संवाद की शालीनता की गरिमा

Posted by Amit Patle
February 26, 2017

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

  1. आज भले ही हम जितना भी सभ्य होने का ढोंग कर लें और अपने को शिक्षित सिद्ध करने के लिए जितनी भी डिग्रीयां जमा कर लें,हम क्या कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं और कैसे कर रहे हैं, किसी भी प्रयास के निष्कर्ष की दृष्टि से यह निर्णायक बिंदु हैं।
    “समाज की शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे विद्यार्थी ‘काबिल’ बनें पर यहाँ तो हम अपने विश्वविद्यालयों में ‘जाहिल’ बना रहे हैं अब जिनमें संवाद की शालीनता न हो उन्हें और क्या कहा जाए, फिर, डिग्री चाहे कोई कितनी भी क्यों न जमा कर ले
    जब महत्वपूर्ण विषयों के प्रस्तुति की प्रक्रिया ही गलत हो तो विषय स्वतः ही अपना महत्व खो देता है , संवाद के सन्दर्भ में शालीनता का यही महत्व है। किसी भी क्रिया की शैली उसके निष्कर्ष की दृष्टि से उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितना महत्व प्रयास के विषय का होता है

एक सभ्य, शिक्षित और स्वतंत्र समाज में सभी को सामान रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिलनी ही चाहिए और इसीलिए संविधान भारत की जनता को विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है; पर स्वतंत्रता और स्वच्छंदता (right to act, speak,or think as one wants. ) में अन्तर होंना चाहिए व् हम परिस्थितियों के प्रति अपनी कम समझ (अपरिपक्वता) को ही सार्वजानिक रूप से प्रमाणित करेंगे।

*~~अमित पटले~~*

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.