उतर प्रदेश के राज्य स्तर के चुनाव, क्या ये चुनाव, बस चुनाव बनकर रह जायेगे या कुछ सामाजिक बदलाव आने के क़यास लगाये जा सकते हैं

Self-Published

उत्तर प्रदेश, ये राज्य भारत की राजनीति में क्या स्थान रखता हैं, इसके लिये किसी भी भारतीय नागरिक को समझाने की या बताने की जरूरत नही हैं. यहाँ, ये राज्य लोकसभा चुनाव में, सीट के हिसाब से सबसे ज्यादा लोकसभा सांसद यहाँ से चुन कर भेजता हैं और इसी तरह ये निचले सदन, राज्यसभा में भी एक अपनी अहमियत रखता हैं, यहाँ आज २०१७ के उत्तर प्रदेश के चुनाव, हर पार्टी की जीत के साथ-साथ नाक का सवाल भी बन गये हैं और कही ना कही, २०१९ के लोकसभा के चुनाव की तैयारी भी इसी राज्य चुनाव से सभी राजनीतिक पार्टी कर रही हैं. और इसका सबसे मजबूत और कामयाब तरीका, अपना बचाव करते हुये, दूसरों पर छीटा कशी करना. यहाँ, राजनीतिक सभा में हर पार्टी का क़दावर नेता शब्दों से इस तरह से दूसरे दल के नेता पर प्रहार कर रहा हैं, जो कही ना कही व्यक्तिगत और अति व्यक्तिगत हो रहे हैं और कही ना कही राजनीति की मर्यादा को भी लांघ रहे हैं.
इस सिलसिले में सबसे पहले बात करे श्री नरेंद्र भाई मोदी जी की जो आज भारत के सबसे सर्वोच्च संवैधानिक पद, प्रधानमंत्री के रूप में सुशोभित हैं, यहाँ 2014 में इन्हें मिले पूर्णतः बहुमत को पूरे देश का समर्थन हैं, और व्यक्तिगत रूप से भी इनका प्रधानमंत्री के रूप में पूरा सम्मान और आदर करता हु, वही 1950 में जन्मे, श्री मोदी जी आज कुछ 66 साल के हैं, चेहरे के सफेद बाल, एक बुजुर्ग होने के नाते, इनका और भी सम्मान बड़ जाता हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के एक चुनावी सभा में जहाँ ये इशारे ही इशारे में राहुल गांधी पर ऐसा व्यंग कस रहे थे वही कही प्रधानमंत्री के रूप में इनकी गरिमा भी गिरती हुई नजर आ रही थी.
यहाँ मोदी जी ने इशारो ही इशारो में राहुल गांधी पर व्यक्तिगत प्रहार किया, की कांग्रेस के नेता अपनी बचकानी हरकतों से सबसे ज्यादा गूगल पर सर्च किये जाते हैं. मोदी जी, यही नहीं रुके और इन्होने अपना प्रहार जारी रखा की इसलिये इनसे, इनकी पार्टी के लोग भी कुछ स्थानिक अंतर बनाकर इनसे मिलते हैं वही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव जी ने इन्हें गलेलगा लिया. यहाँ, मोदी जी क्या कहना चाहते हैं, हम सब भली भांति समझ सकते हैं. दूसरी ओर,एक सभा में अमित शाह ने राहुल गांधी और अखिलेश यादव पर इशारे में व्यंग कसते हुये कहा येदो लड़के, एक अपनी माँ को दुःख देता हैं और दूसरा अपने पिता को. यहाँ, ये क्या कह रहे हैं और किस तरह राजनीति की हर मर्यादा को लांघ रहे हैं, इसका अंदाजा सभी को होगा. ये, यही नहीं रुके और आगे कहा ये चुनाव उत्तर प्रदेश का भाग्य बदलने का समय हैं और यहाँ अमेठी मैं तो पिछले ५० साल से एक ही सरकार का सिक्का चल रहा हैं. यहाँ, इनका मतलब, गांधी परिवार से था. और यहाँ, राहुल गांधी, मोदी जी की केंद्र सरकार पर हमला बोल रहे हैं की मोदी जी ने २.