आजाद भारत की राजनीति में धर्मवाद, जातिवाद, भाषावाद और प्रांतवाद, शुरू से ही मौजूद हैं लेकिन धर्मवाद एक कामयाब फार्मूला है.

Self-Published

१९४७ में आजादी मिलना, कही ना कही उस उम्मीद को झुठला रहा था की अंग्रेज की गुलामी ही हमारी सारी सामाजिक समस्याओं का कारण हैं, आजादी ने इस उप-महादीप को दो हिस्सों में  भारत और पूर्वी-पश्चिम पाकिस्तान के रूप में बांट दिया था, इसी की तर्ज पर १९७१ में पूर्वी पाकिस्तान, बांग्लादेश के नाम से एक आजाद देश के रूप में उभर कर आया. अब, अगर भारत की बात करे तो इसके पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरु के कार्यकाल १९४७ से १९६४ में, भारत की राजनीति अपनी नयी पहचान बना रही थी, इसी के तहत, १९५० में भारत का संविधान लागू हो गया जिसको जमीन पर  सच करना, भारत सरकार की जवाब देही थी. १९५७ में राय बरेली से चुने गये सांसद श्री फिरोज गांधी ने, १९५८ में भारत की संसद में हरिदास मुंधरा स्कैंडल को उजागर किया, १९६२ में भारत को चीन से युद्ध में हार कासामना करना पड़ा और इसी के तहत, लद्दाख का कुछ हिस्सा, चीन ने अपने कब्जे में कर लिया जिस पर पहले भारत का अधिकार था, इसी बीच उत्तर भारत में सिख समुदाय, पंजाबी भाषा बहुताय इलाके की रूप रेखा में पंजाब राज्य की मांग कर रहा था और महाराष्ट्र में, मराठी भाषा बहुताय इलाके के रूप में मुंबई को शामिल करने का आन्दोलन चला () , १९५१ में आरएसएस के अधीनभारतीय जन संघ की नींव रखी गयी जिसने १९५२ के लोकसभा चुनाव में ३ सीट पर विजयी परचम फैहराया. १९६४, में नेहरु जी की मोत हो गयी लेकिन १९४७ से १९६४ तक, भारतीय राजनीति में धर्मवाद, जातीवाद, भाषावाद और प्रांतवाद,अपनी पहचान बना चुके थे.

अगर, दो आंदोलन पर ध्यान दे, मुंबई को महाराष्ट्र में शामिल करना और पंजाब राज्य की मांग, दोनों ही भाषा के स्तर पर इन इलाकों की मांग कर रहे थे परंतु महाराष्ट्र में बहुताय हिंदू धर्म था और पंजाब में सिख धर्म, लेकिन पंडित जी के कार्य काल में मुंबई को महाराष्ट्र में शामिल कर दिया गया परंतु पंजाब राज्य की पहचान १९६६ में हुई, कहा ये भी जाता हैं की १९६५ के भारत-पाकिस्तान युद्ध में सिख जवानों की देश भक्ति से खुश होकर उस समय की प्रधान मंत्री श्री इंदिरा गांधी ने,पंजाब राज्य की मांग को स्वीकार कर, पंजाब राज्य का गठन किया लेकिन हिंदी भाषी क्षेत्र को हरयाणा नाम के नये राज्य से पहचान दी, चंडीगढ को केंद्र शासित प्रदेश की पहचान देकर, इसे राज्य हरयाणा और पंजाब से अलग कर दिया गया. आज भी ये दोनों राज्य, महाराष्ट्र, मराठी भाषा पर राजनीति करता हैं और आये दिन यहाँ मराठी बोलने के लिये राजनीतिक दल बयान बाजी करते रहते हैं की गैर मराठी को महाराष्ट्र में रहने का अधिकार नहीं हैं और उसी तरह पंजाब की राजनीतिक दल, अपने से हुई नाइंसाफी का रोना रोते रहते हैं, लेकिन, महाराष्ट्र में बहुताय हिंदू समाज होने से, यहाँ मराठी बोलने का मुद्दा अखबार में सामाजिक सुरक्षा की खबर बन कर रह जाता हैं और पंजाब के मुद्दे बहुताय सिख समाज होने के कारण राजनीतिक दल के बयान या अखबार की खबर इसे आतंकवाद के भय की रूप रेखा में प्रकाशित करती हैं.

