‘पुंडलीक’ को क्यों नहीं कहा जाता भारत की पहली फिल्म

Posted by Syedstauheed in Hindi, Media
February 10, 2017

अमीर हो या गरीब… बंबई ने इस ऐतिहासिक घटना का दिल से स्वागत किया। उस शाम ‘ओलंपिया थियेटर’ में मौजूद हर वह शक्स जानता था कि कुछ बेहद रोचक होने वाला है। हुआ भी…दादा साहेब द्वारा एक फिल्म की स्क्रीनिंग की गई…पहली संपूर्ण भारतीय फिल्म राजा हरिश्चंद्र के प्रदर्शन ने हज़ारों भारतियों के ख्वाब को पूरा किया।

धुंधीराज गोविंद फाल्के (दादा साहेब फाल्के) हांलाकि इस मामले में पहले भारतीय नहीं थे। उनकी फिल्म से एक वर्ष पूर्व रिलीज़ हुई पुंडलीक बहुत मामलों में पहली भारतीय फिल्म कही जा सकती है, लेकिन कुछ विदेशी तकनीशयन होने की वजह से इतिहासकार इसे पहली संपूर्ण भारतीय फिल्म नहीं मानते। फाल्के ने अपनी फिल्म को देश में ही पूरा किया जबकि दादा साहेब तोरणे ने पुंडलीक को प्रोसेसिंग के लिए विदेश भेजा। फिल्म रील मामले में भी फाल्के की राजा हरिश्चंद्र, तोरणे की फिल्म से अधिक बड़ी थी।

‘पुंडलीक’ के विषय में फिरोज रंगूनवाला लिखते हैं, “दादा साहेब तोरणे की ‘पुंडलीक’ 18 मई-1912 को बंबई के कोरोनेशन थियेटर में रिलीज़ हुई। महाराष्ट्र के जाने-माने संत की कथा पर आधारित यह फिल्म, भारत की प्रथम कथा फिल्म बन गई। पहले हफ्ते में ही इसके रिलीज़ को लेकर जन प्रतिक्रिया अपने आप में बेमिसाल घटना थी, जो बेहतरीन विदेशी फिल्म के मामले में भी शायद ही हुई हो।” वह आगे कहते हैं, “पुंडलीक को भारत की पहली रूपक फिल्म माना जाना चाहिए, जो कि फाल्के की ‘राजा हरिश्चंद्र’ से एक वर्ष पूर्व बनी फिल्म थी।”

बहुत से पैमानों पर पुंडलीक को फीचर फिल्म कहा जा सकता है :

1)- कथा पर आधारित अथवा प्रेरित प्रयास 2)- अभिनय पक्ष 3)- पात्रों की संकल्पना 4)- कलाकारों की उपस्थिति
5)- कलाकारों के एक्शन को कैमरे पर रिकॉर्ड किया जाना।

टाइम्स आफ इंडिया में प्रकाशित समीक्षा में लिखा गया, “पुंडलीक में हिन्दू दर्शकों को आकर्षित करने की क्षमता है। यह एक महान धार्मिक कथा है, इसके समान और कोई धार्मिक नाटक नहीं है।” पुणे के दादासाहेब तोरणे (रामचंद्र गोपाल तोरणे) में धुंधीराज गोविंद फाल्के (दादा साहेब फाल्के) जैसी सिनेमाई दीवानगी थी। उनकी फिल्म ‘पुंडलीक’ फाल्के की फिल्म से पूर्व रिलीज़ हुई, फिर भी तकनीकी वजह से ‘राजा हरिश्चंद्र’ की पहचान पहली संपूर्ण भारतीय फिल्म के रूप में है।

तोरणे की फिल्म को ‘भारत की पहली’ फ़ीचर फिल्म होने का गौरव नहीं मिला। पुंडलीक के रिलीज़ के वक्त तोरणे ने एक विज्ञापन भी जारी किया, जिसमें इसे एक भारतीय की ओर से पहला प्रयास कहा गया। बंबई की लगभग आधी हिन्दू आबादी ने विज्ञापन को देखा। लेकिन यह उन्हें देर से मालूम हुआ कि ‘कोरोनेशन’ में एक शानदार फिल्म रिलीज़ हुई है। पुंडलीक को तकरीबन दो हफ्ते के प्रदर्शन बाद ‘वित्तीय घाटे’ के कारण हटा लिया गया।

तोरणे ने फिल्मों में आने से पहले एक तकनीशियन का काम किया, एक बिजली कंपनी में उन्हें पहला काम मिला। पर यह उनकी तकदीर नहीं थी, कंपनी में रहते हुए वो ‘श्रीपद थियेटर मंडली’ के संपर्क में आए। वह कंपनी की नाट्य-मंडली एवं नाटकों से बेहद प्रभावित हुए, फिर तत्कालीन सिने हलचल ने कला के प्रति उनके रूझान को आगे बढ़ाया। बिजली कंपनी में कुछ वर्षों तक काम करने बाद अपने मित्र एन.चित्रे के वित्तीय सहयोग से कला क्षेत्र में उन्होंने किस्मत आज़माने का बड़ा निर्णय लिया।