५ साल बतौर प्रधानमंत्री केंद्र में क्या काम किया, मोदी जी को गूगल करना पसंद हैं. किसी के बाथरूम में देखना पसंद हैं इन्हें देश के विकास की चिंता होनी चाहिये लेकिन मोदी जी एक आम नागरिक को सुरक्षा, रोजगार, देने में नाकामयाब रहे है. आगे, किसी और सभा में, राहुल गांधी मोदी जी पर व्यंग कसते हैं की इन्होने दिलवाले दुल्हनिया ले जायेगे फिल्म के कलाकार शाहरुख़ खान की तर्ज पर अच्छे दिन का वादा किया था लेकिन ये शोले के गब्बर सिंह को ले आये. बसपा की मायावती, मोदी जी की केंद्र सरकार पर आरक्षण खत्म करने की कोशिश का आरोप लगा रही हैं.
लेकिन, ये व्यक्तिगत राजनीतिक बयान तो किसी हद तक आप स्वीकार कर सकते हैं लेकिन कही शब्दों के मायाजाल को बुनते हुये सांप्रदायिक माहौल को चुनौती देना, हर लिहाज से सही नहीं हैं. एक जन सभा को संबोधित करते हुये भाजपा के नेता सुरेश राना ने बयान दिया की अगर वह जीत गये तो कैराना, देओबंद और मोरादाबाद में कर्फ्यू लगा देंगे. यहाँ, इस बात का जिक्र करना जरूरी हैं, की तीनो कस्बे मुस्लिम बहुसंख्यक इलाका हैं. वही दूसरी तरफ, भाजपा के साक्षी महाराज ने मेरठ की एक जन सभा में कहा की उत्तर प्रदेश की जन संख्या हिंदुयो के कारण नहीं बड़ी हैं ये उनके कारण हैं जिनके यहाँ ४ ओरत को पत्नी के रूप में रखने की इजाजत और जिनके ४० बच्चे होते हैं. इसी बीच हमारे देश के प्रधानमंत्री और भाजपा के स्टार प्रचारक श्री नरेंद्र भाई मोदी जी ने भी बयान दिया की अगर गांव में कब्रस्तान हैं तो श्मशान भी होनी चाहिये, अगर रमज़ान के महीने में बिजली दी जाती हैं तो इसे दिवाली पर भी देना चाहिये. यहाँ, शब्दों के मायाजाल से मोदी जी दो समुदाय के बीच पर राजनीति करने के प्रयास करते हुये नजर आ रहे हैं.
१९९०, के दशक से उत्तर प्रदेश की जनता एक अजीबो गरीब राजनीति बवंडर में हैं या चार मुख्य पार्टी बसपा, भाजपा, सपा और कांग्रेस ही एक-दूसरे के परस्पर विरोधी रहे हैं, यहाँ जहाँ बसपा जाती वाद पर राजनीति करती हैं, वही भाजपा धर्मवाद को अपनाती हैं और सपा कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण अक्सर अपनी और करती हैं. यहाँ,इन सभी दल के राजनीतिक प्रचारक कही ना कही दूसरे राजनीति पार्टी पर ही छीटा कशी करते हुये नजर आते हैं ना की इसे बयान करने में की ये राज्य में बतौर राज्य सरकार ये एक बेहतर प्रदर्शन कैसे कर सकते हैं ? किस तरह से राज्य की शिक्षा, सुरक्षा, रक्षा, रोजगार, इत्यादि सामाजिक समस्या को किस तरह दूर करेंगे ? इनकी क्या नीति हैं ? इस तरह के सामाजिक, मुद्दों से ये चुनाव और इसका प्रचार अछूत ही लग रहा हैं. हो सकता हैं, की यहाँ चुनावी परिणाम से किसी तरह से सकता में कोई बदलाव  आ जाये, लेकिन, वजीर बदलने से सामाजिक समस्या का निवारण होगा ? अगर होता हैं तो इसका पैमाना कितना होगा ? ये सब, चुनाव के पश्चात भी चिंतन के विषय बने रहेंगे. व्यक्तिगत रूप इस तरह के चुनावी प्रचार मुझे रास नही आ रहे जहाँ शब्दों के प्रहार से आज राजनीति हर प्रकार की मर्यादा को लांघ कर व्यक्तिगत और अति व्यक्तिगत हो रही हैं, जो लोकतंत्र के लिये स्वस्थकारी नहीं हैं,धन्यवाद.

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