कही हम मानसिक रोगी तो नही ?

Posted by Ritesh Thapa
February 1, 2017

आज के इस भागम भाग के समय में मनुष्य  आर्थिक, सामाजिक व पारिवारिक उन्नति के लक्ष्य को   प्राप्त करने  के लिये मस्तिष्क में नयी नयी कल्पनाओं के स्वरूप को तैयार करता है  और कोशिश करता है की उन्हें शीघ्र अति शीघ्र पूरा किया जाये।  यदि उचित समय पर उससे पूरा नही कर पता है  तो यह मानसिक तनाव का रूप धारण कर लेता है और यही से मानसिक विकार की उत्पत्ति होने लगती है।   जब जीवन में नित्य कलह, क्लेश, द्वेष, जलन की भावनाओं का समूह मन को विचारों के दुवंद से परिपूर्ण करके मस्तिष्क को प्रभावित करता है तो जीवन में विघटन की स्थिति को उत्पन्न करता है। मानसिक तनाव से पीडि़त मनुष्य शरीर से धीरे-धीरे निर्बल होने लगता है । मनुष्य के अपने हृदय में पनप रहे नकारात्मक प्रश्नों के जवाब जब तक प्राप्त नहीं होते, तब तक वैसे ही विचार दिल दिमाग में गुंजन करते रहते हैं। मनुष्य की मन की मुराद यदि पूरी न हो तो मन की शान्ति समाप्त हो जाती है और  कई बार  मानसिक तनाव के कारण वह पागलपन की स्थिति तक पहुंच जाता है।

भारत  को युवाओ का देश  भी कहा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि आज भारत में युवाओं की संख्या सबसे अधिक है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी की इस युवा भारत  में ही सबसे अधिक लोग मानिसक रोग से ग्रस्त हैं। आज भारत में लगभग एक अरब की आबादी है जिसमें से लगभग छह करोड़ लोग मानसिक विकार से ग्रस्त हैं।  केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे. पी. नड़्डा ने लोकसभा  में नेशनल कमीशन ऑन मैक्रोइकॉनामिक्स एंड हेल्थ 2015 की रिपोर्ट के हवाले से बताया कि साल 2015 तक करीब 1-2 करोड़ भारतीय  गंभीर मानसिक विकार के शिकार हैं और करीब 5 करोड़ आबादी (कुल आबादी का पांच फीसदी) सामान्य मानसिक विकार जैसे अवसाद और चिंता से ग्रस्त है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की साल 2011 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत अपने स्वास्थ्य बजट का महज 0.06 फीसदी हिस्सा ही मानसिक स्वास्थ्य पर खर्च करता है. यह बांग्लादेश से भी कम है जो करीब 0.44 फीसदी खर्च करता है. दुनिया के ज्यादातर विकसित देश अपने बजट का करीब 4 फीसदी हिस्सा मानसिक स्वास्थ्य संबंधी शोध, अवसंरचना, फ्रेमवर्क और प्रतिभाओं को इकट्टा करने पर खर्च करते हैं.  अक्टूबर 2016 , में नेशनल इंस्टीट्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (एनआईएमएचएएनएस) बेंगलुरु  राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण किया और पता लगाया की भारत में हर  20 में 1 व्यक्ति  किसी न किसी प्रकार के तनाव से ग्रस्त है। हमारा  देश मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिकित्सकों और खर्च के मामले में काफी पीछे है ।