“विस्थापन सिर्फ कश्मीर से नहीं हुआ है”

Posted by Deepak Bhaskar in Hindi, Society
January 19, 2017

विस्थापन भारत की ही नहीं बल्कि एक वैश्विक समस्या है। एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व के 52 देशों में 25 मिलियन लोगों का विस्थापन हुआ है। भारत में 6 लाख लोग अभी तक विस्थापन का दंश झेल चुके हैं, जिनमें अकेले कश्मीर से 2 लाख लोग विस्थापित हुए हैं। कश्मीर भारत का वो अभिन्न अंग है जहां पर बर्फ-बारी से लेकर गोली-बारी तक का असर देश के अन्य क्षेत्रों पर बहुत गहरे तौर पर पड़ता है। कश्मीर में हुई या हो रही किसी भी घटना को भारत के नागरिक ऐसे ही नहीं छोड़ देते। उसपर बहस होती है, मुद्दा बनता है, और फिर से बहस होती है।

उन्हीं हजारों मुद्दों में एक मुद्दा, कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का भी है। भारतीय राजनीति सालों से इस मुद्दे को और ये मुद्दा सालों से भारत की राजनीति को प्रभावित करता रहा है। जगह-जगह, इस विस्थापन पर सेमिनार, कांफ्रेंस, पब्लिक मीटिंग्स हुई हैं या फिर होती-ही रहती हैं। इनके पुनर्वास के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के पास अपने-अपने मॉडल भी हैं। बहरहाल, उनका पुनर्वास होना चाहिए और सिर्फ बात ही नहीं बल्कि इस दिशा में त्वरित गति से काम भी होना चाहिए।

लेकिन जब सिर्फ कश्मीरी पंडितों के विस्थापन पर इतना ज़्यादा हंगामा किया जाता है, बाकि विस्थापितों को उनकी नियति पर छोड़ दिया जाता है। तब यह सोचना ज़रूरी हो जाता है कि कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास का नहीं बल्कि राजनीति का मुद्दा है। विस्थापन के कई कारण बताए जाते हैं। कश्मीर से विस्थापन वहां फैल रहे आतंकवाद/अतिधर्मवाद/साम्प्रदायिकता का नतीजा था। तो क्या जब इन कारणों से विस्थापन होंगे तभी यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा होगा?

विस्थापित कश्मीरी पंडित भारत के विभिन्न हिस्सों में बसे हुए हैं। घर-बार उजड़ जाने का दर्द है और उसके साथ सिर्फ सहानुभूति नहीं बल्कि सरोकार भी है। लेकिन उन लोगों से हमारा सरोकार क्यों नहीं जिनके घर किसी आतंकवादी ने नहीं बल्कि उन्हीं के द्वारा चुनी हुई सरकार ने उजाड़ दिए।

विकास के नाम पर हो रहे अन्याय में लाखों लोग बेघर हो गए, हजारों गांव जलमग्न हो गए, कितने पहाड़ गड्ढे बन गए, कितनी औरतें निवस्त्र हो गयी, कितने बच्चे अनाथ हो गए। जब उनके घर के नीचे जमे एल्यूमीनियम, लोहे और कई तरह के खनिज, उनके घर उजाड़ कर निकाले जा रहे थे तब इस देश में कोई बहस नहीं हो रही थी। तब शहर को मेट्रो रेल चाहिए थी और एलइडी बल्ब की रौशनी से सराबोर सड़कें चाहिए थी। जब देश की सरकार ही लोगों के घर बसाने के बजाय उनका घर उजाड़ने लगे तो वह देश कहां रह जाता है।

राष्ट्र की उन्नति और सुरक्षा के लिए इन्हीं की बलि दी जानी थी, सो दी गयी। जब उत्तर-पूर्वी राज्यों में हाहाकार मचा हुआ था, हजारों लोग विस्थापित हो रहे थे, जब वो लोग अपने ही देश के बंदूकों का शिकार हो रहे थे, तब हम चुप थे। जब ओडिशा, झारखंड, छतीसगढ़, मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश में नई इंडस्ट्री लगाने के नाम पर उनकी ज़मीनें, अचानक राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दी जा रही थी तब हम चुप थे।

जब हमारे घरों में बिजली की आपूर्ति के लिए सरदार सरोवर बांध की ऊँचाई बढ़ायी जा रही थी और हजारों गांव जलमग्न हो रहे थे तब हम क्रिकेट का एनालिसिस कर रहे थे। जब बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल जैसे राज्यों से भूमिहीन मज़दूर, परिवारों को लेकर पलायन कर रहे थे तब भी हम सब चुप थे। जब ये लोग वहां से निकले तो इन्हीं के हाथों और साधनों से बने शहर ने इन्हें गंदे नाले के बांध पर, जुग्गी –झोपड़ियों में धकेल दिया। तब भी हम इनकी नियति को ही दोषी मानते थे, सरकार की नीतियां तो हमारे पक्ष में ही थी।

कश्मीरी पंडित गोली से भी मरे थे लेकिन इस देश के गरीब, पिछड़े, आदिवासी तो भूख से मरे हैं। वो आतंकवादियों की, दंगाईयों की गोली से मरे थे तो यहां लोग अपने सरकार की नीतियों का शिकार हुए थे। शहर में रहने वाली सरकार ने गांव को कितना पीछे छोड़ दिया था। कश्मीरी पंडितों के लिए तो हमने आतंकवाद को कारण मानते हुए, पाकिस्तान को जमकर कोसा। लेकिन बाकि चार लाख लोगों के लिए किसको कोसेंगे?

क्या भारत सरकार को कोसना नहीं चाहिए? क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि गुजरात दंगों के बाद वहां से हज़ारों परिवार विस्थापित हुए, मुज्जफरनगर दंगे के बाद आज भी लोग वापस वहां जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। असाम, मालदा (बंगाल) से विस्थापन, इसके लिए किस पाकिस्तान को जिम्मेदार मानेंगे हम?

विस्थापित लोग हमारे शहर के फ्लाईओवर के नीचे रहने लगे। हम उन्हें हमारे शहर को गंदा करने के नाम पर यहां से वहां भेजते रहे। पुनर्वास के नाम पर कागज के घर मिले जो ज़मीन पर थे ही नहीं। मेधा पाटेकर ने शहर-शहर घूमकर इन गांव को बचाने की गुहार लगाई, लेकिन हम अपनी सहूलियत के लिए हमारी मेहनत और उनकी बद्जिंदगी के लिए उसकी नियति को दोषी मानते रहे। सरकार हमारी थी इसिलए हर छह महीने पर वेतन बढ़ाते रहे और मजदूर हमारी नैतिकता पर आश्रित थे।

बहरहाल, विस्थापन सिर्फ कश्मीर से नहीं हुआ है बल्कि इस देश के हर कोने से हुआ है, हर गांव से हुआ है। कारण बस अलग-अलग रहे हैं। कहीं पाकिस्तान की नीतियां तो कहीं भारत की। भारत सरकार की विकासोनुम्ख नीतियों में अगर देश के हर कोने जुड़े होते तो आज ये संख्या 6 लाख नहीं होती। देश के हर नागरिक को, कश्मीरी पंडितों को भी इन चार लाख लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए। आखिरकार, दोनों का दर्द भी तो एक ही है।

आभार: गेटी इमेजेस

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