मैं, आप और नेताजी

Posted by Aditya Ojha
February 22, 2017

Self-Published

भारतीय राजनीति के प्रणेताओं ने भारतीय राजनीति की ये शक्ल सपने में भी नहीं सोची होगी। गौरतलब है कि राजनीति के नामकरण में ही त्रुटियां हैं। ‘राज’ शब्द का प्रयोग से ही अकड़ का आभास होता है। खैर ये किसी और चर्चा का विषय है।

पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे है। पर असमंजस इस बात पर है कि चुनाव लड़ कौन रहा है। चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त पार्टी या भारत सरकार से मान्यता प्राप्त PR टीम। लोकसभा चुनाव 2014 के बाद जिस प्रकार एक नाम ने पूरे राजनितिक ‘उद्योग’ पर अपनी पकड़ बनाई है वह काबिल-ए-तारीफ है। ‘प्रशांत किशोर’ नाम तो सुना ही होगा। कहीं प्रशांत भूषण से भ्रमित ना हो जाईयेगा। खैर काम दोनों के एक ही समान है। दोनों दलीलें देते है, बिना अच्छे बुरे की पहचान किये।

पर भारतीय राजनीति में असल चिंता का विषय तो लगातार बढ़ते फुहड़ भाषणों से है। क्या वो मंत्री हों, मुख्यमंत्री हों या हमारे प्रधानमंत्री, सबने अपनी बड़ाई में पूल बांधते हुए नरक परोसा है। चिंता इस बात की भी है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े  राज्य को आज नेता की कमी हो गई है। कुछ नेता है तो उनके लिए बस काम बोलता है, उत्तर प्रदेश को उम्मीदों का प्रदेश तो कहते है पर सिर्फ कहते हैं। किसी शहजादे को पूरी विधानसभा सीट की गिनती नहीं पता तो किसी पार्टी के पास प्रदेश में कोई चेहरा ही नही बचा है।

ऐसी होड़ सिर्फ नेताओं तक ही सिमित नहीं हैं। बीच-बीच में कुछ कुंठित, बीमारू लोग कुकुरमुत्ते की तरह निकल आते हैं। सरेआम facebook और twitter पर अपने विपक्षी नेता को गली देने। लोकतंत्र के महापर्व को धूमधाम से मानाने। खैर सूबे में चुनाव है। कहना पड़ता है जनता ही जनार्दन है।

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