क्वीन ऑफ़ कात्वे: यह फिल्म देखकर आप जीवन में हारना भूल जाएंगे

Posted by ANANYA PANDEY in Hindi, Media
February 7, 2017

शतरंज एक ऐसा खेल है जो लोगों में आत्मविश्वास, अनुशासन और रचनात्मक दृष्टि को बढ़ावा देता है। इस खेल को शौकिया तौर पर भी खेला जाता है और पेशे के तौर पर भी। पर युगांडा की झुग्गियों में रह रही फिओना मुतेसी के लिए शतरंज सिर्फ इतना ही नहीं था। यह खेल उनके लिए गरीबी से निकलने का सबसे बड़ा रास्ता बन चुका था। समाज के जिस तबके से वो आती हैं वहां पर कोई सपने देखना तो दूर उसके बारे में सोचता भी नहीं है। इसके बावजूद उन्होंने सपना देखा, एक चेस ग्रांडमास्टर बनने का। उनके इसी संघर्ष पर 2012 में टिम क्रोथर्स ने एक किताब लिखी और 2016 में इस किताब पर एक फिल्म भी बनी।

इस फिल्म को नाम दिया गया क्वीन ऑफ़ कात्वे और इसे सितम्बर 2016 में रिलीज़ किया गया। फिल्म का निर्देशन किया मीरा नायर ने और स्क्रीनप्ले लिखा है विलियम व्हीलर ने। फिल्म में फिओना मुतेसी के संघर्ष और उनके कोच रॉबर्ट कतेंदे द्वारा दी गयी ट्रेनिंग को बड़ी ही खूबसूरती और सच्चाई से दिखाया गया है।

फिल्म की कास्टिंग भी बहुत ख़ास रही क्यूंकि मुख्य भूमिका निभा रही मदीना नाल्वंगा भी कमोबेश समाज के उसी तबके से हैं, जहां से फिओना हैं। ऑस्कर विजेता लुपिता नोयोंगो ने फिओना की माँ का किरदार निभाया है और डेविड ओयेलोवो फिओना के कोच बने हैं। इन दो मंझे हुए कलाकारों के साथ मदीना बड़ी ही सहज नज़र आयी हैं, जो फिल्म का एक बड़ा प्लस पॉइंट है। अहम बात यह है कि इन दो बड़े कलाकारों के सामने कहीं पर भी फिओना का किरदार फीका नहीं पड़ा।

फिल्म गति थोड़ी धीमी है, शायद स्क्रिप्ट पर कुछ और काम किया जा सकता था। पर ख़ास बात यह है कि समाज में मौजूद भेदभाव को बड़े अच्छे से यह सामने लेकर आती है। मसलन पहली दफा जब फिओना के कोच, चेस टूर्नामेंट के अथॉरिटी से बात करने जाते हैं तो उन्हें कहा जाता है कि यह टूर्नामेंट देश के सबसे अच्छे स्कूल में है और वहां हम कोई बीमारी नहीं ले जा सकते।

दूसरा जब फिओना अपना पहला मैच खेल रही होती है तो रिवायती तौर पर विपक्षी खिलाड़ी से हाथ मिलाती हैं। फिल्म में दिखाया गया है कि हाथ मिलाने के बाद विपक्षी खिलाड़ी अपना हाथ टेबल क्लॉथ से पोछता है।

इस तरह के दृश्य फिल्म पर निर्देशन की पकड़ और उसके विज़न को दिखाते हैं और साथ ही फिल्म को वास्तविकता के और करीब ले जाते हैं। इस फिल्म ने खिलाड़ी और कोच के रिश्ते को भी बखूबी दिखाया गया है।

इस फिल्म में खेल और असल ज़िंदगी के बीच के तालमेल का बेहतरीन चित्रण किया गया है। मसलन सबसे पहली दफा, जब कुछ बच्चे फिओना को छेड़ रहे होते हैं और वो डर कर नहीं भागती, तभी से कोच उसे “फाइटर” का दर्जा दे देते हैं। उसके बाद, शतरंज सीखते वक्त फिओना को क्वीनिंग (जब प्यादा आखरी खाने पर पहुँचने के बाद रानी में बदल जाता है) सबसे ज़्यादा पसंद थी क्यूंकि यह चाल चेस बोर्ड को पार करके की जाती है। इसी तरह जब फिओना के कोच उसे सेफ स्पेस (जब कोई सभी तरह से फंस जाए और अपने लिए एक सुरक्षित जगह तलाश ले) की बात समझा रहे होते हैं तो वह कुछ असल ज़िंदगी के उदाहरण देते हैं, ताकि खिलाड़ी उसे अच्छी तरह समझ पाएं।

यह फिल्म, विषम परिस्थितियों में भी हार ना मानने का जीवट सन्देश देती है। फिओना के कोच उसे दो गूढ़ मंत्र सिखाते हैं। पहला हारता वही है जो हार मान लेता है और दूसरा अपने आप पर यकीन रहना सबसे जरूरी है। यह खेल पर बनी कुछ उन चुनिन्दा फिल्मों में से है, जिसे संघर्ष के दौर में हर खिलाड़ी को देखना चाहिये।

“कभी-कभी हम उस जगह पर होते हैं जो हमारी नहीं होती, हमारी जगह वही है जिसे हम मानते हैं”– चेस टीचर रॉबर्ट कतेंदे

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