ओम पुरी वाया गुलज़ार

Posted by syedstauheed in Culture-Vulture, Hindi
January 6, 2017

विडम्बना जीवन का अटूट सत्य हुआ करती है। वो एक परेशान करने वाले यथार्थ की तरह उपस्थित रहती है। दूसरे शब्दों में कहें तो यथार्थ स्वयं को विडम्बना के रुप में भी व्यक्त करता है। दिल को झकझोर कर व्यक्ति को घटनाओं पे मंथन करने को बाध्य करने वाली बात विडम्बना ही होती है। जीवन में जो कुछ घटित हो रहा, उसमें विडम्बनाओं को तलाश किया जा सकता है। कभी -कभी वो स्वयं ही चीजें खोज लेती है। जीवन का यथार्थ व्यक्ति को विचार करने को कहता है। संसाधन उपलब्ध रहते हुए किसी का बिन संसाधन मर जाना, एक घोर विडम्बना है। विडम्बना यह कि देश को अन्न खिलाने वाला किसान स्वयं भूखा मरने को मजबूर हो रहा है।

विडम्बनाएं असमानता से जन्म लेती हैं। जब तक चीजों में असमानताएं रहेंगी, विडम्बनाओं का यथार्थ बना रहेगा। विडम्बना यह कि समय रहते समय पे काम नहीं किया जा सका। आदमी समय से सबसे अधिक मात खा रहा, खाता है। तक़दीर भी उसकी कम परीक्षा नहीं लेती, ऐसे में विश्वास कायम होने लगता है कि रेखाओं का खेल है मुकद्दर, रेखाओं से मात खा रहे हैं। बांग्ला कथाकार मनोज बासु की कहानी ‘बेल नींबू’ जीवन के यथार्थ को नज़दीक से अनुभव करने वाला एक सशक्त बयान थी। शायद यही कारण रहा होगा कि गुलज़ार साहेब ने इसे टेलीविजन के लिए रूपांतरित भी किया।

हेमू (ओम पुरी) की लड़की गुलाबी ने छोटे सरकार (एस एम ज़हीर) से प्यार के सबूत के रुप मे बेल नींबू मांगा था। उसने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि उसके पिता को यह काम करना पड़ेगा। मालिक ने दीवान को बुलाकर सख्त लहजे में कह डाला कि आज शाम तक बेल नीम्बू लाकर दो, नहीं तो पूरी कचहरी उठवा दूंगा। कचहरी में काम कर रहे लोगों के समक्ष अचानक से एक लटकती तलवार थी। सर पड़ी मुसीबत से निपटने का रास्ता हेमू माली की ओर से गुजरता था। छोटे सरकार ने दीवान को हुक्म दिया, दीवान ने चित्तरंजन बाबू से तलब किया, चित्तरंजन से होते हुए नीलकंठ फ़िर हेमू तक पहुंची। निर्धन हेमू इस खातिर की हाथ में कुछ रुपए आ जाएंगे, बेल नींबू की खोज में नदी पार दूसरे गांव चला गया। नींबू तो वो ले आया, लेकिन वापस आकर उसकी तबीयत बिगड़ गई। दवा नहीं हो सकने कारण वो असमय ही चल बसा।

स्वयं के लिए लाई गई दवा (बेल नींबू) खुद हेमू की जान नहीं बचा सकी, बल्कि एक तरह से जानलेवा बनी। मनोज बासु की कहानी में जीवन का मार्मिक चित्रण मिलता है। पीलिया से पीड़ित हेमू बीमारी की हालत में दूसरे गांव चला गया। अप्रैल महीने में बेल नींबू का सीजन नहीं होता, इस महीने में उसका मिलना नामुमकिन के क़रीब होता है। हेमू को बीमारी की हालत में नहीं जाना चाहिए था, किंतु घर की हालत देखकर कठोर निर्णय लेना पड़ा था। घर चलाने के लिए बीमारी की हालत में भी गरीबों को कई-कई दिन मज़दूरी करनी पड़ती है। काम की हालत में बहुत लोग बे-दवा मर जाते हैं। हेमू में उन निर्धन-मज़बूर लोगों का दर्द महसूस होता है।

अपने गांव में बनमाली जी के पास बेल नींबू के पेड़ थे, लेकिन किसी काम के नहीं। नदी पार मनोज बाबू के यहां पांच-छह पेड़ थे। लेकिन अप्रैल में मौसम नहीं था, इसलिए हेमू माली (ओमपुरी) नींबू मिलने को लेकर आशंकित था। युधिष्ठिर जी से हेमू की पहचान नहीं थी ,इसलिए एकबारगी में वो नीलकंठ को हां नहीं कर रहा था। बेल नींबू का भादों में मौसम होता है। नदी पार करते हुए एक मुसाफिर ने हेमू माली को थोड़ा निराश किया कि भादों में आए होते, तो हम भी दिला देते नींबू, किंतु इस मौसम में कहां मिलेगा! बहरहाल नदी पार कर हेमू पास के गांव में चला गया, इस आशा में कि बेल नींबू वहां ज़रूर मिल जाएंगे।

