रंगून, कई मायनों में एक बेहतरीन फिल्म हैं.

Posted by हरबंश सिंह
February 28, 2017

Self-Published

विशाल भरद्वाज, फ़िल्मकार बनने से पहले एक संगीतकार थे और आज भी हैं, एक संगीतकार के रूप में इनकी पहचान १९९६ में आयी गुलजार की फिल्म माचिस से हुई थी, व्यक्तिगत रूप से इस फिल्म का गीत “चप्पा चप्पा चरखा चले” मुझे बहुत पसंद हैं उसी तरह से १९९९, गुलजार की ही फिल्म हूं तू हूं, का एक गीत “देखी है हमने, पानी ओ पे छिट्टै उडाती हुई लड़की”, आज भी ये गीत मेरे ज़ेहन में पूरी तरह से मौजूद हैं, विशाल भरद्वाज के संगीत में सुरों और आवाज को इस तरह से पिरोया जाता हैं, की इनकी पहचान आम फिल्मी संगीत से हट कर बन जाती हैं मसलन कही भी कोई तीखी या उच्ची आवाज नहीं होती और ना ही भारी आवाज करने वाले साज का इस्तेमाल किया जाता हैं. पूरा गीत एक लय, में आपको बाँध कर रख देता हैं. आज जब, विशाल भारद्वाज एक कामयाब फिल्मकार बनकर उभर आये हैं तो इनके निर्देशन में भी इनके संगीत की तरह एक लय पूरी तरह से मौजूद हैं और कही भी कोई शोर शराबा या उच्ची आवाज इनकी फिल्म से अक्सर ग़ैरमौजूद ही रहती हैं. इसी संदर्भ में इनकी नयी फिल्म रंगून, कई मायनों में एक बेहतरीन फिल्म हैं.

अगर फिल्म के मुख्य किरदारों की बात करे तो, विशाल भरद्वाज ने इन्हें बखूबी फिल्म की कहानी के साथ पिरोया हैं. मसलन, रुसी, एक पारसी फिल्मकार हैं जो पहले एक जाँबाज ऐक्टर था लेकिन किसी हादसे में इनका हाथ कट गया, इन्हें इस बात का अफ़सोस तो हैं लेकिन हिम्मत का जज्बा आज भी इनमें मौजूद हैं. कही ना कही, ये अपनी बात पर अडिग होने की जिद्द पर कायम रहते हैं. इसी तर्ज पर इस फिल्म की मुख्य महिला किरदार जूलिया, ये एक कामयाब फिल्मी अदाकार हैं और अपनी इस शोहरत या इस काल्पनिक दुनिया से ही खुश हैं, इन्हें अपनी गुलामी का कही भी कोई एहसास तक नहीं, ये फिल्म के पहले भाग में बड़ी शान से कहती हैं की बचपन में इनकी माँ से रुसी ने इन्हें १,००० रुपये में खरीदा था, ये कुछ १९३५-४० की बात कर रही हैं जब १००० रुपया बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी. ये रुसी के लिये इस क़द्र पागल हैं की ये रुसी के कहने पर कुछ भी कर सकती हैं. और इसी सिलसिले में फिल्म का एक और किरदार नवाब मलिक, पूरी फिल्म में इस किरदार को एक फौजी के ही लिबास में दिखाया गया हैं और कही भी ये अपने नाम के सिवा और कोई पहचान नहीं रखता. यहाँ, एक और किरदार का भी जिक्र होना चाहिये,  हार्डिंग ये एक अंग्रेज फौजी अफसर हैं और अंग्रेज कूट नीत का जीता जागता प्रमाण.

फिल्म, की शुरुआत ही १४४२ के इर्द गिर्द घूमती हुई दिखाई देती हैं जहाँ भारत अंग्रेज हकुमत का गुलाम देश हैं, वही दूसरे विश्व युद्ध का आगाज अपनी चरण सीमा पर हैं और नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिंद फौज अपनी रूप रेखा में आ चुकी हैं. यहाँ, अंग्रेज हुकूमत को आजाद हिंद फौज का पूरी तरह से एहसास हैं वही एक आम भारतीय को भी है. कही उच्च वर्ग में ये सवाल हैं की आजाद हिंद फौज या हम क्या कर सकते हैं वही समाज का बड़ा तबक़ा जो अंग्रेज हुकूमत की पार्टी में मेहमान भी हैं और वही इसी अंग्रेज हुकूमत की शराब पीने से  भी नहीं हिचकिचाते, उन्हें आजाद हिंद फौज से बहुत उम्मीद हैं और पर्दे के पीछे रहकर ये आजादी के लिये कुछ भी करने का हौसला रखते हैं इसी सिलसिले में फिल्म के एक किरदार महाराजा (भारतीय महाराज, जिनकी रियासत पर अंग्रेज हुकूमत का कब्जा हैं.) अफसर हार्डिंग से कहते हैं की “उनकी ये बेशकीमती तलवार अगर आजाद हिंद फौज के हाथ आ जाये तो इसे बेचकर वह भारत की आजादी ला सकते हैं.” ये पूरी फिल्म, इसी तलवार के इर्द गिर्द ही घूमती हुई रहती हैं.

