चुनाव जंगल में हो या गांव में-माहौल जंगल का ही रहता है

Posted by Sunil Jain Rahi in Hindi, Society
February 28, 2017

जंगल-जंगल बात चली है- अब जंगल में चुनाव होंगे। जंगल में चुनाव पहले नहीं होते थे, अब होने लगे हैं। चुनाव जंगल में हो या गांव में-माहौल जंगल का ही रहता है। चुनाव प्रचार के तरीके वही रहते हैं, जंगली। जंगल में चुनाव हों और भाषा जंगली न हो तो चुनाव किस काम के। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि हम ऐसे देश में रहते हैं, जहां के जंगलों में चुनाव होते हैं।

ऐसा कोई देश नहीं जहां जंगल में चुनाव होते हों। चुनाव में राजा से लेकर रंक तक को आज़ादी होती है कि वह चुनाव लड़ सके। कुछ उम्‍मीदवार सहायता पाकर चुनाव लड़ जाते हैं तो कुछ वोट कटवा उम्‍मीदवार के रूप में खड़े हो जाते हैं। चुनाव में विद्रोहियों की भूमिका भी अहम मानी जाती है। चुनाव में खड़ा होना हर किसी का जन्‍म सिद्ध अधिकार है। जंगल में ऐसा कोई कानून नहीं बना कि-पांच से लेकर 50 हत्‍यायें की हों वह चुनाव नहीं लड़ सकता। खरगोश से लेकर नील गाय तक चुनाव में खड़ी नहीं हो सकती है। वे केवल चुनाव प्रचार कर सकती है।

जंगली आचार संहिता बनाने पर कभी विचार नहीं किया गया। शेर की भाषा सियार बोल सकता है और बिल्‍ली की भाषा लोमड़ी बोल सकती है। आचार संहिता में यह भी उल्‍लेख नहीं है कि कोई किसी को इन्‍सान या आदमी कह सके। सभी एक दूसरे पर आरोप-प्रत्‍यारोप के समय इन्‍सान, आदमी, लोग, लुगाई, ईमानदार कह सकते हैं। लेकिन कोई किसी को शेर, हाथी, घोड़ा नहीं कह सकता। जंगल के चुनाव में जंगलीपन इस बात से माना जाएगा कि नगर और शहर में रहने वाले किसी प्रचारक और किसी मजबूर का नाम नहीं लिया जाएगा। जंगल के चुनाव में कोई शहरी तहजीब की बात नहीं करेगा। जो भी शहरी तहजीब की बात करेगा उसका न्‍याय जंगली अंदाज़ में होगा।

चुनाव की रणभेरी बज गई। सभी जंगली चुनाव के लिए तैयार हो गए। जंगली चुनाव आयोग ने घोषणा की कि इस चुनाव में वे ही खड़े होंगे, जिनके नाखून तेज और दांत नुकीले होंगे। बिना दांत वाले सांप इसमें हिस्‍सा नहीं ले सकेंगे। चुनाव में प्रचार के लिए/पद पाने के लिए/कुर्सी पर बैठने के लिए/अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए वे अपने नाखून और दांत का प्रयोग कर सकते हैं।

जंगल के चुनाव सम्‍पन्‍न हो गए। जैसा कि मालूम था वही हुआ। जंगली पार्टी को बहुमत मिला। सभी जानवर खुशी से नाच रहे थे। राजा शेर को बनाया गया। लोमड़ी को चालाक विभाग सौंपा गया। सियार को सीमा पर हुआ-हुआ करने के लिए तैनात कर दिया गया। हाथी को दादा और खरगोश को भगोड़ा घोषित कर दिया गया। तेंदुए को विदेश विभाग सौंप दिया गया, जिससे शहर में जाकर अशांति फैला सके।

गाय को गाय की तरह जंगल में आने की अनुमति नहीं थी। अगर गाय जंगल में आएगी तो उसे जंगल के कानून का उल्‍लंघन माना जाएगा। प्रजातंत्र में गाय ही ऐसा प्राणी है, जिस पर सबका बस चलता है। शहर की भाषा में गाय को बेचारी जनता कहा जाता है।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.

हर हफ्ते Youth Ki Awaaz हिंदी की बेहतरीन स्टोरीज़ अपने मेल में पाने के लिए यहां सब्सक्राइब करें।