धर्म ही राष्ट्रीयता की पहचान हैं? क्या यही तय करता हैं कि कौन देश भक्त है और कौन आतंकवादी?

Self-Published

तारीख ०७-फेबुअरी-२०१७, लोकसभा में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने, अपने भाषण में चार्वाक का जिक्र इस तरह किया“चार्वाक, इस तरह कहा करते थे, की कर्ज करो और घी पियो” इसे और इसी सिलसिले में मोदी जी ने आप पार्टी के संसद श्री  भगवंत मान पर भी कंसजा कस दिया की “भगवंत मान होते तोशायद कुछ और पीते”. और तत्पश्चात, पूरा सदन ठहाको की आवाज से गुजने लगा. खैर, इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता हैं की मोदी जी को भली भात पता हैं की पंजाब में नशा एक गंभीर समस्या बन चूका हैं. इसी तरह तारीख ०८-फेबुअरी-२०१७ को मोदी जी ने मनमोहन सिंह पर व्यंग्मयी कसंजा कसा की “बाथरूम में, रेनकोट पहन कर नहाना सिर्फ डॉक्टर साहिब जानते हैं”, राजनीति छीटा कशी होती रहती हैं लेकिन किसी ने ये नहीं सोचा था की इस तरह से लोकसभा में मर्यादा की लकीर को लांघ कर बयान बाजी होगी. यहाँ इस बात का जिक्र करना जरूरी हैं की २०१४ समयकाल में लोकसभा में दाखिल होने पर श्री मोदी जी ने लोकसभा को लोकतंत्र को मंदिर का दर्जा दिया था, लेकिन इस तरह की बयान बाजी करके श्री मोदी ने ना सिर्फ लोकसभा की मर्यादा को लांघ दिया. इन नेताओ पर शब्दों से इस तरह व्यक्तिगत प्रहार करना, एक सोची समझी राजनीति का हिस्सा लग रहा हैं, यहाँ दोनों भाषणों में, श्री मोदी ने और किसी नेता पर  इस तरह व्यक्तिगत प्रहार करते हुये नहीं दिखाई दिये. इन्ही दिनों में ०८-फेबुअरी-२०१७ में आरएसएस के सर्वोच्च नेता श्री मोहन भागवत ने एक सार्वजनिक सभा में कहा“मुस्लिम धार्मिक पहचान से मुस्लिम हैं लेकिन राष्ट्रीय रूप से भारतीय मुस्लिम भी हिंदू हैं.”, इसी संदर्भ में ये पहले भी,बयान बाजी कर चुके हैं की “हिंदू धर्म इतना विशाल हैं, की ये बाकी सभी धर्मो को अपने में समा सकता है”.इस तरह के बयान से हमारा बहुसख्यंक समाज का नागरिक भी कही ना कही सहमत  होता हैं और शायद इसी के तहत मेरे ताया जी भी अक्सर खुद को हिंदू-सिख कहकर ही खुद की पहचान करवाया करते थे, में छोटा था तो सवाल नहीं करता था लेकिन आज हैं ? में, एक गैर हिंदू होने के नाते सामाजिक जिंदगी में कितना आजाद हु, इसका अवलोकन करना ज़रुरी हैं.

साल २००१, में फिल्म गदर आयी थी, भाई ने टिकट लेकर दी और में एक सस्ते सिनेमा घर में इस फिल्म को देखने के लिये गया था, यहाँ किरदार तारा सिंह के हर संवाद पर लोग सीटिया मार रहे थे और सिनेमा हाउस पूरे जोर शोर से गूंज रहा था,में शांत बनकर बैठा था, लेकिन जब बाहर आ रहा था तो पीछे से आवाज आयी, की सारे सरदार तारा सिंह की तरह नहीं होते. मेंने सुनकर, अनसुना कर दिया. कुछ दिन पहले, यहाँ ड्राइविंग सिनेमा जहाँ, आप गाड़ी पार्क करके गाडी में बैठकर आप सिनेमा देख सकते हैं. यहाँ, में परिवार के साथ फिल्म देखने गया था, सामने खड़ी गाडी से फिल्म का पर्दा साफ़-साफ़ नहीं दिख रहा था इसी के तहत, सामने खड़ी गाडी को बिनती की आप, अपनी गाडी को थोड़ा सा पीछे कर ले. सामने से आवाज आयी, “आप ऐसे ही होते हैं.” ऐसे से क्या मतलब था ? में समझ नहीं सका, मेरा बेटा भी मेरे साथ खड़ा था. में,कही भी समाज में कभी भी, बहस या लड़ाई करने की स्थिति में नहीं होता, अगर करता हु, तो कितने लोग मेरे साथ और विरोध में खड़े होंगे. विरोध में, ज्यादा होंगे. में, अक्सर कही भी सार्वजनिक या प्रोफेशनल जिंदगी में, कही भी विरोध की मुद्रा में होता हु, तो अक्सर मेरे लिबास पर सबसे पहले प्रहार किया जाता हैं. बहुत से, शब्द हैं, में यहाँ लिख नहीं सकता. में, अक्सर इस तरह की स्थिति से बचने की कोशिश में खुद को अच्छी तरह से ही पेश करता हु और बाहर जाकर कम बोलने में ही अक्लमंदी समझता हु.

