सशक्तिकरण,सत्ता,और औरत

Posted by Sparsh Choudhary
February 11, 2017

Self-Published

14 साल की और 21 साल की मेरी दो बहनें आई पीएस और आई ए एस बनना चाहती हैं .

सुनकर ही अच्छा लगेगा .लडकियां जब सपने देखती हैं और उन्हें पूरा करने को खुद की और दुनिया की कमज़ोरियों से जीतती हैं तो लगता है अच्छा .बेहतर और सुखद. खासकर राजनीति ,सत्ता और प्रशासन के गलियारे और औरतें .वहां जहाँ औरतें फिलहाल ग्रास रूट्स पर ही पंचायती राज के बदौलत सशक्त हो रही हैं .पर जहां राजनीति के ऊपरी दर्ज़ों की बात आती है . चीज़ें पेचीदा हो जाती हैं. उन्हें ऊपर लाने के लिए आधिकारिक बिल जो वाद विवाद से कभी उबर ही नही पाता. और रही सही ज़्यादातर समाज और मानसिकता के बीच फँसी रहती हैं .

खैर सवाल यह है कि ये क्यों बनना चाहती हैं .पर इनसे बढ़कर ये दोनों कितनी बहादुर और कोमल पर मज़बूत बहनें हैं. इन दोनों का एक दूसरे से कोई लेना देना नही है .ये एक दोनों को नही जानती पर इनके सपने एक दूसरे को बखूबी जानते हैं . तक़लीफ़ , ट्रॉमा और परेशानी और बुलंदशहर दुष्कर्म की शिकार एक बहन और एक जिसे तीन साल बाद फिर से उस भयावहता का सामना करना पड़ा . पर जो नही बदला वो ये कि ये पढ़ना चाहती हैं और आला प्रशासन की कमान संभालना चाहती हैं . एक जो एक दुष्कर्म के बाद वापस कॉलेज जाती है अपनी पढाई पूरी करने .मैथ्स और फैशन डिज़ाइनिंग की शौक़ीन है .दूसरी पेंटिंग करती है. और सपने पालती है भविष्य के ..

कितना खूबसूरत है ये सब . ये मज़बूती .ये ताक़त और ये ज़ुर्रत .ज़ुर्रत उन नापाकों के सामने सर उठाकर दुनिया जीतने की . सिर्फ जेंडर और सैक्स के फ़र्क़ से ( सामजिक और जैविक अंतरों ) तमाम मुश्किलें आती हैं .इनके लिए तो खौफनाक थीं . सुरक्षा तो सिर्फ अब इनसे बंधके रह गयी है . पर चाहे जो हो ,ये बुरे लोग उनके कोंपल इरादों को तोड़ नही पाये .यहाँ तक कि इनके माँ बाप को भी नही . जानते हैं क्यों .क्योंकि इनके लिए उम्मीद की किरण ताक़त से आती है और ताक़त जंग लगी बाड़ें फांदके छलांग लगाने से महसूस होती है .

क्यूंकि शुरुआत ऐसी ही लड़कियां करेंगीं . या कहूँ तो सभी लड़कियों को करनी होगी. अपने से शुरू हो दुनिया में फ़ैल जाने की . एक वायरस की तरह. ऐसा जो सामंतवाद , बेमेल ,ऊँच नीच , दलित , उच्च हिन्दू ,निम्न हिन्दू ,मुस्लिम , गरीब,अमीर, मज़दूर आदि की खाइयों को मिटाने के लिए काम आएगा .

बुन्देलखंड की औरतें ज़मीनी पत्रकारिता की बिगुल बजाती हैं कहीं तो एक एसिड की शिकार लड़की लिव इन में रहती है ,माँ बनती है और फैशन की दुनिया में घुसती है . और तीन लडकियां फाइटर प्लेन्स उड़ाने की शुरुआत करतो हैं .और मेरी ये दोनों बहनें प्रशासन और पुलिस संभालना चाहती हैं .

क्योंकि सशक्तिकरण ज़मीनी होता है .ज़िद्दी ,विद्रोही और महत्वकांक्षी . एक के सशक्त हो जाने से स्त्री सशक्त नही कहलाती . इसीलिए जब ज़मीनी समस्याओं से रूबरू होने वाली लडकियां और आतंक ,डर और दमन की शिकार लडकियां सीधे आसमान के ख्वाब देखेंगी और उनमें रंग भरेंगी तो रूढ़िवादी , जातिवाद , वैचारिक पूंजीवाद , विकृत मानसिकता वाले समाज के लोग और उनके तख़्त डोलेंगे .

चरमराती उन तख्तों से दीमकों के बाहर झुण्ड नज़र आएंगे . खूब हल्ला होगा . खूब रोकने की कोशिशें पर ये शांत विद्रोह कभी तो इस संक्रमण काल से निकल कर एक नए वक़्त की और बढ़ेगा क्यूँकि ये हर समय के साथ होता है . 1920 में हुआ.1970 में हुआ और अब फिर ज़रुरत और ज़ुर्रत दोनों नज़र आते हैं .

मेरे जैसी लड़कियों के लिए सौभाग्य से यह कह जाना आसान है पर मेरी हीरोइन तो ये दोनों लडकियां हैं क्योंकि ये सपने देखना छोड़ना नही चाहती . हमारी छोटी मोटी समस्याओं और इनकी ज़िन्दगी की जंग . इसीलिए ये और इनके जैसी लडकियां और इनकी कहानियाँ सशक्त शब्द के अर्थ बता जाती हैं.

इन दोनों के नाम मेरी दीवाल पर लगाए जाएंगे मैं और मेरे जैसी तमाम लडकियां जब भी कभी उत्साहहीन महसूस करें ,इन दो नायिकाओं के नाम और कहानी याद कर लें .आप खुद को अपनी समस्या से उबार पाएंगी .

क्योंकि कलाम साहब की सीख ये इस क़दर निभाएंगी , मिसाल है . सपने देखो .खूब ऊंचे .देखोगे तब तो पूरा करोगे .पर ये लडकियां और औरतें ऐसे चरितार्थ करेंगीं . ये सामने है हमारे .

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