राष्ट्रवाद लाइएगा या संस्कृति बचाइएगा?

Posted by Rohit Sharma in Campus Watch, Hindi, Society
February 26, 2017

JNU, हैदराबाद यूनिवर्सिटी, FTII, जाधवपुर आदि शिक्षा के उच्च संस्थानों से गुज़रते हुए उत्पात का बसंत अब इंडियाज़ नंबर वन यूनिवर्सिटी तक पहुंच चुका है। बीते दिनों रामजस कॉलेज में हुई वारदात जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों से संचालित छात्र संगठन ने उच्च शिक्षा से प्राप्त उच्च मूल्यों का सोदाहरण परिचय दिया। वो मूल्य जो उन्हें विश्वविद्यालय परिसर में रहते हुए कहीं और से प्राप्त होते हैं। वो सुन नहीं सकते, समझने की वृत्ति का विकास ही नहीं हुआ होता है उनमें। वाद-विवाद, संवाद के महत्व से नावाकिफ़ ये तथाकथित विद्यार्थी लम्पटों की तरह बस लात-जूतों से ही सबकुछ निपटाना चाहते हैं।

इन्होंने इस गुण का बखूबी परिचय रामजस कॉलेज की घटना में दिया। एक ऐसे कार्यक्रम में जहाँ ‘असहमति की संस्कृति’ के विभिन्न पहलुओं पर बात होनी थी, इन्हें इसलिए नागवार लगी क्योंकि उसमें आमंत्रित एक वक्ता पर तथाकथित देशद्रोह का आरोप है। आरोप खुद में अपराधी होने का सबूत नहीं देता है। जब तक आरोप सिद्ध नहीं हो जाता कानून उस व्यक्ति को पूर्ववत ही देखता है। खैर मामला जब देशभक्ति के झूठे उन्माद का हो, तब आजकल आपको तर्कों के बगैर ही देशद्रोही की श्रेणी में बड़ी आसानी से डाला जा सकता है। जब पैमाना बेवजह ‘वंदे मातरम्’ और ‘ भारत माता की जय’ बोलना भर हो तब आप कभी भी देशद्रोही हो सकते हैं। इस पैमाने के इतर दावे से कह सकता हूं कि देशभक्ति के प्रमाणपत्र वितरकों में से 20 फीसदी भी ऐसे न होंगे जो राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत को सही से गा और लिख भी सके।

मैं किसी संगठन विशेष का सदस्य नहीं रहा कभी, फिर भी सबसे ज़्यादा ताल्लुक मेरा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लोगों से ही है। उनमें से कुछ लोगों से जब हो रही घटनाओं पर बात होती है तब या तो वे घटना के 2 महीने पहले की घटना पर बात करने लगते हैं या केरल, बंगाल की याद दिला मुझे कम्युनिस्ट, देशद्रोही साबित करने लग जाते हैं। सीधी बात है कि अगर आप उनके साथ नहीं हैं तो आप कम्युनिस्ट हैं और कम्युनिस्ट होना मतलब देशद्रोही होना है। जब बात तर्कों की करेंगे तो वो आपसे सवाल करते हैं ‘तुम देशभक्त हो कि नहीं?’ एक ऐसी भावना जो स्वतःस्फूर्त है, बिना वंदे मातरम् बोले भी हमारे अंदर ज़िंदा रहती है के ऊपर सवाल उनका एकमात्र प्रश्न और तर्क भी है।

कभी मेरे मन में विचार आता है कि हम जब ज़िंदगी के फैसलों में हमारे पास कुछ नहीं बचता है तब हमारे पास तर्क होता है, जिसकी मदद से हम उस फैसले के साथ मजबूती से खड़े होते हैं। विचारशील मनुष्य का सबसे बड़ा गुण तर्कशक्ति है। मेरा मानना है कि हर तरह के विवाद की स्थिति में हम संवाद से समन्वय की ओर बढ़ सकते हैं। लेकिन यह वातावरण अब कम से कम मेरे दिल्ली विश्वविद्यालय में तो रहा नहीं है। जहां छात्र संघ का नेता- प्रोफ़ेसर को बेवजह मार सकता है, जहां एक नाटक को होने से रोका जाता है, जहां प्रो. वीसी के मुंह पर कालिख़ पोता जाता है, वहां संवाद की स्थिति बन भी तो नहीं सकती है।

ये तथाकथित राष्ट्रनिर्माणकारी शक्तियां जो संस्कृति बचाने का जिम्मा भी उठाए फिरती हैं, उन्हें क्या यह याद नहीं रहा कि उसी संस्कृति में एकलव्य ने उंगली दक्षिणा में दी थी, उसी संस्कृति में उनके माँ-बाप ने शिक्षक को कहा था कि मारते रहिएगा नहीं तो लड़का बिगड़ जायेगा। आप जिस संस्कृति की बात करते हैं और संघ के स्कूलों में जिसकी नियमित ट्रेनिंग दी जाती है उसमें गुरु, बड़े लोग आदि का आदर करना भी शामिल है। लेकिन उस संस्कृति को आप भूल जाते हैं, जब आज़ाद देश में आज़ादी के नारे लगते हैं। क्योंकि आपके अनुसार आज़ादी तो मिल चुकी है।

आप जब न्यूज़ रूम में बैठकर तर्क देते हैं कि ‘अपने घर में कोई कहे पापा मुझे आज़ादी दो’, तो ये क्या बात हुई…. तब हमें हंसी ही आ सकती है और आती भी है। क्योंकि हम जानते हैं कि सदियों से कुछ मामलों में घर सबसे बड़ा कारागृह रहा है लड़कियों के लिए। आप जब गलियां देते हैं तब माँ-बहन की इज्जत करने की संस्कृति को भूल जाते हैं क्योंकि तब आपके सामने वाला आपके अनुसार देशद्रोही होता है और आप एकमात्र देशभक्त। आपने एक ही साथ संस्कृति और राष्ट्रवाद दोनों लाने का जिम्मा ले लिया है अपने सर। इसी चक्कर में जब आप ‘वंदे मातरम्’ कहते हैं तब इस देश की महिलाओं को गालियां सुना जाते हैं।

आपसे संस्कृति तो बच पा रही नहीं रही है ऊपर से जो बचा हुआ है उसे बर्बाद करने पर तुले हैं। करेंगे भी क्यों नहीं बर्बाद आपके मायनों में यह देश नहीं हिन्दू राष्ट्र होना चाहिए। फिर कलाम, ज़ाकिर हुसैन, ए आर रहमान, अमजद अली, हामिद अंसारी जैसे लोगों की तो ज़रूरत ही नहीं है आपको- जो आपकी कला और संस्कृति के सम्बल हैं।

पढ़ने की जगहों को इस तरह बेतरतीब न करो भाई! हम तर्क से जीने के लिए विश्वविद्यालय आते हैं तुम इस कदर पत्थर न बरसाओ। हम सवाल करने की सोच पैदा करने आए हैं, तुम जवाब की जगह गालियां मत दो भाई! आओ न तर्क-वितर्क की बात करें कुछ तुम सीखो, कुछ हम सीखें! लाठी-डंडों से राष्ट्र निर्माण नहीं होता उसे नए विचार और तर्क ही गढ़ते हैं।

 

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