखाती की हम बिना मर्जी के किसी के साथ ज़बरदस्ती कर सके। चाहे वो सांस्कृतिक भारत हो या बेशर्म पाश्चात्य ( इसे हम जैसे संस्कृति के ठेकेदार बोल देते है)। पाश्चात्य संस्कृति हमे जो सिखाता है, वो तो हम कभी सीख नहीं पाएं।

पिंक मूवी देख कर लगा था, अब सब कुछ बदल जायेगा। अब ना को ना ही समझा जायेगा। क्या उस रात लड़कियों ने ना नहीं बोला होगा। फिर क्यों हमारी मानसिकता अब तक स्वीकार नहीं पायी है, स्त्री की स्वतंत्रता? क्या स्त्री को सदियों तक एक पुरुष से सुरक्षा के लिये एक पुरुष को हमेशा साथ रखना होगा, या अकेली जा रही स्त्री का फिर शोषण किया जायेगा? और अपनी हवस शांत कर छोड़ देंगे सड़क पर तड़पता। हम कब बदलेंगे ? ऐसा सवाल हर बार उठता है, जब जब घटना घटती है। फिर ऐसे सवाल को तो हम भी फेसबुक, व्हाट्सअप के बहाव में बहाते है, एक जिम्मेदार पुरुष बनते है । और फिर जहाँ किसी लड़की का मैसज आता है, हम और आप सोचते हैं कि शायद वो दोस्ती के बाद सेक्स के लिये राज़ी हो ही जायेगी। यह बात मैं अपने अनुभव के स्तर पर कर रहा हूं। जहाँ मेरे आस- पास ऐसी बाते अक्सर होती है।

आदमी होना एक रातो रात का परिवर्तन नहीं है। आदमी होने के लिये हमें रोज आदमियत की सोच लानी होगी। वैसे तो हम और आप आदमी के भेष में जानवर तो सदियों से है। हमे अपने आप को जानवर कह कर भी, जानवर का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिये।
जहाँ पुरुष  स्त्री के अंत: वस्त्र देख शीघ्र पतन और स्वप्नदोष का शिकार हो जाता है।

हर दिन आदमी बनिये, और अपने साथियों को भी बनाइये । छोड़ दीजिये बहस राजनेताओं की कि उन्होंने क्या कहा, आप ने क्या किया गौर कीजिये। एक आवाज़ बनिए हर सेकंड हो रहे मोलेस्टेशन का,और मान लीजिये की रात को पार्टी करने वाली , शराब पीने वाली, सिगरेट की धुँआ उड़ाने वाली लड़कियां आपके हवस के लिये नहीं बनी है।

और जो ये सोचते है कि यह सब आधुनिक सोच और पाश्चात्य संस्कृति का दुष्परिणाम है, उन्हें यह बता दूँ की यह आपके और आपके दूषित सोच का भ्रम है। आधुनिक समाज में जी रहे आप जैसे रूढ़िवादी विचार का परिणाम है, जो स्त्री की स्वतंत्र इकाई को स्वीकार नहीं करते।

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