बेंगलुरु घटना का ज़िम्मेदार पूरा राष्ट्र है

बेंगलुरु में नए साल के जश्न के नाम पर जो हुआ उस पर हमसबने शर्मिंदगी महसूस की। दुख जताया, बयान दिए हर तरफ फिर से वही रटी-रटाई बात हुई। जैसे कि हमें अपनी सोच पर काम करना चाहिए, परिवार और समाज के लेवल पर बच्चों को सही ट्रेनिंग देनी चाहिए, लड़का और लड़की में कोई अंतर नहीं करना चाहिए, वगैरह-वगैरह। लेकिन ये बातें अगर सही भी हैं तो इतने सालों से हम यही बोल रहे हैं, फिर कैसे आये दिन ऐसी घटनाएं हो जाती हैं? क्यों कुछ ख़ास बदलाव हो नहीं रहा है? इस “व्यक्तिगत-पारिवारिक-सामाजिक सोच” वाले मुद्दे से कुछ आगे जाकर सोचने और विमर्श करने की आवश्यकता है। बहरहाल, समस्या सिर्फ सोच के साथ नहीं है बल्कि इसकी जड़ें “राज्य या राष्ट्र” के निर्माण से भी जुड़ी हुई हैं।

कैरोल पैटमैन ने अपनी किताब “द सेक्सुअल कॉन्ट्रैक्ट” में लिखा है कि राज्य/राष्ट्र कि उत्पत्ति अथवा निर्माण ही “पुरुषवादी” है। सामाजिक अनुबंध के तहत अस्तित्व में आये नवीन-राज्य में सम्पूर्ण समाज नहीं बल्कि सिर्फ पुरुष समाज ही था। जब राज्य का निर्माण सिर्फ पुरुष-समाज द्वारा ही किया गया हो तो ज़ाहिर है कि उसमें महिलाओं को दोयम दर्जे पर हीं रखा जायेगा। समाज तो पितृसत्तात्मक था ही लेकिन जब हम समाज से आगे बढ़कर राज्य का निर्माण करने में लगे तो महिलाओं में नयी उम्मीद जगी थी कि अब शायद सामाजिक असमानता का अंत हो जायेगा, लेकिन हुआ फिर वही।

मर्दों ने अपनी कमजोरी छुपाने के लिए महिलाओं को पहले समाज से बाहर रखा था और अब राज्य से भी बाहर रखा। परिवार और समाज तो मर्दों के द्वारा संचालित हो ही रहा था, लेकिन अब राज्य/राष्ट्र भी पुरुषों की संस्था बन कर ही रह गयी। जब राज्य/राष्ट्र ही महिलाओं को बराबरी का हक़ देने को तैयार नहीं तो हम और किससे उम्मीद कर सकते हैं। परिवार और समाज की दासता का अनुभव तो महिलाएं कर ही रही थी। ये कितना आश्चर्यजनक है कि 70 वर्षों से चल रहे महिला आरक्षण की मांग संसद में दसवीं बार भी पास नहीं हो पाई। वैसे भी संसद में भी महिलाएं बस नाम मात्र की ही हैं और जो हैं वो मर्दों कि संस्था में महज़ नमक की तरह हैं। वो मर्दों का भाषण सुनती हैं और मर्द उनकी मीठी आवाज सुनते हैं। आये दिन भारत भाग्य विधाता के पुरोहित, महिलाओं को नैतिकता का ज्ञान दे देते हैं और मर्दों के कुकर्म को छोटी-मोटी गलतियां बना देते हैं। जाहिर है मर्द-रुपी राज्य में औरत को और क्या सम्मान मिल सकता है।

गौरतलब है कि परिवार, समाज से भी ऊपर अब राष्ट्र/राज्य है। परिवार और समाज के पास अब वो सत्ता नहीं बल्कि संप्रभु राज्य के पास सम्पूर्ण शक्ति है। अगर इस सत्ता पर सिर्फ मर्दों का अधिकार हो तो स्वाभाविक है की मर्द कोई भी कुकृत्य भयमुक्त होकर ही करेगा क्योंकि उसे पता है की पहले परिवार, फिर समाज और अब राज्य उसका है तो कोई उसका क्या कर सकता है। जब परिवार और समाज ने सारी सत्ता राज्य को सौंप दी और उसके पास कोई सत्त्ता ही नहीं तो हम इनको क्या दोष देंगे।

असल दोषी तो राज्य/राष्ट्र है जिसके पास संप्रभुत्व की सत्ता है। अगर कानून के नज़र में सब बराबर हैं तो ऐसे कैसे हो जाता है कि महिलाओं को कानून का डर है और वो पुलिस थाने में भी जाने से डरती है और मर्द पुलिस लॉक-अप में महिला का बलात्कार कर देता है। ऐसा इसीलिए है क्योंकि कानून, मर्दरुपी संस्था “राज्य/राष्ट्र” के सामने बहुत ही बौना होता है। निर्भया कांड के बाद हजारों बलात्कार हुए, किसी को कानून का भय नहीं हुआ क्योंकि उनके पास राज्य की ताकत है। मर्द-रुपी राज्य ही महिलाओं को कमज़ोर मानता है या कहिये तो शायद बनाता भी है, जिसकी वजह से महिलाएं आज भी मर्दों के आतंक का शिकार होती हैं।

शायद, परिवार या समाज अब बेटियों को पढ़ाना, आगे बढ़ाना भी चाहता है लेकिन राज्य/राष्ट्र ही उसे कमज़ोर मानकर कई जगहों पर पहुंचने से वंचित कर देता है। राज्य/राष्ट्र को ही ये मानने में सालों लग गए कि महिलाएं भी हवाई जहाज चला सकती हैं, मैदान में लड़ सकती हैं। दहेज़ को तो राष्ट्र भी कई वर्षों तक अनदेखा करता रहा और पुरुष के हाथ मजबूत होते रहे। बलात्कार के कानून को सख्त बनने में या फिर जस्टिस वर्मा कमेटी बनने में सालों लगना ही ये साबित करता है कि बंगलौर जैसी घटनाओं के लिए परिवार/समाज ही नहीं बल्कि मर्द-रुपी राज्य का भी उतना ही दोष है।

असल में राज्य जिस दिन महिलाओं के साथ समानता का व्यवहार करेगा वो समाज और परिवार में भी बराबर हो जायेंगीं। भारत-भाग्य विधाता को महिलाओं के द्वारा बना, राज्य भी बनना पड़ेगा तभी मर्द की सत्ता टूट पायेगी और महिलाएं भयमुक्त, समान और स्वंत्रत नागरिक बन पाएंगी।

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