वहां कोरता बाबू के मकान के पास पहुंच कर नमस्कार किया, नमस्कार कोरता बाबू। आपके यहां बेल नीम्बू के पेड़ हैं ना! एक नींबू चाहिए था। मगर इस अप्रैल में हेमू को बेल नींबू की क्या ज़रूरत पड़ गई थी? कोरता बाबू ने गांव में किसी को पीलिया होने की बात पूछी, जिसका जवाब हेमू ने हां में दिया। लेकिन कोरता बाबू ने यह कहकर निराश किया कि ‘पेड़ तो मेरे अहाते में है सही, लेकिन किसी काम के नहीं। फूल आते हैं, झड़ जाते हैं। फल तो कभी लगा ही नहीं।’ हेमू स्वयं ही पीलिया का रोगी था। लेकिन विडम्बना देखें कि उसे तनिक भी आभास नहीं था कि दरअसल वो खुद ही के लिए उस गांव से इस गांव आया था।

कोरता बाबू के यहां से होकर हेमू युधिष्ठिर बाबू के बगान में पहुंचा। उसे वैद्य जी ने बताया था कि वहां बेल नींबू उतरे हैं। पूरे तीन नींबू थे, लेकिन बे-मौसम। सो उन्होने गोपाल नामक शख्स को दे दिया। गोपाल की कुटिया मंदिर के पीछे कहीं थी। नींबू की खोज में हेमू वहां गया। इस बार किस्मत उस गरीब के साथ थी। गोपाल के पास से उसे नींबू मिल गया। हेमू की तबीयत अब काफी बिगड़ रही थी, वैद्य कोरता बाबू ने उसे टोका भी था। वो किसी तरह वापस अपने गांव लौटा।

सफर की वजह से अस्वस्थ हेमू की हालत काफी बिगड़ चुकी थी। नींबू लाने के दौरान वो गिर भी पड़ा था। दो रुपए की चीज़ के लिए हेमू ने अपनी जान खतरे में डाल दी। दो रुपए के नींबू के लिए नीलकंठ ने चित्तरंजन से दस लिए, चित्तरंजन ने दीवान से तीस लिए। क्योंकि दीवान की खुशी का ठिकाना नहीं था, जान बची सो नींबू पाए चरितार्थ हो रहा था। विडम्बना देखें जान जोखिम में डाल जिसने नींबू लाया, उसे महज दो रुपए मिलें।

छोटे सरकार ने दीवान से कहकर यह नींबू गुलाबी के खातिर मंगवाया था। गुलाबी को तनिक संज्ञान नहीं था कि पिता हेमू के लिए मंगाया बेल नींबू, पिता के मरने का एक कारण बनेगा। जिंदगी देने वाला ‘नसीब’ नहीं बनेगा। जब तक हेमू को बेल नींबू वापस मिलता। तब तक तो बहुत देर हो चुकी थी। गुलाबी को कहीं अंदाज़ा नहीं होगा कि रोगी की खातिर मंगवाई दवा, उसी की जान जाने का सबब बन जाएगी। हेमू को बेल नींबू तो मिला, लेकिन मरने के बाद। एक तरह से दवा भी अपने बीमार मरीज़ के बे-दवा मर जाने पर विलाप सी कर रही थी। आखिर गुलाबी के हाथ से गिरा बेल नींबू मृत हेमू के शरीर के पास आकर ही क्यों रुका? गुलज़ार का रचा यह दृश्य क्या संकेत कर रहा था?

गुलाबी की पीड़ा का अंदाजा लगाएं कि वक्त रहते उसके पिता को बेल नींबू नसीब नहीं हो सका। क्या गुज़रेगी उस पर, जब उसे पता चलेगा कि उसके पिता का लाया बेल नींबू उन्हीं के काम नहीं आ सका। काश वो हेमू को बता पाती कि वो उनके लिए बेल नींबू का इंतजाम कर रही है! गुलज़ार ने गुलाबी को पहुचने वाली पीड़ा का संकेत दिया है। दवा, दवा नही बन पाई का उदाहरण देखना चाह रहें तो गुलज़ार के बनाये धारावाहिक ‘किरदार’ की कथा ‘बेल नींबू’ देखें। बेल नींबू का प्रभाव हमें जीवन की विडम्बनाओं का साक्षात कराता है। मन-मस्तिष्क पर छाप छोड़ने वाली कहानी से परिचित कराने के लिए गुलज़ार साहब का शुक्रिया अदा करना चाहिए। ओम पुरी के अभिनय में हेमू का सच्चा अक्स नज़र आता है।

अभिनेता ओम पुरी बेशक अब इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनकी आवाज अमर रहेगी। सैकड़ों बार हज़ार तरह के अभिनय किये। झरना नहीं थकता, नदी नहीं थकती। ओम पुरी जीवन भर बिना थके, बिना ऊबे काम करते रहे। ओम पुरी नहीं रहे। एक विलक्षण अभिनेता अचानक मंच छोड़कर चला गया। जब कोई कलाकार ऐसे जाता है जब उसमें खर्च होने को बहुत कुछ बाकी है तब बहुत दुःख होता है, ओमपुरी ऐसे ही कलाकार थे। समकालीन अभिनेता भी ओम पुरी को बेहतरीन अभिनेता मानते थे। नसीरुद्दीन शाह ने अपनी आत्मकथा में उनके बारे लिखा है।

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