सरदार करतार सिंह, जिनसे भगत सिंह को मिली थी देशभक्ति की प्रेरणा

भगत सिंह, इस नाम से ही जोश और क्रांति हमारे ज़हन में भर आती है। लेकिन भगत सिंह को देशभक्ति की प्रेरणा कहां से मिली। वो नाम है सरदार करतार सिंह सराभा। करतार सिंह सराभा को मात्र 19 साल की उम्र में लाहौर जेल में अंग्रेज सरकार द्वारा फांसी की सज़ा दी गयी थी। करतार सिंह के बलिदान ने ना सिर्फ भगत सिंह बल्कि उत्तर भारत में हज़ारों की संख्या में क्रांतिकारियों को उद्देश्य दिया था।

लुधियाना से कुछ किलोमीटर की दूरी पर सराभा नाम के गांव में, इनका जन्म 24 मई 1896 को हुआ था। अभी ये अपने बचपन की उम्र में ही थे जब इनके इनके माता-पिता श्री साहिब कौर और मंगल सिंह, का देहांत हो गया। इसके पश्चात इनके दादा जी ने इनका पालन पोषण किया था।

अपने जीवन की शुरुआती शिक्षा पूरी करने के पश्चात, पहले इन्हें अपने रिश्तेदार के यहां उड़ीसा भेजा गया और बाद में इन्हें आगे की शिक्षा के लिये, इनके दादा जी ने सैन फ्रांसिस्को, अमेरिका भेज दिया था। सैन फ्रांसिस्को में करतार सिंह को इमिग्रेशन डिपार्टमेंट के अपमान का सामना करना पड़ा। कहते हैं उनसे ऐसे सवाल भी पूछे गएं जिसके लिये एक 16 साल का लड़का तैयार नहीं था। इस  घटना ने, करतार सिंह को सोचने पर मजबूर कर दिया कि इस तरह का व्यवहार उनके साथ और बाकी के भारतीयों के साथ क्यों हो रहा हैं ? किसी ने इसका जवाब दिया “क्योंकी भारत देश और भारतीय कौम, गुलाम है।”

ये जवाब करतार सिंह के ज़हन में आसानी से नहीं उतरा। इसी दौरान करतार सिंह ने फलों को उठाने का काम भी किया, जहां फिर करतार सिंह के साथ भेदभाव हुआ और उन्हें वहां के मज़दूरों से कम पैसे दिये गये। ये सारी घटनाएं, एक-एक कर करतार सिंह को भीतर ही भीतर सुलगा रही थी।

भारत की आज़ादी के लिये 1913 में गदर आंदोलन की शुरुआत हुई। ये अपनी तरह का पहला आंदोलन था जिसकी नींव विदेश में रखी गई थी। यहां, भारतीय विद्यार्थी इस आंदोलन की सभा में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे। गदर पार्टी का एक ही मकसद था किसी भी तरह से भारत की आज़ादी। यहां इनका एक ही नारा था “देश की आज़ादी के लिये, हर तरह से आहूत होना”।

यहां, गदर पार्टी ने पहले अपना प्रचार पंजाबी भाषा में लिखकर किया। बाद में, इस प्रचार को हर भारतीय भाषा में लिखने के लिए, करतार सिंह को ज़िम्मेदारी सौंपी गई। अब इस पार्टी का पत्र पंजाबी, हिंदी, उर्दू, बंगाली, गुजराती और पुश्तों में छपने लगे, जिन्हें दुनिया के कोने-कोने में बैठे भारतीयों तक पहुंचाया गया। गदर पार्टी इतनी बड़ी बन गई थी कि इसकी खबर इंग्लिश के अखबारों में छपनी शुरू हो गई। कुछ सरकारी जासूस भी इस पार्टी में शामिल हो रहे थे।

1914, में प्रथम विश्वयुद्ध में, इंग्लैंड भी शामिल हो गया था जिसके चलते ब्रिटिश सेना और सरकारी सिस्टम खुद को इस युद्ध में बचाने में लगा हुआ था। इसी मौके का फायदा उठाकर, गदर पार्टी ने अपने पत्र में अंग्रेज के खिलाफ लड़ाई का आह्वान कर दिया। 5 अगस्त 1914 को एक पत्र में इसकी जानकारी पार्टी के हर सदस्य को दी गई। 15 सितंबर 1914 को, करतार सिंह अपने साथी सत्येन सेन और विष्णु गणेश पिंगले के साथ अमेरिका छोड़कर भारत रवाना हुए।

करतार कोलंबो के रास्ते कलकत्ता पहुंचे। एक अनुमान के मुताबिक कुछ 20000 भारतीय, विदेशों से इस लड़ाई में हिस्सा लेने के लिये भारत आए थे। करतार सिंह ने पंजाब के अंदर इस विद्रोह की कमान संभाली। इन्होंने विष्णु गणेश पिंगले के साथ भारत के अनेक शहरों में जाकर गदरी पार्टी का प्रचार किया और एक ज़मीन को तैयार किया ताकि ब्रिटिश सेना में भारतीय मूल के सैनिक इनके साथ जुड़ सकें। इसी बीच इन्होंने अपने लुधियाना ज़िले में एक छोटी सी फैक्टरी लगाई जहां छोटे हथियार बनाए जाते थे।

एक मीटिंग में ये तय हुआ कि 21 फरवरी 1915 को मियान मीर और फिरोज़पुर की सैनिक छावनी पर हमला बोला जाएगा। यहां इसकी पूरी तैयारी चल रही थी लेकिन एक सरकारी मुखबिर ने जिसका नाम किरपाल सिंह बताया जाता है, इस बात की जानकारी सरकार को दे दी। जिसके बाद  19 फरवरी 1915 को क्रांतिकारी गिरफ्तार किये गये। यहां करतार सिंह सराभा बचने में कामयाब रहें।

हालात को देखकर कुछ दिनों के लिए देश छोड़ने का प्लान बनाया गया। सरदार करतार सिंह सराभा को काबुल में मिलने के लिए कहा गया। लेकिन, काबुल जाने की बजाय करतार सिंह अपने साथियों को छुड़वाने की फिराक में थे। इसी क्रम में करतार गिरफ्तार हो गए। इन्हें बाकी आंदोलनकारियों के साथ लाहौर जेल भेज दिया गया।

यहां, इन पर मुकदमा चला जहां सरकार के खिलाफ साज़िश करने के आरोप में, इन्हें सज़ा-ए-मौत सुनाया गया। 16-नवंबर-1915 को लाहौर की जेल में सरदार करतार सिंह सबसे बड़े शौर्य को पा गए।

सरदार करतार सिंह सराभा 19 साल की उम्र में फांसी पर झूम  गये थे। गदरी पार्टी या आंदोलन कामयाब तो ना हो सका, लेकिन किसे पता था कि सरदार करतार सिंह सराभा, भगत सिंह के प्रेरणा स्रोत बनकर इसी लाहौर की जेल में 23 मार्च 1931 को दुबारा क्रांति की लहर पैदा कर जाएंगे।

एक बात का जिक्र ज़रूर करना चाहूंगा कि 2015 में पूरे पंजाब में सराभा की फांसी की सज़ा की शताब्दी मनाई गयी थी, लेकिन इसके ज़िक्र से हमारा मीडिया दूर रहा। ये एक उदाहरण है कि किस तरह हम अपने क्रांतिकारियों को भूल गये और इसके साथ-साथ उनके बलिदान और आज़ादी की लड़ाई को भी भूलते जा रहे हैं। जो कौम या देश अपना इतिहास भूल जाता है वहां लोकतंत्र कामयाब नहीं हो सकता।

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