डिंको जो तुम क्रिकेटर होते तो हम तुमको भी जानते और तुम्हारे कैंसर को भी

Posted by Suraz Ibrahimovic in Hindi, My Story, Sports
February 4, 2017

18 दिसंबर 1998, शुक्रवार की वो सुबह मेरे शहर क्या पूरे राज्य में रहने वाले लोगों के लिए और शायद 90% हिंदुस्तानियों के लिए भी रोज़ जैसी ही थी। मैं सुबह पिताजी की डांट खाकर उठा और रोज़ की तरह घर से थोड़ी दूर पर मौजूद उनकी क्लीनिक का शुभारंभ करने पहुंच गया।

आज स्कूल जाने का मन नहीं था क्योंकि अंग्रेजी पढ़ाने वाले अशोक सर की रोज वाली धुआंधार बैटिंग और उसे चकमा देकर किसी तरह बच निकलने वाली मेरी मीडियम पेस स्विंग बॉलिंग आज काम ना आने वाली थी। एक दिन पहले ही उन्होंने साफ बोल दिया था कि कल क्लास की शुरुआत मॉनिटर की क्लास लगने से होगी।

मैं अलसाया सा पापा की चेयर पर पड़ा था कि पत्रकार भइया (अपने हॉकर को हम आज भी यही कहते हैं) अखबार फेंककर गए। दैनिक जागरण, हमेशा से क्लीनिक पर यही अखबार आता था। मैंने पेपर उठाया और जैसा कि आज भी आदत कायम है, पीछे की तरफ से सीधे स्पोर्ट्स पेज पर गया। उस पेज पर एक फोटो ने मेरा ध्यान खींचा जिसमें एक दुबला-पतला बॉक्सर अपने पूरे बॉक्सिंग गियर पहने बॉक्सिंग रिंग की रस्सियों पर हाथ रख थोड़ा झुककर खड़ा था। नीचे कैप्शन लिखा था, ’19 साल के डिंको ने जीता एशियन गेम्स का गोल्ड मेडल’ साथ में स्टोरी भी थी।

इस खबर ने पहली बार मेरी क्रिकेट के दीवानगी में खलल डाला और मुझे बॉक्सिंग अच्छी लगने लगी। इंटरनेट जैसा तो कुछ था नहीं इसलिए मैं डिंको सिंह की खबर वाले अखबारों की कटिंग्स इकट्ठा करने लगा। मैंने सोचा भी कि अगर क्रिकेटर ना बन पाया तो बॉक्सिंग करूंगा और डिंको सिंह जैसा बनूंगा। वक्त बीता और डिंको को काफी कम उम्र में ना चाहते हुए भी बॉक्सिंग ग्लव्स टांगने पड़े। फिर डिंको गुमनामी में और मैं क्रिकेट, पढ़ाई और पापा की पिटाई के बीच खो गया।

सालों बाद जब पापा ने मुझे क्रिकेटर बनने से और मैंने उन्हें मुझे डॉक्टर बनाने से सफलतापूर्वक रोक दिया, मैं दिल्ली आया। एक दिन वीकिपीडिया पर डिंको के बारे में पढ़ा कि वो इंडियन नेवी में कोच हो गए हैं। डिंको से पुराने जुड़ाव के चलते यह खबर काफी अच्छी लगी।

दिन बीत रहे थे और दिल के किसी कोने में होने के बावजूद डिंको मेरे लिए लगभग अंजान ही थे कि हाल ही में अखबारों में खबरें आईं कि डिंको को लिवर कैंसर है। इलाज में घर बिक गया और वो दिल्ली में हैं जहां एम्स ने उन्हें भर्ती करने से मना कर दिया है।

काफी गरीब परिवार में पैदा हुए डिंको अनाथालय में बड़े हुए थे। इतना लड़ने के बाद उन्होंने 1998 में बैंकॉक में हुए 13वें एशियन गेम्स के सेमीफाइनल में वर्ल्ड नंबर 3 को धोया। डिंको ने वर्ल्ड नंबर 5 को फाइनल के चौथे राउंड में नॉकआउट कर 54KG का गोल्ड मेडल जीता। जबकि डिंको को 51KG से 54KG में शिफ्ट हुए कुछ ही महीने हुए थे। इस टूर्नामेंट से पहले डिंको ने किंग्स कप भी जीता था। यहां उन्हें उस मीट का बेस्ट बॉक्सर भी घोषित किया गया था।

देश को इतना कुछ देने के बाद आज कैंसर से पीड़ित डिंको बेघर होकर दिल्ली में अपने एक दोस्त के यहां रह रहे हैं। सरकार और नेवी दोनों को अपने इस चैंपियन की कोई परवाह नहीं है। भारत के लोगों की बात ही क्या करें, वो तो अभी इंग्लैंड के क्लीन स्वीप की खुशी और धोनी-विराट की सामूहिक कैप्टेंसी का जश्न मना रहे हैं। 15 साल के क्रिकेटर का भी रेकॉर्ड याद रखने और उसे महान बना देने वाला मेरा ये देश बाकी खेलों के महान खिलाड़ियों के साथ जो सलूक करता है उसे देखकर मुझे यह कहने में कोई अफसोस नहीं कि हम ओलिंपिक्स मेडल डिजर्व ही नहीं करते।

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