वैचारिक मतभेद से व्यक्तिगत मतभेद तक:सोशल मीडिया

Posted by Riju
February 14, 2017

Self-Published

सोशल मीडिया पर आजकल लोग खुले मन से अपने विचारों को रखते है। यह विचार कभी-कभी किसी दूसरे पर इतने कठोर और व्यक्तिगत होते है कि सामने वाले में रोष उत्पन्न कर देता है। धार्मिक,जातिगत एवं सांस्कृतिक मुद्दे पर अमूमन ऐसा देखा जा सकता है।चुनावी दिनों में घटनाएं आम हो जाती हैं।जैसा की आजकल चुनाव चल रहा है और चुनावों में भी उत्तर प्रदेश का चुनाव तो धार्मिक और जातिगत के साथ-साथ विभिन्न पार्टियों के समर्थकों का सोशल मीडिया पर भिड़ना आम हो गया हैं।
एक तो पहले से ही सोशल मीडिया की भाषा को लेकर विद्वानों की अच्छी राय नहीं थी,और जब इस प्रकार की बहस में भाषा में अश्लीलता आ जाती है तो इसका स्तर और नीचें चला जाता हैं।
बात बस इतने तक ही अगर सिमित होता तो शायद यह नज़रअंदाज़ किया जा सकता था।लेकिन यह इससे काफी आगे बढ़ चुका हैं।सोशल मीडिया पर विचारों का मतभेद कब व्यतिगत हो जाता है यह पता भी नहीं चलता। गलत यह नहीं है कि आप अपने विचारों को रखें गलती वहां हो जाती है जब ये विचार किसी के भावनाओं को आहत करती है। और इसी के बाद शुरु हो जाता है सोशल वॉर ,और कभी-कभी यह वॉर का अंत किसी के प्राणों की आहूति के साथ खत्म होती हैं।हाल के दिनों में ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती रही हैं।
इन परिस्थितियों को देखते हुए इस बहस को हवा मिल गया है कि क्या साइबर नियमों को कठोर करने की आवश्यकता है? क्या सोशल मीडिया पर मिल रही वैचारिक आजादी को कम किया जाए?
निष्कर्ष जो भी आए लोगों के आजादी पर अगर अंकुश लगता है तो कही न कही उसकी ज़िम्मेवारी हमारी खुद की होंगी।

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