फिल्म- ‘आरक्षण का दाग’, डायरेक्टर-RSS, अभिनेता- मोहनs

Posted by KP Singh in Hindi, Politics
January 21, 2017

उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की सरगर्मियों के बीच आरएसएस के अखिल भारतीय विचारक मनमोहन वैद्य का आरक्षण को खत्म करने से सम्बंधित बयान सामने आया है। बिहार विधानसभा चुनाव के समय आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के इसी तरह के बयान का स्मरण अचानक इस मौके पर हो उठा है।

मोहन भागवत के इसी बयान को बिहार में भाजपा की लुटिया डूबे जाने का प्रमुख कारक माना जाता है। पीएम मोदी ने इसके बाद आरक्षण को कभी खत्म न होने देने की हुंकार लगातार काफी समय तक भरी। हालांकि सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी का बवंडर उठाकर उन्होंने तमाम मुद्दों की गर्द दबा दी जिनमें आरक्षण और मंदिर का मुद्दा भी शामिल है। इसके बावजूद आरएसएस ने आरक्षण के गड़े मुर्दे को फिर क्यों उखाड़ने की चेष्टा की। क्या आरएसएस मोदी को लेकर दुविधा में है जिसकी वजह से कभी मोदी के समर्थन में मजबूती से खड़े होने और कभी उनकी खाट खड़ी कर देने का भूत उस पर सवार होने लगता है।

मोहन भागवत के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले आरक्षण विरोधी बोल की वजह से बहुसंख्यक समाज में जो लामबंदी हुई उसका अनुमान लालू को नीतीश से भी ज्यादा सीटें मिलने से लगाया गया था। नीतीश सामाजिक न्याय के सिद्धांत के पक्ष में बहुत डटकर नहीं बोल पाते। संस्कार और शील, ऐसी कमजोरी के प्रतीक हैं जो प्रभावशालियों के विरुद्ध न्याय के तकाजे पर बोलते समय लरजने को मजबूर करते हैं। दूसरी ओर लालू विवादित स्टैंड पर उद्दंडता की हद तक गरजने से परहेज़ नहीं करते। इसका फायदा उन्हें मिलना लाज़मी था।

मनमोहन वैद्य के बयान के बाद भी आरएसएस पर सबसे उद्दत तरीके से हमला लालू यादव ने ही बोला है। हालांकि यूपी में वे रिश्तेदारों की खातिर किसी सीट पर अपनी पार्टी का उम्मीदवार खड़ा नहीं कर रहे। यानी यूपी में उनका कुछ भी दांव पर नहीं है लेकिन उनकी कुछ मामलों में बागी और बेकाबू चेतना उन्हें धैर्य धारण करके रहने नहीं दे सकती इसलिए वे मनमोहन वैद्य के बयान पर फट पड़े। जबकि यूपी में जिन रिश्तेदारों के लिए वे सब कुछ त्यागने को तैयार हो चुके हैं उन्होंने इस मुद्दे को भी फिलहाल नजरंदाज करके अपनी चिर-परिचित कुटिलता का ही प्रदर्शन किया है।

आरएसएस की राष्ट्रवादी फौज कितनी राष्ट्रवादी है, सोशल मीडिया पर इसके सक्रिय और मुखर नौजवान तबके की प्रतिक्रियाओं से यह ज़ाहिर हो जाता है। राष्ट्रवादी नौजवानों की सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति के कुछ कोण सामान्य हैं जो उनके स्टैंड का परिचय देते हैं। इनकी पोस्ट में कभी यह प्रदर्शित नहीं किया जाता कि उनका भारतीय या हिंदुस्तानी या इंडियन होना ही पर्याप्त है बजाय इसके यह अपने जातीय दम्भ को इस तरह के हवालों में प्रदर्शित करते हैं। उनकी पोस्ट एक तरह से तुलना बन जाती है जिसमें दुनिया के दूसरे लोगों से अपने को आगे बताने की मंशा नहीं अपने देश में ही अपनी जाति के दूसरे भाइयों से जन्मजात श्रेष्ठता सिद्ध करने का भाव झलकता है। क्या देश के अंदर औपनिवेशिक मानसिकता का यह प्रदर्शन करने वाले अपने को कहीं से राष्ट्रवादी कहलाने के अधिकारी हैं।

