मतदाताओं को ऐसी सरकार चुनने की ज़िम्मेदारी, जो समाज की मूलभूत एवं प्रमुख बातो को तरजीह देती हो..!!

Posted by Charlie Prakash
February 4, 2017

Self-Published

अब, जब उत्तर प्रदेश, गोवा और पंजाब की जनता लोकतंत्र के महापर्व पर भागीदार होने के लिए इक्कठा हो रही है वही उत्तर प्रदेश के सूबे के 134351297 करोड़ मतदाताओं को नयी सरकार चुनने की ज़िम्मेदारी दी गयी है, सारी पार्टियों के घोषणा पत्रो से ये एकदम साफ हो गया है कि उन्हें पर्यावरण, प्रकृति,  जंगल, सुरक्षा, महिला सुरक्षा, शिशु,आदिवासी, दलित एवं बुनियादी स्वास्थ्य एवं शिक्षा से कोई सरोकार नहीं है

राजनितिक पार्टियों ने प्रदुषण के खिलाफ किसी भी तरह का चिंतन नहीं दिखा देता तथा उनके लंबे चौड़े घोषणा पत्रो में कही भी इसका जिक्र नहीं है
दिल्ली की तर्ज पर उत्तर प्रदेश की हालात दिल्ली से ज्यादा ख़राब है  ग्रीनपीस द्वारा लिए गए सर्वे में दिल्ली के बाद इलाहाबाद की हवा की इस्तिथी दिल्ली से भी बहुत ज्यादा ख़राब है

महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार जैसे सेक्स ट्राफिकिंग, एसिड अटैक, दहेज़ हत्या, सामूहिक बलात्कार , विच हंटिंग तथा देवदासी प्रथा को रोकने के लिए किसी भी राजनितिक पार्टियों ने किसी तरह का कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है

इससे शर्मनाक सच्चाई और क्या हो सकती है कि 2016  की मानवाधिकार की वार्षिक रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश में पुलिस हिरासत में 401 मौते हुई है, जिसमे अधिकांश आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के लोग है साथ ही साथ उत्तर प्रदेश में महिला हिंसा और बच्चो के साथ बलात्कार में उत्तर प्रदेश ने मिसाल क़याम की है..नारी साक्षरता व बालिका की संख्या के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे नीचे के 5वे पायदान में है..
राज्य में कार्य करने वाली तथाकातीथ सँस्था मानवा अधिकार आयोग, महिला आयोग, बाल आयोग , लोकायुक्त, सूचना आयोग पूरी तरह से मंत्रियो, रिटायर्ड जजो, नौकरशाहो और उनके रिश्तेदारों की आरामगाह बन चुके है..इनका काम सिर्फ समाज में हो रही ज्यादतियों, हिंसाओं तथा भरस्टाचार पर पर्दा डालना तथा उनको सुरक्षा देना का काम हो गया है..

प्रदेश में पूरा सत्ता तंत्र, चाहे वो सरकार का हो, धर्म का हो या पुरुषवादी सोच का, पूरी तरह से आदिवासी, दलित, महिला और मजदूर के खिलाफ खड़ा हुआ है
प्रदेश में 400 से ज्यादा छोटे बड़े दंगे हो चुके है
राजनितिक पार्टियों द्वारा लव जिहाद, धर्म परिवर्तन, तीन तलाक, गो रक्षा, फ़र्ज़ी देशभक्ति आदि संघ परिवार, पुलिस और केंद्र का साझा अभियान है
झुटे मुकदमो में मुस्लीम युवाको को बरसो से जेल में रखा गया है

आदिवासियों की ज़मीन पर सरकार जबरन कब्ज़ा कर रही ही तथा जल, जंगल और ज़मीन से उनको खदेड़ रही है तथा उनकी ज़मीनो को पूँजीपति लोगो को ऊँचे दामो में बेच रही है स्मार्ट सिटी के नाम पर शहर में जुग्गी झोपड़ी में रहने वालों, ठेला, खोमचा की दूकान और बस्तियों को उजाड़ा जा रहा है तथा गरीबो का आवासीय अधिकार छीना जा रहा है
समाज में सबसे बड़ा अभिशाप, सर पर मैला ढोने की प्रथा अभी भी कही जगहों पर है

2009 का अनिवार्य वा मुफ्त शिक्षा का कानून गरीब बच्ची का मज़ाक बन गया है उत्तर प्रदेश के अंग्रेजी माध्यम के महंगे स्कूलो ने कानून को अंगूठा दिखा कर 25% गरीब बच्चो को एडमिशन देने से मना कर दिया है तथा रही सही कसार केंद्र द्वारा शिक्षा के लिए बजट में  अत्यधिक कटौती करके उसमें चार चाँद लगाने का काम किया है..

आइये हम ऐसी मांगो को भी मांगे, जो पर्यावरण, प्रकृति, जंगल,महिला सुरक्षा, शिशु आदिवासी, दलित आदि  को भी अपने पार्टी के घोषणा पत्रो में प्रमुखरूप से जगह दे तथा ऐसी सरकार को चुने जो इन सबको को प्रमुखता से तरजीह दे..!!

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