अगर, इसी भाषा वाद पर ध्यान दे तो, दक्षिण के राज्य, हिंदी भाषा को राष्ट्रीय भाषा मानने से इंकार करते रहते हैं लेकिनअदालत के इस बयान ने साफ़ कर दिया की हिंदी राष्ट्रीय भाषा नहीं हैं पर, बहुताय लोग इसे हमारे देश में बोलते हैं और संविधान में भी इसे ऑफिसियल भाषा का दर्जा हैं ना की राष्ट्रीय भाषा का. लेकिन आज व्यवसाय ने ऐसी करवट ली हैं की अक्सर तमिल, तेलुगु, मलयालम, इत्यादि दक्षिण की भाषाओं में बनी फिल्म को हिंदी भाषा में डब करके, हिंदी सिनेमा टीवी चैनेल्स पर चलाया जाता हैं, और इसी तरह  हिंदी भाषा की फिल्म को दक्षिण की भाषाओं में डब किया किया जाता हैं, इसी की तर्ज पर, आज मुंबई में २२% लोग ही मराठी बोलते हैं लेकिन १९६० में ये ५०% से ज्यादा थे. आज, भाषावाद और प्रांतवाद राजनीतिक मुद्दा तो धुल में मिलता हुआ नजर आ रहा हैं, व्यक्तिगत रूप से मेंने पंजाब के लुधियाना और महाराष्ट्र के मुंबई शहर में, हिंदी भाषा में ही बात की हैं और बड़ी शांति पूर्ण तरीके से यहाँ के लोकल नागरिक से जवाब भी मिला हैं.

लेकिन, इसी बीच धर्मवाद का मुद्दा राजनीतिक गलियारों में आज भी गूंजता हैं, १९८४ में हुये ब्लू स्टार ऑपरेशन के पश्चात श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या की गयी और उसी के बाद भडके दंगे ने एक आम नागरिक की धार्मिक भावना को इस तरह आहत किया की चुनाव में , राजीव गांधी के रूप में ऐसे नेता को पूर्णतः बहुमत दिला दी जिसकी राजनीतिक  रूप से अभी पहचान भी पूरी तरह से उभर नहीं पायी थी, लेकिन राजीव गांधी के प्रधान मंत्री कार्य काल में, १९८४ के  ब्लू स्टार की तर्ज पर, भारतीय जनता पार्टी ने बाबरी मस्जिद, का मुद्दा पूरे जोश के साथ उठाया और इन्हें १९८९ के चुनाव में इसका लाभ भी हुआ, यहाँ राजीव गांधी की सरकार जा चुकी थी और भाजपा की समर्थन वाली सरकार १९८९, में केंद्र में थी, इसी दौरान भाजपा नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी  ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के राम-मंदिर की जगह अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली, जिसे बिहार में उस समय के मुख्य मंत्री लालू यादव ने रोक दिया, यहाँ, भाजपा हिंदू समर्थन में और जनता दल के लालू यादव मुस्लिम समर्थन, की राजनीति को बल मिला. ०६-दिसम्बर-१९९२, को कार्य सेवको द्वारा बाबरी मस्जिद को ध्वंस कर दिया गया, दंगे हुये, लेकिन भाजपा का जन्म भारत की राजनीति में हो चूका था, फिर २००२ के गुजरात के दंगे ने भाजपा की गुजरात सरकार को नया जीवन दिया और २०१३ में हुये उत्तर प्रदेश के मुजफरनगर  दंगे ने, २०१४ के लोकसभा चुनाव ने उत्तर प्रदेश में भाजपा को अविश्वसनीय जीत दिला दी.

 

अक्सर, धर्म की राजनीति में दंगे होते हैं, ये भारत की आजादी के बाद लगातार जारी हैं, कुछ निर्दोष मरते हैं परंतु, ये भी हकीकत हैं की कही भी राजनीतिक नेता को कोई शारीरिक खरोंच तक नहीं आती, लेकिन नेता जी की चुनाव में जीत निश्चित हो जाती हैं. धर्मवाद, भारत की राजनीति में एक कामयाब फौरमूला हैं जिसने आज भाषा, प्रांतवाद, जातवाद को पीछे छोड़ दिया हैं.समय रहते हर राजनीतिक पार्टी या नेता इससे अछूत नहीं हैं, यहाँ पहनावे में कही गांधी टोपी, गोल टोपी हैं या सिख पगड़ी मौजूद हैं. लेकिन राजनीति में धर्म की राजनीति होती हैं. एक सिख होने के नाते, में इस धर्म वाद की राजनीति से पीड़ित हु, मुझे अब इससे आजादी चाहिये, जब भी कोई विस्फोटक घटना पंजाब में होती हैं तब तब मेरा जीवन एक डर के साये से होकर गुज़रता है, में आज, एक आजाद भारतीय होने के नाते आजादी से एक आम शहरी की तरह जीवन नहीं बसर कर सकता. अंत, में एक फिल्म का जिक्र ज़रुर करूंगा, पीके ये, फिल्म एक द्रश्य में आमिर खान का किरदार सरदार जी के किरदार से चेहरे के बाल इस तरह हटाता हैं की इसकी छवि एक मुस्लिम के रूप में उभरती हैं और अंत में खुद को एक हिंदू के रूप में दिखाता हैं. यकीन मानिये, एक इमानदार सिख, हिंदू और मुस्लिम कही भी धर्म के नाम पर हिंसा को स्वीकार नहीं करते, यहाँ, राजनीति धर्म का लिबास पहन कर हमसे छल करती हैं, अब समय रहते हमें, इस छल को समझना भी होगा और इससे निजात भी पानी होगी, तभी, संविधान का एक समान नागरिक अधिकार,इसे जमीन पर जीवित किया जा सकता हैं, धन्यवाद.

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