कश्मीर अब आज़ाद हो रहा है

Posted by Deepak Bhaskar in Hindi, Society
January 29, 2017

कश्मीर भारत का वो अभिन्न अंग है जहां की गोली-बारी से लेकर बर्फ-बारी तक, भारत की राजनीति के मिजाज को प्रभावित करती रहती है। 90 के दशक के बाद भारत के स्विट्ज़रलैंड को अलगाववाद और आतंकवाद की नज़र लग गयी थी। कश्मीर, भारत से आज़ाद होना चाहता था और वहां आये दिन, अलगाववादी आज़ादी के नारे बुलंद करते रहते हैं। बहरहाल, कश्मीर आज भी भारत का अभिन्न अंग है लेकिन कश्मीर अब आज़ाद हो रहा है। जिस आज़ादी की जरुरत एक समाज को होती है, उस आज़ादी की मुहिम कश्मीर में सफलतापूर्वक शुरू हो गयी है।

कश्मीर को आज़ादी अशिक्षा, बेरोज़गारी, धार्मिक अन्धविश्वास, सामाजिक असमानता जैसे कलंक से चाहिए थी। इस आज़ादी की शुरुआत हुई, शाह फैज़ल के सिविल सर्विसेज़ की परीक्षा में प्रथम स्थान लाने से, सिलसिला चल पड़ा और अख्तर हसन ने इसी परीक्षा में दूसरा स्थान प्राप्त किया। जहां अलगाववादी बुरहान वानी जैसे लोगों को, कश्मीरी युवा का आदर्श बना रहे थे वहीँ फैज़ल और अख्तर जैसों ने कश्मीर के युवाओं के आदर्शों को बदल डाला। अब युवा के लिए कोई बुरहान वानी जैसे आतंकवादी या अलगाववादी आदर्श नहीं बल्कि फैज़ल और अख्तर जैसे युवा हैं। हालांकि, वहां आज भी अलगाववादी इन लोगों को आदर्श के तौर पर नहीं मानते हैं। पर कहीं न कहीं वादी की हवा बदल ज़रुर रही है।

अभी हाल में दंगल फिल्म की जायरा शेख वसीम (गीता फोगट के बचपन का रोल में) कश्मीर से हैं। कश्मीर के युवा लड़के-लड़कियों के लिए आदर्श बनीं जायरा ने अपने फेसबुक पर अलगाववादियों से माफ़ी मांगी है। उन्होंने इन लोगों से उसे माफ़ करने के लिए अपील भी की है। किसी भी समाज के लिए जायरा जैसी बच्ची का माफ़ी मांगना उस समाज की जीत तो कतई नहीं हो सकती। जायरा का हार जाना, कश्मीर की हार होगी। जायरा क्यूं माफ़ी मांगे, माफ़ी तो कश्मीर के अलगाववादियों को मांगनी चाहिए। जायरा ने तो खुद अपने बल पर अपना रास्ता चुना और उसमें सफल भी हुई।

जिस दोयम दर्जे को इस विश्व की महिलाएं, हज़ारों साल से जीते आ रही हैं, जायरा उस हज़ारों साल के बंधन को तोड़ कर आज़ाद हुई है। ये आज़ादी किसी भी जमीन के टुकड़े के आज़ाद होने से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है। मानव द्वारा मानव का शोषण से मुक्ति से बड़ी आज़ादी और क्या हो सकती है। असल में कोई भी समाज जायरा जैसी लड़कियों से डरता है और डरना लाज़मी है। क्यूंकि, जायरा कश्मीर की आज़ादी के मायने बदल रही है। जायरा जैसे युवा, अब भारत से नहीं बल्कि मानव के द्वारा मानव का शोषण से आज़ादी चाहते हैं। जायरा, इस नयी आज़ादी के मुहिम की नायिका है। डरना स्वाभाविक है क्योंकि आज़ादी की राजनीति से जायरा का क्या लेना-देना, इसकी आज़ादी तो इसके द्वारा चुनी हुई जिंदगी में है। फिल्म में तो वो दंगल कर ही रही थी, लेकिन अब वो इस समाज से भी दंगल कर रही हैं। वो उन तमाम हानिकारक बापू से आज़ादी का दंगल कर रही है, जिन्होंने बेटी के नाम पर, उसके इंसान होने का एहसास छीन लिया है। जायरा वसीम कोई मुसलमान लड़की नहीं बल्कि वो सिमोन बोलिवर की वो औरत है जिसे जिंदगी के हर मोड़ पर किसी मर्द से उसकी अपनी नियति के बारे में पूछना पड़ता है। इसी से तो वो बाहर निकली है। फिर उसे क्यूं डराया जा रहा है?

असल में, जायरा को डराने लोग खुद डरपोक हैं, वो कश्मीर के अलगाववादी ही क्यों बल्कि बंगलुरु के राम सेना को भी पसंद नहीं आएगी। काश! हम ये समझ पाते कि क्या गलत है अगर कोई खुद का रास्ता चुनना और बनाना चाहता है। अगर जायरा वसीम, मर्द की दुनिया से अलग, अपनी दुनिया बनाना चाहती है तो किसी को क्या समस्या हो सकती है? कश्मीर की असली आज़ादी तो जायरा के आज़ाद हो जाने में है। अन्यथा, भूभाग या जमीन के टुकड़े तो सदियों से आज़ाद हो रहे हैं और उस आज़ाद जमीन के टुकड़े को जिसे हम मुल्क मान लेते हैं, में भी तो लोग गुलाम ही महसूस करते हैं।

जायरा वसीम जैसी लड़कियां, कश्मीर की नहीं बल्कि इस मुल्क की आदर्श हैं और होना भी चाहिए। जायरा को माफी नहीं बल्कि इस समाज को उससे माफी मांगनी चाहिए, उसकी आज़ादी का जश्न मनाना चाहिए। सब को खुश होना चाहिए कि अब भारत में भारतीय आज़ाद हो रहे हैं, अपनी जिंदगी का रास्ता खुद बना रहे हैं और चुन भी रहे हैं, कश्मीर के लोगों को जायरा वसीम को धन्यवाद कहना चाहिए। उन्हें जश्न मनाना चाहिए क्यूंकि कश्मीर अब असल में आज़ाद हो रहा है।

 

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