“सभ्य” समाज का तमाशा !

Posted by arvind
February 8, 2017

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परंपराओं और रीति-रिवाजों के नाम पर समाज ने बहुत सारी ऐसी प्रथाएँ पाल रखी हैं जिसके चलते समाज के कुछ खास वर्गों को अब भी शोषण का शिकार होना पड़ता है । इन्हीं में से एक है- “आॅर्केष्ट्रा”…जिसे अमूमन सांस्कृतिक कार्यक्रम का नाम देकर इसके पीछे होने वाले यौन हिंसा और अश्लीलता को छिपा दिया जाता है ।

आॅर्केष्ट्रा के कुछ पहलुओं को प्रस्तुत करता ये लेख….जिसमें इसके कुछ ऐसे हकीकतों को सामने लाने की कोशिश की है जिन्हें समाज रात का नशा उतरने के साथ हीं भूल जाता है…ये बिल्कुल वैसा ही है जैसा कोई कातिल रात को शिकार करने के बाद दिन में सभ्य दिखने की भरसक कोशिश करता है ।

सपाट फर्श से तीन फुट उँचा फर्श बनाया गया है ताकि लोगों को ‘देखने’ में कोई परेशानी ना हो और उस पर बहुत कम कपड़ो में चीखते आॅर्केष्ट्रा के बीच वह लड़की चेहरे पर बनावटी हँसी लिए नाच रही थी।
बीच-बीच में कोई 10, 20 या 50 का नोट दिखाता था और लड़की उस उँचे गोल फर्श से नीचे उतर लहराता हुआ नोट पकड़ने के लिए लपक जाती थी।
कोई नोट उसके वक्ष में ठूँस देता था , कोई होंठो से दबाकर होंठो से ही लेने का आग्रह करता था और नोट बड़ा हो तो लड़की 1-2 सेकेंड के लिए गोद में भी बैठ जाती थी ।
‘उत्तेजना’ वहाँ शर्म पर भारी थी और वीभत्स मुस्कुराहटों के उस बनैले परिदृश्य में सहानुभूति या संवेदना का एक भी कतरा शेष ना बचा था । पैसे के दावानल में लड़की सूखे बाँस-सी जल रही थी ।

समागम के सबसे अग्रिम पंक्ति में समाज के सबसे ‘सम्मानित’ , ‘सभ्य’ और ‘संस्कारी’ लोग बैठे थे…जो अपने घर की औरतों की ओर उठने वाले हर पराये नज़र को नोंच लेने का ज़ज्बा रखते थे । अगर इनकी बातें मान ली जाए तो ये लोग तो इतने सभ्य और संस्कारी हैं कि शराफ़त के घर का खर्चा इन्हीं के दिए हुए चंदों से चलता है….!
शायद सभ्य समाज का तमाशा चल रहा था वहाँ । कम कपड़ा आर्केष्ट्रा वाली ने पहना था नंगा समाज हो रहा था !
कुछ साल पहले सुना था कि सरकार इसपर रोक लगाने वाली है लेकिन अबतक कुछ पहल नहीं हुआ ।

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