आरक्षण – एक सुविधा या दुविधा.

Posted by Tejasvi Manjerakar
February 23, 2017

Self-Published

आरक्षण देने के पीछे सन् 1950 के बाद से  संविधान निर्माताओ का उद्देश्य “सामजिक व शैक्षणिक ” रूप से पिछडे तबको का उत्थान व उन्हें समाज में मुख्य धारा में लाना रहा।तो क्या जाट मुख्यधारा का हिस्सा नहीं है !!

 अब जब पुन: गाहे-बगाहे आरक्षण की बात कोई न कोई जाति करती रहती है, जैसा की अभी हरियाणा में और इससे पहले राजस्थान , गुजरात, आंध्राप्रदेश इसके उदाहरण है। अब सवाल यहाँ यह उठता है की आरक्षण “किन्हें मिले और क्यों” ?

इसी प्रश्न ने मेरी मदद  संपूर्ण व्यवस्था को कुछ हद तक समझने में की। वैसे इस बात के अब कई पहलु है.

  • क्या ये महज़ दबंग जातियों के वर्चस्व को पुनर स्थापित करने के लिए है या राजनीतिक पार्टिया ही ऐसी परिस्थितिया उत्पन्न करती है जिससे वे प्रासंगीक बनी रहे और आरक्षण का औचित्य ही संदिग्ध हो जाये !
  • आखिर क्या कारण है इसका ? क्या दबंग जातियो का दबदबा टूट रहा है ।

या तो क्या कुछ लोग दलितो और पिछड़ो का उत्तथान नहीं देख़ना चाहते ? या फिर पारिवारिक जमीनों का बटंवारा जिससे पारिवारो का गुज़र-बशर करना  ही कठिन हो गया है।

या फिर  इन प्रदर्शनों के पीछे पहले से ही ऐसी कोई पटकथा गढ़ी जा चुकी है,जो आरक्षण को ही खत्म करना चाहती है। क्योकि ऐसी ही पटकथा का मूर्त रूप तो विमुद्रिकरण की विफल व्वस्थात्मकता के रूप में तो हम देख ही चुके है हालांकि यह विचार उचित है. हालांकि इसका एक और कारण भारत की कृषिप्रधानता भी हो सकती है जिससे इनकार नहीं किया जा सकता। क्योकि महाराष्ट्रा में मराठा ,गुजरात में पाटीदार/पटेल , राजस्थान में गुर्जर और आन्धरा में कापू जातिया प्रमुख रूप से इन्ही व्यवस्थाओ पर अपनी आजीविका चला रही है. जिससे इन जातियों की माली हालत बिगडती जा रही और यही इनकी पारम्परिक ताकत भी कम हो  रही है। और इसी तंगी के कारण इन जातियो की नज़र उन व्यवस्थाओ पे होती है जो सरकारी स्त्रोतों से अपनी आमदनी करते है।जहा तक सवाल जाटो का है तो वे कहते है की वे “सामजिक और आर्थिक” मुख्यधारा से पिछड गया है और इन्ही कारणो से आरक्षण की मांग कर रहे है। यहाँ गौर करने वाली बात यह भी है की जहा पहले सरकारी नौकरिया लगभग 1-1.5करोड होती थी वही अब घटकर 75 लाख रह गई है तो  वहां आरक्षण कहा तक उचित है ? तो क्या इन सबके पीछे “सामाजिक सरोकार” है या ” राजनेतिक” ! जहा 28%-29% (majority community) जाट हरियाणा में है और कई जाट जहा मुख्यमंत्री रह चुके हो और वही वहां की दशा-दिशा तय करते है ऐसे में उन्हें आरक्षण देने में क्या कोई राजनेतिक हित नहीं !!  जहा जाट नारा देते है “जाट बीरादरी जो चाहेगी , सी.एम. उसे ही बनाएगी ” क्या मतलब है ऐसे नारों का । जहा तक संविधान सभा की  बहस की बात है तो उनका आशय भी जातिवादी व्यवस्था को समाप्त करना ही था अतः यह आरक्षण अवधारणा अस्तित्व में आई थी। सन् 1991 से निजीकरण की शुरुवात हुई तब से ज्यादातर सरकारी सन्सथान निजी हाथो में जा रहे है, तब तो सरकारी नौकरी उत्पन्न होने का सवाल संदेह से ही किया जाना चाहिये.आरक्षण वो सुविधा है जिसका विचार आज़ादी के बाद “सामाजिक व शैक्षणिक ” रूप से पिछ्डे वर्गो के उत्तथान के लिए किया गया। ऐसी ही भावना संविधान  का निर्माण करते समय संविधान  निर्माताओं  की रही।  आरक्षण पर विचार के लिए “नायडू कामेटी” जिसके अध्यक्ष वेंकैया नायडू है, NDA सरकार ने बना रखी है और इससे पहले भी कई आयोगों का गठन,सिफारिशे, और उन पर विवाद हो चुके है और कई आयोग़ गठित हो चुके है , इंदिरा साहनी का केस, मंडल आयोग की सिफरिशे इत्यादी, लेकिन सुचारू समाधान अब तक नदारत है।

वैसे इनके कुछ समाधान हो सकते है जैसे शेक्षणिक दीर्घकालिक समान अवसरों का होना , या पुनः पोलिसी रिव्यु हो , आरक्षण का लाभ उठा रही जातियों का अब sub-classification  (SC/ST/OBC/दलित/महादलित) किया जाना चाहिए। और “आर्थिक आधार” या आवश्यकता पर भी गौर किया जा सकता है . इसके अलावा scholarships पर भी नयी रणनीति की दरकार है।    शिक्शा के अधिकार की तरह रोज़गार का अधिकार भी एक सुगम विकल्प हो सकता है. इसी के साथ-साथ नीजि छेत्रों में भी ऐसे नियम बनाये जा सकते है जो CSR को प्रमोट करे जैसे अमेरिका में होता रहा है की अगर आपको व्यापारिक लाइसेंस चाइये तो फला-फला वर्गों को भी उसमे रोज़गार देना होगा जिससे जो पिछड गए है वो भी मुख्य धारा में आ सके। आरक्षण समांवेशी होना चाहिए।तो अंततः आरक्षण नीति की समीक्षा होनी ही चाहिए की क्या अब यह आर्थिक आधार पर भी लागू हो ?? और अगर नहीं तो फिर क्या लालू और मुलायम सिंह के बेटो को आरक्षण की जरूरत है ??     मुख्य मुद्दा यही है की अगर किसी एक दल के लिए यदि ये करना कठिन है तो सभी पार्टिया यह मिलकर कर सक्ती है। खासकर तब जब केन्द्र में पूर्ण बहुमत की सरकार हो।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.