राजनीति को धर्म से अलग कर दीजिए लेकिन धर्म से राजनीति अलग नहीं हो सकती

Posted by Sunil Jain Rahi in Hindi, Politics
January 8, 2017

रणभेरी बज गई। पंजाब उड़ने लगा है, दिल्‍ली फड़फड़ाने लगी है, गोवा बहकने लगा है, उत्‍तर प्रदेश ड्राइवर की तलाश में भटकने लगा, उत्‍तराखंड की ठिठुरन बढ़ने लगी है और मणिपुर पार्टी दलबदल के लिए तैयार है।

रणभेरी की आवाज से पहले घोषणा हो चुकी है, राजनीति धर्म का सहारा नहीं लेगी। राजनीति को धर्म से अलग रखा जाए। शायद पहली बार कहा गया है, सच है। राजनीति तो हमेशा से धर्म से अलग रही है। बल्कि धर्म की राजनीति लोग करते हैं। राजनीति से धर्म का निष्‍कासन हो जाता है तो राजनीति धर्म निरपेक्ष हो जाएगी। धर्म निरपेक्षता केवल चुनाव के समय दिखाई देती है। अगर धर्म निरपेक्ष हैं तो मंदिरों और मस्जिदों से ईश्‍वर-अल्‍ला के नाम से फरमान जारी नहीं होने होते।

राजनीति को धर्म से अलग कर दीजिए लेकिन धर्म से राजनीति अलग नहीं हो सकती। देश में दो ही पार्टियों का राज चलता है। एक तो धर्म निरपेक्ष और दूसरी साम्‍प्रदायिक। धर्म निरपेक्ष भीतर से साम्‍प्रदायिक और साम्‍प्रदायिक ऊपर धर्म निरपेक्ष हैं। अगर ऐसा नहीं है तो चुनाव के पहले और बाद की घोषणाओं पर रोक लगनी चाहिए और सभी के लिए समान रूप से सुविधाओं का ऐलान होना चाहिए।

राजनीति से धर्म को अलग रखने के लिए पहले जरूरी है, पार्टी कार्यालयों में धार्मिक आधार पर लगे नक्‍शों को हटाना। चुनाव में जाति बहुल इलाके में उसी जाति के व्‍यक्ति का चुनाव लड़ना, अब तो शर्म जब आती है कि उस मुहल्‍ले, नगर का विकास वही कर सकता है जो समाज बहुल जाति का प्रतिनिधि है। यही कारण है कि एक शहर से जाति विशेष के हर पार्टी के उम्‍मीदवार होते हैं। इससे बड़ी विडम्‍बना और क्‍या हो सकती है, उपराष्‍ट्रपति के चुनाव में सभी उम्‍मीदवार एक ही जाति के थे।

यह सुखद बात है कि अब लोग विकास की राजनीति की बात करने लगे हैं। धर्म की राजनीति से थोड़ा दूर रहकर धर्म की राजनीति करते नजर आ रहे हैं। विकास की राजनीति का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें आप अपने परिवार का विकास कर सकते हैं, पार्टी का विकास कर सकते हैं, अपने रिश्‍तेदारों का विकास कर सकते हैं, अपनों को राज्‍यसभा और विधान परिषद् में बिठाकर उनका विकास कर सकते हैं। देश का विकास गया भाड़ में। पहले अपना और अपनो का विकास तो हो। विकास की बात अच्‍छी लगती है, चुनाव के दौरान। अभी हाल फिलहाल पांच राज्‍यों का विकास होना है। पूरे देश के विकास के बारे में बाद में सोचा जाएगा। इस रणभेरी की आवाज से समस्‍याओं की गूंज दिल्‍ली तक सुनाई देने लगी।

पंजाब उड़ रहा है, कोई पकड़ नहीं रहा था, अब रणभेरी की आवाज से दिल्‍ली वाले उसे पकड़ने के लिए पटना जा पहुंचे। चलो अच्‍छा है और दिल्‍ली, निगम बोध घाट के पास उड़ रही है, उसे तो पकड़ने की सुध नहीं है। दिल्‍ली के विकास के प्रतीक फ्लाईओवर और दरिद्रता के प्रतीक उनके नीचे आशयाना बना कर रहे हैं। उत्‍तराखंड ठंड में सिकुड़ कर आधा रह गया उसकी ठंड दूर करने कोई नहीं गया। वहां अब एक सगूफा छोड दिया है ऑफिस के समय में  लोग इबादत कर सकते हैं। आप ये भूल जाते हैं कि ऑफिस के समय में ही तो सभी काम किए जाते हैं। दिल्‍ली इससे पहले हेलमेट के लिए जूझ रही है। आधी आबादी हेलमेट पहनेगी, आधी नहीं। ये धर्म की राजनीति नहीं है, धर्म में राजनीति है।

गोवा में मानस म्‍यूजियम के एक अधिकारी का कहना है तो यहां तो खाना और पीना दोनों ही मुहाल हो गया। पर्यटक आते हैं, होटलों में घुस जाते हैं, बाहर निकलते हैं तो हमारे लिए कुछ नहीं बचता। गोवा पीने के लिए तरस रहा है। मणिपुर में पार्टियां दल-बदल कर रही हैं। उत्‍तरप्रदेश ड्राइवर के लिए ईश्‍वर-अल्‍ला के आगे नाक रगड़ रहा है, राज्‍य बिल्लियों का प्रदेश हो गया है, बन्‍दर तैयार बैठे हैं। जनता अपने घर में बेघर है। हर कोई मछली देने को तैयार है, लेकिन मछली पकड़ना कोई नहीं सिखा रहा

सवाल यह है आम जनता क्‍या करे? किसकी ओखली में सर दे। सर तो फूटना है। विकास अवश्‍य होगा। समस्‍याओं का निदान भी होगा। धर्म भी होगा और राजनीति भी होगी, लेकिन यह सब आपके लिए नहीं है, यह उनके लिए होगा जो इसका उपयोग अपने विकास के लिए करते हैं।

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