जब पटना यूनिवर्सिटी के लड़कों ने दिन दहाड़े किया मेरा उत्पीड़न

“जानू…ऐ स्वीटी, ब्वॉयफ्रेंड ढ़ूंढ रही हो क्या? सुनो न, अरे डार्लिंग हम यही हैं, क्या चाहिए,सबकुछ है हमारे पास, बहुत देर टिकते हैं हम, आजमा के तो देखो।” गंदी-गंदी हरकतें और उनसे भी भद्दी गालियां परोसी जा रही थी और हम सुन रहे थे, निगले जा रहे थे, कि तभी अटक गयी उनकी बात गले में। बस अब मैं और चुप नहीं रह सकती, पटना कॉलेज के भीतर मैंने मेरी बहिन से कहा तुम मत बोलो, पर मैं तो बोलूंगी “हां साले,तेरी यही औकात है। मां ने यही सिखाया है?” मैंने गुस्से में कहा।

कुछ देर सन्नाटा पसरा, मानो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि हमने कुछ बोला है। थोड़ी ही देर बाद वो दहाड़ने लगे, “तेरी इतनी हिम्मत, तू रूक! आज तेरा यहीं सत्यानाश होगा। बड़ी गरमी चढ़ी है, आ उतारता हूं, आ….” और वो हमारे पीछे आने लगे। सांसे अचानक तेज़ हो गई। एक ही पल मैं खुद को कोसने लगी कि कुछ देर और सुन लेती तो बात न बिगड़ती। मेरी बहनें मेरा हाथ खींचते हुए तेज़ी में बढ़ने लगी।

“हो गया न, मिल गई तसल्ली? क्या ज़रूरत थी पलट के जवाब देने की? आ रहे हैं न अब पीछे हमारे। तुम तो चली जाओगी, हमें तो इसी कॉलेज में रहना है। लास्ट सेमेस्टर था हमारा, अब ये जीना हराम कर देंगे”, मेरी बड़ी बहन डर गई थी। मैं भी, मगर डर की शिकन को चेहरे पर हावी न होने दिया। हम दूसरी गली की तरफ तेजी़ में निकलने वाले थे, तभी कैंपस में पुलिस की जिप्सी जाते दिखी। पीछे मुड़ के देखा तो वो लड़के अब हमारा पीछा तो नहीं कर रहे थे। मगर हम बहुत डरे हुए थे, खासकर मेरी बहनें। हमने जिप्सी को रोकना मुनासिब समझा और गाड़ी रूकी भी।

मैंने शिकायत की, “मैं पटना वीमेंस कॉलेज की स्टूडेंट हूं। मार्कशीट में नाम की स्पेलिंग गलत थी तो उसी कि करेक्शन के सिलसिले में वाइस चांसलर के ऑफिस वाली बिल्डिंग में जाना था। मेरी बहनें दरभंगा हॉउस वाली बिल्डिंग में पढ़ती हैं। उन्होंने मुझे वहीं बुलाया था, फिर वहां से उन्हीं के साथ जा रही थी। हम साथ में आगे बढ़ रहे थे…” इतने में मेरी बहन ने एक हवलदार से पूछा- “भैया वाइस चांसलर की ऑफिस का रास्ता किधर से पड़ता है?” उसने रास्ता दिखाते हुए कहा- “इधर से जाइये न, तुरंत पहुंच जाइयेगा। रोड की तरफ निकलना भी नहीं पड़ेगा। बस दूसरी वाली बिल्डिंग ही तो वाइस चांसलर का है।”

हम आगे बढ़ गये, रास्ता सुनसान था। इक्के-दुक्के लोग, कुछ मज़दूर और घास काटने वाली औरतें ही दिख रही थी। हमें नहीं पता था ये ब्वॉयज़ हॉस्टल वाला रास्ता है। पर जैसे ही हॉस्टल की तरफ आये, बहन ने बोला- “अरे! बड़ी भूल हो गई। ये रास्ता तो हॉस्टल की तरफ से गुज़रता है।” तो मैंने कहा, “तो क्या हो गया? खा थोड़े जाएंगे।” उसने कहा- “मत पूछो पिछली बार कितनी बातें सुननी पड़ी थी। मगर हमने कुछ बोला नहीं सो बच गये। प्लीज़ तुम भी कुछ मत बोलना।” मैंने उसे आश्वस्त किया- “नहीं बोलूंगी, चिंता मत करो।” हम चल रहे थे कि तभी अंडरवियर और गमछा लपेटे छात्र, उन्हें छात्र कहना उन सभी लोगों का अपमान लगता है जो सही मायनों में छात्र हैं। खैर, वो कहने लगे “इधर क्या देख रही हो जान, भीतर आओ बहुत चीज़ें दिखायेंगे।” हम चुपचाप आगे निकल गये कि तभी हॉस्टल की गेट पर खड़े कुछ लड़के इतनी भद्दी-भद्दी बातें बोलने लगे कि कोई सुने तो कान से खून निकल आये। पहले हम चुप रहे मगर जब असहनीय होने पर जवाब दिया तो वो इतने बौखला गये कि लगा सरेआम दिन के उजाले में हमारा रेप कर देंगे। वहां खड़े लोग बस मूकदर्शक बने रहे, किसी ने चूं तक नहीं किया।