साल २००२, में पासपोर्ट की इन्क्वायरी के तहत पुलिस स्टेशन गये थे, यहाँ अफसर ने व्यंग मयी ढंग से पूछा की आतंकवादी तो नहीं हो, ये एक व्यंग था लेकिन मेंने पलट कर जवाब ज़रुर दे दिया था की हमारे दादा-परदादा और रिश्तेदार फौज में थे और हमारे घर से कोई फौजी बन जाये, तो खुशी का जश्न मनाया जाता हैं. लेकिन, मुझे यहाँ, सोचने पर मजबूर ज़रुर कर दिया की अगर कही भी कोई सरकारी सुरक्षा एजेंसी मेरा एनकाउंटर कर दे, तो कितने लोग समाज में से आकर व्यवस्था से सवाल करेंगे, की ये एनकाउंटर क्यों किया गया ? याद, रखिये, अब तक छप्पन फिल्म, जहाँ अपराधियों का एनकाउंटर दिखाया गया हैं और इस फिल्म, को सार्वजनिक रूप से दर्शकों ने सहराया भी हैं. बस इस फिल्म में और असलियत में पुलिस द्वारा किये जा रहे अन्कोउन्टर में बहुताय अल्पसख्यंक समुदाय के लोग ही आतंकवादी या अपराधी कहकर मारे जाते हैं. कुछ इसी तरह १९९१, उत्तर प्रदेश के पिलीभीत में राज्य पुलिस ने १० सिख का एनकाउंटर किया था जिसका इंसाफ २५ साल के बाद, एक लंबी क़ानूनी लड़ाई के बाद मिला हैं. मेरा यहाँ, व्यक्तिगत रूप से मानना हैं की न्याय पाने के संघर्ष में बहुसख्यंक समाज, की अनुपस्थित के कारण ही  कही ना कही १९८४ और २००२ दंगो के दोषियों को सजा नहीं मिल पा रही हैं, अगर बहुसख्यंक समाज इन दंगो के खिलाफ आवाज उठाये तो शायद व्यवस्था पर दबाव बन सकता हैं और कही ना कही न्याय की उम्मीद की जा सकती हैं.

अंत, में ज़रुर लिखूंगा की व्यक्तिगत रूप से मेरी जिंदगी में गैर-सिख से ही मुझे प्रोत्साहन भी मिला हैं और सहयोग भी,इसी के कारण इनसानियत मैं मेरा विश्वास अडिग की तरह अडोल हैं, लेकिन सामाजिक जिंदगी में, मैं इतना आजाद नहीं हु जितना एक बहुस्ख्यंक समाज का नागरिक. यहाँ मुझे अक्सर एक अच्छा नागरिक बनकर ही रहना पड़ता हैं, इसी के तहत, हमारा धार्मिक स्थान श्री गुरुद्वारा साहिब, यहाँ भीतर जा कर व्यक्तिगत रूप से मुझे अपनी धार्मिक पहचान, मर्यादा के साथ-साथ अपनी आजादी का भी एहसास होता हैं, इसीलिये, मेरे लिये गुरुद्वारा, एक धार्मिक स्थान से ज्यादा कही महत्व रखता हैं. लेकिन, १९८४ में हुये ब्लू स्टार ऑपरेशन के तहत पंजाब के कई जगहों पर गुरूद्वारो को नुकसान पोह्चाया गया था. यहां इस हमले के पीछे  आतंकवाद का तर्क बताया गया था और जिसके तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में फौजी कार्यवाही की गयी थी, और इसी राष्ट्रीय हित के तहत, मैं यहाँ, सवाल करने का हक भी खो देता हु. जाते-जाते, कुछ सवाल करके अपनी बात खत्म करूंगा की आतंकवादी, कोई अल्पसख्यंक ही क्यों होता हैं ? आतंकवादी गतिविधियां, किसी अल्पसख्यंक धार्मिक स्थान पर ही क्यों होती हैं ? क्या सिर्फ, धर्म ही राष्ट्रीयता की पहचान हैं ? और यही तय करता हैं की कोन देश भक्त हैं और कोन आतंकवादी ?. सोचियेगा ज़रुर. धन्यवाद.

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