संविधान की स्थापना ही तो न्यायपूर्ण गणतंत्र की स्थापना है

Posted by Deepak Bhaskar in Hindi, Society
January 26, 2017

भारत अपना 68वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। आज ही के दिन हमने अपना, संविधान अंगीकृत किया था और हम दुनिया के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक गणराज्य बने थे। भारत का संविधान, दुनिया के विभिन्न देशों के संविधान से कई मायनों में अलग है। यह संविधान रूल ऑफ़ लॉ को तो मानता ही है लेकिन इससे ज़्यादा रूल ऑफ़ जस्टिस (न्याय) को स्थापित करता है।

न्याय की संकल्पना ही भारत के संविधान के मूल में है। संविधान के लगभग हर अनुच्छेद न्याय की संकल्पना की तरफ इशारा करते हैं। भारत का संविधान ‘सार्वभौमिक मानवीय स्वतंत्रता’ के लिए अपनी प्रतिबद्धता साबित करता है। मानव के द्वारा मानव के शोषण को सिरे से ख़ारिज करता है। भारत को एक राष्ट्र का रूप देने के क्रम में इस बात का ध्यान रखा गया है कि भारत सिर्फ एक भूखंड या जमीन का टुकड़ा भर नहीं बल्कि लोगों का समूह है।

1950 के दशक के बाद बहुत सारे देश आज़ाद हुए, लेकिन ये देश आज भी प्रजातंत्र के लिए संघर्ष कर रहे हैं, गणतंत्र की संकल्पना तो अभी कोसों दूर है। 15 अगस्त 1947 को भारत ब्रितानी शासन से आज़ाद तो हुआ था परन्तु असली आजादी तो 26 जनवरी 1950 को ही मिली थी, जब भारत एक प्रजातांत्रिक गणराज्य बना था।

भारत के संविधान ने, कई देश, समाज, जाति, धर्म में खंडित राष्ट्र के लोगों “नागरिक” की संज्ञा दी। कितना ज़रूरी है, इस देश के लोगों को ये मानना कि हमारी पहचान सिर्फ एक नागरिक के रूप में होनी चाहिए। भारत को एक धागे में जोड़े रखना सिर्फ और सिर्फ संविधान से संभव है। वरना भारत में हो रही राजनीति का क्या है, उसे राष्ट्र के खंडित या विखंडित होने से क्या फर्क पड़ता है? दोनों ही क्रम में राजनीतिक सत्ता तो कायम ही रहती है।

बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने कहा था कि भारत में सिर्फ संविधान की सत्ता होनी चाहिए, इसकी सत्ता ही, वर्षों से चली आ रही सामाजिक सत्ता और राजनैतिक सत्ता का विकल्प है। बाबा साहेब ने आगाह किया था कि राजनैतिक प्रजातंत्र से सिर्फ बात नहीं बनेगी बल्कि सामाजिक एवं आर्थिक प्रजातंत्र से ही राष्ट्र का निर्माण हो पायेगा।

जरा सोचिये, जिस देश में लोग भगवान के सामने भी बराबर नहीं होते थे, जहां समाज के एक बड़े तबके को मंदिर तक जाना वर्जित था। जहां दलित, इंसान भी नहीं माने जाते थे, जिनकी परछाई से भी लोग दूषित हो जाते थे। जहां दक्षिण में गरीब महिलाओं को ऊपर का बदन खुला हीं रखना पड़ता था, जहां आदिवासी सभ्यता के आस-पास भी नहीं थे। ऐसे समय के दौर से निकलकर हमारी संविधान सभा के सदस्यों ने एक ऐसा संविधान बनाया, जहां सब एक दुसरे के बराबर हो गए थे। अब किसी को मंदिर के सामने भी जाने की जरुरत नहीं थी, वो बराबर थे संविधान की नज़र में।

हालाँकि 68वें गणतंत्र दिवस मनाने के समय भी, “हम भारत के लोग” तमाम तरह की समस्यायों से जूझ रहे हैं। आज भी भारत सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक समानता के लिए संघर्ष कर रहा है। लेकिन ये समस्याएं हमें सिर्फ इसलिए झेलनी पड़ रही है क्योंकि हम आज तक अपने संविधान को अक्षरसह लागू नहीं कर पाए हैं। अभी भी संविधान हमारे जीवनशैली का हिस्सा नहीं बन पाया है। अभी भी भारत में आने वाली सरकारें, संविधान के उद्देश्य को अपना उद्देश्य नहीं बना पाए हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि जो भी बदलाव इस देश में हुए हैं वो संविधान की वजह से ही संभव हुआ है।

यह देश तब आगे बढ़ेगा जब न्याय की स्थापना होगी, जब मानव के द्वारा मानव का शोषण बंद होगा, जब जनता के शासन के नाम पर कुछ ही लोगों के हाथों में पूरी व्यवस्था नहीं होगी और यह तब संभव होगा जब हम प्रजातांत्रिक गणतंत्र बनेंगे। जब यह देश संविधान के द्वारा शासित होगा क्योंकि न्यायिक दृष्टिकोण तो संविधान से ही निकलता है। मूल रूप से, संविधान की स्थापना ही तो न्याय की स्थापना है।

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