हम वापस वहीं पहुंचे जहाँ हमें पुलिस की जिप्सी मिली थी वो अब भी वहीं थी। इस घटना के बारे में बताते हुए जिप्सी में बैठे पुलिस ऑफिसर से मैंने गुस्से में कहा, “कोई सरेआम कॉलेज कैंपस में लड़कियों के साथ बेहूदगी करता है और आप लोग सुरक्षा देने के नाम पर बस जिप्सी घुमाते हैं? ये तो हमेशा सुन के चुप रहती हैं पर मैं पहली बार आई थी इस कॉलेज। ऐसी स्थिती देख के विश्वास ही नहीं हो रहा कि पटना कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की ये स्थिती है।” पुलिस ऑफिसर ने जवाब दिया, “तुम लोगों ने मारा क्यों नहीं? उठा के फेंक देती एक ईंट, फट जाता कपार सालों का।” मैंने कहा, बोलने पर तो इतनी आफत आन पड़ी, कुछ कर दिया होता तो ना जाने क्या करते? पुलिस ऑफिसर ने फिर कहा, “अच्छा, लिखित शिकायत दोगी? एफआईआर फाईल कर दो, हम मजबूती से एक्शन ले पाएंगे। या पहचानोगी उन्हें? चलो हमारे साथ।”

ये सुन के मेरी बहनों ने साफ मना कर दिया, वैसे मन तो मेरा भी नहीं था। एफआईआर से भला क्या होना है? मैंने कहा, “मैं इस कॉलेज की स्टूडेंट तो हूं नहीं मगर मेरी बहनें पढ़ती हैं यहां। लास्ट सेमेस्टर है सर इनका। कॉलेज की क्या स्थिती है ये सभी जानते हैं, शिक्षक तक तो थर-थर कांपते हैं इन दबंगों से। कल को क्लास में घुस के कुछ कर भी दिये तो आप लोग कुछ नहीं कर पाएंगे। हमें कंप्लेन नहीं कराना पर आपको सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेनी होगी। लड़कों को धमकाइये और कैंपस में लड़कियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी को अच्छे से निभाइये।” वायरलेस पर किसी दूसरे पुलिस ऑफिसर को उन्होंने सारी बातें बताई। “अच्छा, यहीं रूको कुछ पुलिस ऑफिसर आएंगे, उन्हें सारी बातें बताना वो कारवाई करेंगे।” इतना कहकर वो हमें वहां छोड़कर चले गये। उनके जाते ही लड़कों का एक बड़ा झुंड हमारी तरफ आता दिखा, वो भी चालू सड़क पर दोपहर 1 बजे, हम सहम गये। कुछ और फब्तियों को हमने सहा।

10 मिनट खड़े रहने के बाद 5-6 हवलदार और एक पुलिस ऑफिसर की टीम आई। देखकर लगा मानो आज ही के आज पूरी स्थिती सुधार के रख देंगे हमने उन्हें पूरी बात बताई। “वैसे तो पहली बार कम्पलेन आई है, कभी कम्पलेन तो आई नहीं ऐसी”, उन्होंने कहा। मैंने जवाब दिया, “हो सकता है लड़कियों ने हिम्मत ना की हो बोलने की।” हामी भरते हुए उन्होंने कहा, “पहचान लेंगे उन्हें आप लोग?” मैंने कहा, “अब भला कैसे पहचानते? हम तो सामने देखते हुए बढ़े जा रहे थे। शक्ल क्या देखते उनकी। वो इस लायक भी नहीं थे।” काफी ठंडे एटिट्यूड में उन्होंने जवाब दिया, “ठीक है हम देखते हैं, जाकर खबर लेते हैं उनकी।” मैंने गुस्से में उनसे कहा, “देखते हैं? क्या देखते हैं, सर? पेपर पढ़ते हैं या नहीं? बेंगलुरू में क्या हुआ मालूम नहीं है क्या? फिर भी सक्रियता नहीं दिखती आप लोगों में।” तभी मेरी कही बात पर उनमें से एक हवलदार मुस्कुराने लगा मानो मैंने कोई मज़ाक किया हो। मैं समझ गई- ये घंटा कुछ करेंगे और बस वहां से निकल गई।

रास्ते भर मेरी बहनें बातें करते हुए चल रही थी- “पटना कब सुधरेगा? पटना कॉलेज कब सुधरेगा? इनकी मानसिकता कब बदलेगी? कल को हमारे साथ कुछ किया तो क्या करेंगे? घरवालों को मत बताना वरना कॉलेज जाने से मना कर देंगे।

“सुनो प्रेरणा, घर पे कहना हमारा कॉलेज दस दिनों तक बंद है। दस दिनों में तो वो भूल ही जाएंगे, है न? तुम कुछ बोल क्यों नहीं रही? बोलती बंद क्यों हो गई तुम्हारी? सारी क्रांति मिट्टी में मिल गई न।” “हम्म…….शायद”, मैंने जवाब में कहा। मेरी बहन ने कहा, “तुम प्लीज कभी इस नरक में एडमिशन ना लेना, मुझे ही मालूम है कितना गिर कर, अपने आत्मसम्मान को मार कर मैंने ये दो साल इस कॉलेज में काटे हैं। अब देखो अंतिम-अंतिम तक एक और लफड़ा हो ग़या।”

मैं हैरान थी, सच कहूं तो हारा हुआ और अपमानित महसूस कर रही थी। उन लड़कों ने हमें क्या कुछ ना कहा था, किसी सड़क या ब्रिज पर नहीं, ना मार्केट या मेले में, कॉलेज की कैंपस में हुआ ये। कोई रात के 8, 9, 10, 11 या 12 नहीं बज रहे थे। दिन था, एकदम उजाला, दोपहर के एक बजे।

फोटो प्रतीकात्मक है।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.

REPORT THIS POST