फिल्म की कहानी आगे चलती हैं, और एक जगह जूलिया को नवाब मलिक के साथ अपनी मुहब्बत का एहसास होता हैं वही इसी सीन में नदी के लकड़ी के पुल के उस तरफ रुसी, जूलिया को खोजता हुआ पहुच जाता हैं. जूलिया के कदम तो रुसी के तरफ बढ़ जाते हैं. वही फिल्म की कहानी आगे चलती हैं जहाँ जूलिया को इस बात का इल्म होता हैं की ये रुसी की तरफ उसका आकर्षण था और कही ना कही रुसी, जूलिया को अपनी जांगीर ही समझ रहा था वही जूलिया को  नवाब मलिक के साथ हुई मुहब्बत का एहसास, अपनी आजादी की तरह लग रहा था, यहाँ फिल्म की कहानी कई सीन में इस बात को बताने की कोशिश करती हैं की जूलिया को नवाब मलिक के साथ हुई मुहब्बत से, जिंदगी में पहली बार अपनी,मौजूदगी का एहसास हुआ था. यहाँ, रुसी को इन दोनों की मुहब्बत पर भी शक हो जाता हैं,

फिल्म की कहानी आगे मोड़ लेती हैं जहाँ, जूलिया को ये पता चलता हैं की नवाब मलिक असलियत में आजाद हिंद फौज का एजेंट हैं, यहाँ फिल्म के दो बेहतरीन संवाद हैं एक जगह जूलिया नवाब मलिक से कहती हैं की जान से भी बढ़कर कुछ हैं, वही नवाब मलिक कहता हैं की “जिस के लिये मरा जा सके”, वही जूलिया कहती हैं की उसे मार दो इसके जवाब में नवाब मलिक कहता हैं की “तुम अपने जिस्म में दफन हो”. फिल्म की कहानी आगे मोड़ लेती हैं और एक पूर्वी-भारत की नागरिक, जो की अंग्रेज फौज में नर्स हैं, वह गद्दारी के इल्जाम में अंग्रेज फौज द्वारा पकड़ ली जाती हैं और अपने बच्चे की कुरबानी देने को भी तैयार हैं लेकिन अपने साथियों का नाम नहीं बताती वही इसी सीन में नवाब मलीक आजाद हिंद फौज का गीत गाता हुआ अंग्रेज फौज के सामने बड़ी बहादुरी से खुद की पहचान एक आजाद हिंद फौज के सिपाही के रूप में करवाता हैं, इस सीन के पूरे होने के बाद, रुसी एक जगह गहरी सोच में बैठा हुआ दिखाई देता हैं. यहाँ, निर्देशक बड़ी ही शालीनता से ये बता रहा हैं की रुसी को भी अपनी गुलामी का एहसास हो चूका हैं.

फिल्म, कई और मोड़ से होकर गुजरती हैं और अंत में जूलिया और नवाब मलिक के मारे जाने के बाद, रुसी अंग्रेज हुकूमत से बगावत कर ये तलवार आजाद हिंद फौज के हवाले करने के लिये, एक रसी पर चल रहा होता हैं. यहाँ, फिल्म का तो अंत हो गया, लेकिन फिल्म की कहानी और निर्देशन लाजवाब था, ये कहानी दबी ज़ुबान में इस बात का ऐलान करती हैं की आप को अपने जीवन में कभी ना कभी गुलामी का एहसास होता हैं मसलन रुसी को उसके पिता जी से और जूलिया को रुसी की गुलामी का एहसास होता हुआ इस फिल्म में दिखाई देता हैं और एक दिन वह इस गुलामी के खिलाफ अपनी बगावत का इजहार भी कर देते हैं. मसलन, हर इंसान की सामाजिक और जिंदगी की आजादी में कही भी कोई हनन होगा तो विद्रोह के स्वर उठ सकते हैं.

वही, नवाब मलिक, जहाँ ये किरदार पूरी फिल्म में एक सिपाही के रूप में ही नजर आया हैं वही इस किरदार के नाम से कई छवि उभर कर आती हैं, लेकिन ये भारत देश की आजादी के लिये कुर्बानी की किसी भी हद तक जा सकता हैं. वही, ये एक विद्रोह के रूप में जन-गन-मन राष्टगान को गाता हुआ अंग्रेज सरकार के खिलाफ अपनी बगावत का इजहार भी करता हैं. यहाँ, रुसी, जूलिया, नवाब मलिक और नर्स, ये अपनी जात या धर्म का कही भी वर्णन नहीं करते लेकिन इनकी देशभक्ति से सिनेमा हाल तालियों से ज़रुर गूंज सकता हैं. ये, आज उस मानसिकता को चोट करती हैं की एक बहुस्ख्यंक धर्म के अनुयायी होने से आपकी राष्टभक्ति पर कोई सवाल नहीं उठ सकता  वही दूसरे अल्पसख्यंक समाज को अक्सर अपनी देशभक्ति का प्रमाण देना होगा.

अंत, में इस फिल्म का एक बेहतरीन संवाद लिखकर अपना लेख पूरा करता हू जहां अंग्रेज अफसर अंग्रेजी में कहता हैं की“जिस दिन अंग्रेज हुकूमत भारत को आजाद कर देगी, ये देश दुनिया का सबसे बड़ी भ्रष्ट व्यवस्था के रूप में उभर कर आयेगा”. अब, ये संवाद कितना सही या गलत हैं, आप इसका अंदाजा खुद लगाइयेगा. धन्यवाद.

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