दरअसल अपने मन की गंदगी निकालने वाले यह लोग सबसे बड़े देशद्रोही हैं जिनका दमन जब तक नहीं होगा तब तक भारत एक देश के रूप में संगठित और मजबूत कभी नहीं हो पायेगा। आरएसएस की यह फौज दूसरा काम आरक्षण के बारे में सोशल मीडिया पर झूठी पोस्ट डालने का काम करती है। बार-बार यह आता है कि गुजरात हाईकोर्ट ने जनरल कैटेगरी के पदों पर आरक्षित श्रेणी के लोगों को आवेदन से रोक दिया है। यह बेवकूफ लोग जनरल माने अपने लिए आरक्षण मान बैठे हैं जबकि यह अनारक्षित क्षेत्र का द्योतक है जिसमें किसी को भी दावेदारी करने से रोका नहीं जा सकता।

अमेरिका सहित दुनिया के दूसरे कई देशों में आरक्षण का प्रावधान रहा है लेकिन ऐसी व्यवस्था को लेकर जैसी घृणापूर्ण अभिव्यक्तियां इस देश में हो रही हैं वैसी निकृष्ट अभिव्यक्ति दुनिया के किसी देश के अगड़े लोगों ने हाशिये के वर्गों को उत्थान की कोशिशों पर नहीं कीं।

सोशल मीडिया का यह नजारा आरएसएस की विचारधारा का प्रतिबिम्ब है, जिससे पता चलता है कि हिंदू राष्ट्र पर उसका इतना ज़ोर क्यों है। गैर धर्मावलम्बियों से बदले की बात तो इसमें बाद में है। पहले तो यह है कि जन्म आधारित ऊंच-नीच की जो ईश्वरीय व्यवस्था है उसे बहाल करने की कटिबद्ध मंशा इसमें निहित है। ताकि धर्म को जो हानि हो रही है उसे रोका जा सके। कृष्ण यदुकुल में जन्मे थे। कभी-कभी भगवान अधर्म को रोकने के लिए शूद्र बनकर भी जन्म लेते हैं। पीएम मोदी यानी समकालीन व्यवस्था के प्रभु उन्हें आरक्षण का दाग मिटाने के अवतार के रूप में ऐसे लोग देख रहे हैं, तो इसमें आश्चर्य क्या है।

इसलिए मोदी कुछ भी कहें, आरएसएस की सोशल मीडिया फौज एक ओर अपने को उनका सबसे बड़ा भक्त भी साबित करती है। और दूसरी ओर इस उम्मीद की चिंगारी को ज्वाला के रूप में भड़काने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रही कि आरक्षण रूपी असुर का वध उन्हीं के सुदर्शन चक्र से होगा।

अब होगा क्या, यह तो दूर की बात है लेकिन यहां यथार्थ जो है वह बहुत गौरतलब है। जिस देश में बहुसंख्यक समाज को व्यवस्था में हिस्सेदारी से दूर रखा गया हो उस देश में सामाजिक, राजनैतिक स्थिरता हमेशा डांवाडोल रहेगी। आजादी के पहले का मंजर इसका गवाह है। जब दुनिया के सबसे स्वयंभू विद्वानों और पराक्रमियों ने इस देश के भाग्य की डोर अपनी मुट्ठी में कैद कर रखी थी। उस समय दो सौ के मुकाबले दो लाख सूरमाओं के होते हुए भी पिट जाने और जूते खाने का जो विश्व रिकार्ड भारत में कायम किया गया उसे आज तक कोई देश नहीं तोड़ पाया है।

न कोई मंत्र इस देश के अभाग्य को रोकने में कारगर हो पाया, न कोई पूजा।आरक्षण की प्रणाली से जो सर्व समावेशी व्यवस्था पहली बार भारत में बनी है उसके चलते आज आर्थिक हो या सैन्य हर मोर्चे पर उसे महाशक्ति का रुतबा मिला हुआ है। इस रुतबे को तार-तार करने वालों के साथ बोल क्या सुलूक किया जाये, मार दिया जाये या……………।

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