एन. चित्रे के सहयोग से विदेश से एक फिल्म कैमरा मंगवाकर उन्होंने पुंडलीक का निर्माण किया। पुंडलीक का निर्माण एक संयुक्त उपक्रम था, जिसमें दादा साहेब तोरणे एवं एन.चित्रे (कोरोनेशन सिनेमा के स्वामी) और प्रसिद्ध फिल्म वितरक पी.आर.टीपनीस की कड़ी मेहनत थी। तोरणे ने फिल्म को रचनात्मक उत्कृष्टता प्रदान की जबकि चित्रे और टीपनीस ने वित्तीय व वितरण की ज़िम्मेदारी निभाई। तोरणे ने शूटिंग लोकेशन के रूप में बंबई के ‘मंगलवाड़ी परिसर’ को चुना, जहां श्रीपद मंडली के मराठी नाटक का सफल फिल्मांतरण किया गया।

तोरणे द्वारा स्थापित सरस्वती फिल्म प्रोडक्शन (सरस्वती सिनेटोन) के तहत अनेक उल्लेखनीय फिल्मों का निर्माण हुआ। इनमें: श्यामसुंदर, भक्त प्रह्लाद, छ्त्रपति शम्भाजी, राजा गोपीचंद, देवयानी जैसी फिल्मों का नाम लिया जा सकता है। रामगोपाल तोरणे सिनेमा कला में दक्ष रहे, माना जाता है कि सरस्वती बैनर की ज़्यादातर फिल्मों की कथा, पटकथा, संपादन, निर्माण, निर्देशन जैसे महत्त्वपूर्ण पक्षों को तोरणे ही देखते थे।

पुंडलीक के निर्माण के समय मोबाइल कैमरा की तकनीक नहीं थी, इसलिए फिल्म को केवल एक कोण पर ही रिकॉर्ड करना संभव था। रिकार्डिंग से तोरणे संतुष्ट नहीं हुए, इसलिए पूरी फिल्म अलग-अलग हिस्सों में रिकॉर्ड कर जोड़ने का निर्णय लिया गया। आजकल यही काम ‘संपादक’ करता है… तोरणे सिनेमा से जुड़े महत्त्वपूर्ण तकनीकी पहलूओं के दक्ष जानकार थे। दुख की बात है कि इस सब के बावजूद रामगोपाल तोरणे को लम्बे अर्से तक गुमनामी में जीना पड़ा। वित्तीय संकट की वजह से ‘सरस्वती सिनेटोन’ सन 1944 में तोरणे के हाथों से निकल गई, कंपनी को श्री अहमद ने खरीदा।

‘राजा हरिश्चंद्र’ के निर्माता दादा साहेब फाल्के ने अपनी फिल्म को ‘संपूर्ण स्वदेशी’ कहकर संबोधित किया। स्वदेशी अवधारणा से ‘पुंडलीक’ की दावेदारी को क्षति हुई। तत्कालीन भारतीय परिदृश्य में ‘स्वदेशी’ का उपयोग देशभक्ति के संदर्भ से अभिभूत था। विगत 150 वर्षों से परतंत्रता झेल रहे भारतीयों के लिए ‘स्वदेशी’ फिल्म परतंत्रता की बेड़ियों से ‘मुक्तिगान’ के रूप में जानी गई। लेकिन आज के वैश्विक या ग्लोबल परिदृश्य में जब विदेशी तकनीशियनों और कलाकारों का जोरदार स्वागत है, दादा साहेब फाल्के की स्वदेशी अवधारणा को समझना थोड़ा मुश्किल है।

इस वजह से भारत में सिनेमा के आरंभिक समय से ही कथाओं में ‘फैंटेसी’ और ‘पलायनवाद’ का प्रयोग देखा गया। सिनेमा ने कथावस्तु से सामाजिक एवं राजनीतिक जागरण का दायित्त्व निभाया। बालकानी एवं फ्रंट स्टाल के वंशानुगत विभाजन के बाद भी सिनेमा ने मनोरंजन का लोकतांत्रिक स्वरूप सुदृढ किया। सिनेमा हाल के अंधेरे में आडिटोरियम में धर्म और जाति की दीवारें ढह जाती हैं।

स्वतंत्रता से पूर्व के समयकाल में रजतपट ने राष्ट्रीय संवेदनाओं को एकीकृत करने का काम किया। भारतीय सिनेमा का पहला सेंसर विवाद ‘भक्त विदुर’ (1921) के संबंध में हुआ। फिल्म को सेंसर की बाधा, अश्लीलता या हिंसा की वजह से नहीं बल्कि ‘राष्ट्रवाद’ के संदर्भ में झेलना पड़ी। लेखक आशीष राजध्यक्ष एवं पौल विलमेन ने उनकी पुस्तक ‘भारतीय सिनेमा का संदर्भ इतिहास’ में इस बात की पुष्टि की है।

