सरकारें ‘टाइड’ से धुली होती हैं उनपे कभी दाग नहीं लगा करते

Posted by Tejasvi Manjerakar in Hindi, Politics, Society
February 22, 2017

2000 से ज़्यादा आरोपी, 35 केस, 634 मेडिको बाहर, 9 भरतियों-परीक्षाओं में घोटाला, 27 से ज्यादा लाशें, लेकिन सरकार को खरोंच तक नहीं!  क्यों? क्या आपने पहले किसी डॉक्टर से सुना है की वह प्री-व्यापम या पोस्ट-व्यापम डॉक्टर है! बेशक नहीं ही सुना होगा, अत्यंत गंभीर मज़ाक है।

जी हां, मैं बात कर रहा हूं “दी व्यापम” घोटाले की, क्यूंकि सरकारी ताकतों और तत्वों के गठजोड़ से रचा भारतीय इतिहास का महाघोटाला जो समाज में रहकर समाज के लोगों के खिलाफ कुनियोजित षड्यंत्र था। एक साथ 634 मेडिकल छात्रों की MBBS की डिग्री और प्रवेश को रद्द कर दिया गया। इनमें से कई तो डॉक्टर भी बन चुके थे और बहुत सारे डॉक्टर की नौकरी भी पा चुके थे। यह घटना इतनी बड़ी थी कि सुप्रीम कोर्ट ने जब इसका फैसला सुनाया, तब बचाव के लिए लड़ रहे 139 मेडिकल स्टूडेंट्स के पास अपने बचाव में कोई तर्क तक ना था।

यहां यह जानना बेहद ज़रूरी है कि न्यायालय ने अपने फैसले में क्या कहा। पिछले वर्ष मई में सुप्रीम कोर्ट की डिवीज़न बेंच के फैसले में दोनों जजों के अलग-अलग विचारों में से जस्टिस चेल्मेश्वर के फैसले को आगे बढ़ाया गया। यहां चेल्मेश्वर ने कहा था कि छात्रों ने नॉलेज प्राप्त कर लिया है, इसीलिए इनकी ट्रेनिंग का फायदा समाज को मिलना चाहिए। वे 5 वर्ष तक समाज के लिए काम करें। उन्होंने फौज में सेवाएं देने की भी बात कही।

वहीं जस्टिस सप्रे ने कहा था कि गलत तरीकों से ली गयी परीक्षा रद्द होगी, इसीलिए परीक्षार्थी भी स्वतः ही रद्द माने जाएंगे। अब क्यूंकि मामला सामूहिक रूप से धोखाधड़ी से प्रवेश पाने का है, इसीलिए टेक्निकल कारणों से “बराबरी का न्यायिक सिद्धांत” (equitable relief) लागू नहीं हो सकता। इस लिहाज़ से मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 634 छात्रों की परीक्षा रद्द करके ठीक किया और समग्र दलीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कड़े और स्पष्ट उत्तर दिये।

सुप्रीम कोर्ट ने “राष्ट्रीय चरित्र” की बात कठोरता से उठाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति विशेष या समूह को लाभ पहुंचाना न्याय नहीं होगा और कई ठोस और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भरे न्यायिक उदाहरण और बचाव के तर्कों को रद्द कर दिया। लेकिन सबसे बड़े सवाल का जवाब अब भी नहीं मिला है कि आखिर व्यापम घोटाला किसने किया?

2000 से अधिक आरोपी, न जाने कितने अभियुक्त और सैकड़ों फरार। पुलिस, सरकार और संबंधितों को भेजी शिकायतें तो हज़ारो में होंगी। किन्तु सबसे भयंकर 27 लोगों की मौत का होना है, आखिर कौन है इन रहस्यमयी मौतों के पीछे? व्यापम जांच अब तक कुल 27 लाशों को देख चुकी है और इन घटनाओं के बाद भी मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार को कोई खरोंच तक नहीं! क्यों? आखिर कौन है इनके लिए जिम्मेदार? क्या शिवराज हैं या उनकी छात्रछाया में कोई और?

यहां देखने वाली बात यह भी है कि 2008-2012 के प्रवेशों के बीच 634 मेडिको बर्खास्त हुए- उस समय शिवराज ही चिकित्सा-शिक्षा मंत्री थे। शिवराज कहते हैं उन्हें श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने इस घोटाले को उजागर किया। शिवराज के मंत्रीमंडल में रह चुके, CMO ऑफिस और निजी सचिवालय में उनसे निकट रहे कई रसूखदार लोग, माइनिंग घोटाले में शामिल रहे सरकार के करीबी कारोबारी, नौकरशाह, छोटे-बड़े अफसर, डॉक्टर, पुलिस और कई बड़े आई.टी. एक्सपर्ट तक सरकार के प्रतिनिधि या कृपापात्र बनकर व्यापम की 9 से अधिक परीक्षाओं में भर्तियों के भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर चुके हैं।

अभी तो और ना जाने क्या क्या भेद खुलना बाकी है, किन्तु यहां राज्य में एक पत्ता तक नहीं हिला। यहां तो घोटाला 2G, CWG, ARMSGATE, से भी कहीं अधिक बढकर “व्यापम” महाघोटाला है। बल्कि उनसे कई बड़ा क्यूंकि उन घोटालो में लाशें कही नहीं थी और ना ही डॉक्टरी जैसे पवित्र पेशे में घुसपैठ हुई थी।

यह घोटाला कई लोगों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है और सम्बन्धित व्यक्तियों को दोषी करार देने का समय आ गया है। इस महाघोटाले ने लाखो छात्रों और उनके परिवारो को कुंठा, नैराश्य, रोष और क्षोभ में डुबो दिया जो आज तक उभर नहीं पाए हैं और ना जाने कितने समय से कसूरवार लोगों को सजा पाते देखना चाहते हैं।

मेरे विचार में केंद्र की मोदी सरकार जो 2014 से अच्छे दिन लाने का वादा कर रही है और शिवराज सिंह जो अब तक अपने आप को निर्दोष बताते रहे हैं, को खुद ही व्यापम महाघोटाले पर एक समग्र “श्वेत पत्र” लाना चाहिये। या फिर सुप्रीम कोर्ट ऐसा निर्देश दे, जो संसद और विधान पटल पर रखा जाए। सिर्फ मेडिकल प्रवेश ही नहीं वरन सभी परीक्षाओं जैसे पुलिस सब-इंस्पेक्टर, कांस्टेबल, डेरी सप्लाई, अनुबंधित शिक्षक आदि की विस्तार से जांच होनी ही चाहिए। यह सरकार का सामाजिक जिम्मेदारी है कि वह जनता को इन सब के बारे में बताये। अब देखना यह है कि घोटाले की जांच सरकार करवाती है या यह काम भी सुप्रीम कोर्ट ही करेगा।

फोटो आभार: फेसबुक और ट्विटर 

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