इसमें शक नहीं कि अधिकांश संचालकों के लिए ‘भारतीय सिनेमा’ व्यवसाय का विषय रहा, लेकिन सुधी फिल्मकारों की कोई कमी न थी। सिनेमा को समाज सुधार एवं राष्ट्र निर्माण का उपकरण मानने वाले फिल्मकारों में वी शांताराम, महबूब खान, बिमल राय और ख्वाजा अहमद अब्बास का नाम लिया जा सकता है। इन्होने सिनेमा को महज मनोरंजन की सीमा से बाहर निकलकर ‘सामाजिक यथार्थ’ का तत्त्व उसमे जोड़ा। फिल्मों को ‘सामाजिक दर्पण’ की सत्ता मानकर इनके माधय्म से ‘परिवर्तन’ की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया। सामाजिक बदलाव का स्वर लेकर असमानता, जातिवाद और सामुदायिक सदभावना जैसे प्रश्नों पर आमजन को शिक्षित किया।

उच्चस्तरीय सिनेमा शीघ्र ही ‘राष्ट्रीय गौरव’ का प्रतीक बन गया। सत्यजीत राय की फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ ने कान फिल्म सामारोह फ्रांस (1956) में धूम मचाते हुए ‘सर्वश्रेष्ठ फिल्म’ का पुरस्कार जीता। गौरव का यह सिलसिला एक वर्ष बाद ‘कारलोवी वेरी’ फिल्म सामारोह में शंभू मित्रा की फिल्म ‘जागते रहो’ ने जारी रखा। अभी आज़ादी को महज एक दशक हुआ था, इस महान सफलता ने ‘हम भी सक्षम हैं’ की विचारधारा को विकसित किया।

भोजपुरी सिनेमा की पहली फिल्म ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढइबो’ के (1962 में) रिलीज़ होने के तीन वर्ष बाद एक महत्त्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुआ। स्थानीय साप्ताहिक पत्र ‘रम्भा’ ने लिखा “फिल्म की बाक्स ऑफिस कामयाबी ने ‘भोजपुरी’ के महत्त्व एवं प्रासंगिकता में योगदान दिया है। सम्मानजनक भाषाओं की तरह भोजपुरी भी सम्मान की भाषा हो गई है। खासकर भोजपुर वासियों को अपनी भाषा पर गर्व महसूस हो रहा है।” आज जब किसी ‘अनजान’ भाषा की फिल्म को प्रमाणन संस्था, प्रमाण देती है तो यह ‘भारतीय अस्मिता’ का आंदोलन फिर से जीवित हो जाता है।

सिनेमा माध्यम ने पूर्व एवं दक्षिणी सिनेमा को परस्पर संवाद का अवसर दिया। सिनेमा ने दक्षिण एवं पूर्व की दूरियां पाट कर प्रेरणा, प्रोत्साहन व सहयोग से सकारात्मक प्रतिस्पर्धा व प्रोत्साहन के युग की शुरुआत की। दक्षिण क्षेत्र के एस.एस. वासान द्वारा स्थापित ‘जेमिनी फिल्मस’ ने यादगार हिन्दी फिल्मों का निर्माण किया। इस परंपरा को एवीएम एवं प्रसाद प्रोडक्शन ने जारी रखा। हिन्दी फिल्मों व गीतों की ‘राष्ट्रीय लोकप्रियता’ यह बताती है कि सिनेमा देश को एक सूत्र में बांध सकता है। सीमाओं के बावजूद सिनेमा क्रिकेट की तरह एक मज़हब हो गया है।

आज हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा फिल्म निर्माता देश है। पचास के दशक में सोवियत संघ एवं मध्यपूर्व एशिया का दिल जीतने वाला भारतीय सिनेमा, ‘वैश्विक परिदृश्य’ में ‘वैश्विक’ अवधारणा बनने को प्रयासरत है। मुख्यधारा के सिनेमा में समय के साथ ‘संरचना’ एवं ‘विषय वस्तु’ में बहुत अधिक बदलाव हुए हैं। आज एक फिल्म की औसतन लम्बाई पहले की अपेक्षा कम हो चुकी है। एक समय में ‘युगल गीतों’ का चलन हुआ करता था लेकिन आज यह यदा-कदा ही नज़र आते हैं।

भारतीय सिनेमा में हर अंदाज़ के ‘सुपरस्टार’ हुए हैं। सपनों के इन सौदागरों ने सिनेमा के माध्यम से आमजन को उनके स्वाद के मुताबिक ‘निर्वाण’ एवं ‘पलायनवाद’ का मार्ग दिया है। आज का दर्शक निर्णय लेकर चयन कर सकता है। आज सिनेमा को याद करना स्वयं को याद करना जैसा है, वह दरअसल हमारी ज़िंदगियों का अक्स ही तो है।

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