मेरे संघर्ष का नतीजा है ‘लाइफ ऑफ़ एन आउटकास्ट’

Posted by Pawan K Shrivastava in Hindi, Media
March 12, 2017

Self-Published

नया पता को रिलीज़ हुए लगभग ढाई साल हो चुके हैं। इन ढाई सालों से लगातार मैं अपनी कहानी कहने की कोशिश में लगा हुआ था। 2 साल पहले मैंने एक कहानी हाशिये के लोग #HKL पर काम करना शुरू किया था, रिसर्च और स्क्रीन प्ले लिखने के बाद एक प्रोड्यूसर भी मिल गया था। टीम के साथ लोकेशन भी फाईनल हो गई थी और बुंदेलखंड में शूट की पूरी तैयारी और कास्टिंग भी हो गयी थी।

हमने एक प्रेस कांफ्रेंस भी की, लेकिन ऐन वक्त पर प्रोड्यूसर ने अपना हाथ पीछे खींच लिया और प्रोजेक्ट रुक गया। मेरे लिए ये बहुत मुश्किल का समय था, लोगों को जवाब देना मुश्किल हो रहा था। कुछ समझ में  नहीं आता था कि अब कहां से और कैसे फिर से शुरुआत की जाए, पूरी टीम का मनोबल जैसे टूट सा गया।

बहुत ज़्यादा मानसिक तनाव के चलते मैं दस दिनों के लिए विपासना चला गया। वहां से आने के बाद मेरे पास अब दो नई कहानियां थी। मैंने इनमे से एक पर काम करना शुरू किया। उसका एक पाईलट विडियो भी शूट कर लिया, सोचा था क्राउड फंडिंग से बनाऊंगा। लेकिन बीच में एक प्रोड्यूसर ने इंटरेस्ट दिखाया, बहुत सारी मीटिंग्स के बाद वो राज़ी भी हो गया।

हमने फिल्म पर काम करना शुरू कर दिया और बंबई चले आए। काम शुरू हो चुका था जिसके शुरूआती पैसे प्रोड्यूसर ने ही दिये थे। लेकिन जब फिल्म शूट करने का समय आया तो अचानक प्रोड्यूसर टालने लगा। कुछ समय तक हमने इंतज़ार किया लेकिन जब उसकी बातों से लगने लगा कि वो अब पैसे नहीं देगा तो हम निराश हो कर बंबई से वापस आ गए।

हमारे साथ ऐसा दूसरी बार हुआ था। लेकिन इस पूरी यात्रा में कुछ दोस्त हमेशा साथ रहे और उनका विश्वास कभी कम नहीं हुआ। 2-3 महीने ऐसे ही गुज़र गए। कुछ लोगों ने सलाह भी दी कि ऐसी कहानियों पर काम करो जिसमें मार्केट की सम्भावना ज़्यादा हो लेकिन ये बात मेरी समझ से बाहर थी।

फिर एक दिन लगा कि अब फिल्म बनाना ही एक मात्र विकल्प है। मैंने विपासना में सोची हुई दूसरी कहानी को लेकर फिल्म बनाने की ठान ली। इस कहानी को कम बजट में बनाना मुमकिन था।

मैंने कुछ दोस्तों से बात की और वो सब मदद के लिए तैयार थे। इस बार मुझे हर हाल में फिल्म बनानी ही थी। मुझे लीड रोल के लिए एक अच्छे एक्टर की तलाश थी। फिल्मिस्तान और पान सिंह तोमर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले, फिल्म इंस्टिट्यूट पुणे (FTII) के रवि भूषण भारतीय का लुक मेरी फिल्म के लिए फिट था। मैंने सबसे पहले उन्ही से बात की। उनको मेरी स्तिथि के बारे में सबकुछ पता था।

थोड़ा समय लेने के बाद उन्होंने हां कह दिया और ये मेरे लिए एक बड़ी सफलता थी। शायद उन्हें मेरे काम पर भरोसा है, इसलिए इतने कम समय में वो शूट करने के लिए तैयार हो गए। एक बहुत ही छोटी सी टीम थी हमारी। विकास सिन्हा जो प्रसाद फिल्म इंस्टिट्यूट, चेन्नई से पढ़ चुके हैं और बहुत सारी छोटी बड़ी फिल्मों में कैमरा डिपार्टमेंट में काम कर चुके हैं वो काफी प्रयास के बाद सिनेमाटोग्राफी करने के लिए तैयार हो गए। बाकी कास्टिंग भी हो गयी और सबने आगे आकर मुझमे विश्वास दिखाया।

इन ढाई सालों में बुंदेलखंड जाने से लेकर दिल्ली में बैठ कर दुखी होने तक या बंबई में फिल्म पर काम करना में और वहां से निराश लौट आने में और फिर पूरी ऊर्जा से इस फिल्म के लिए संसाधन जुटाने में, मेरे दोस्त प्रवीण ने हमेशा साथ दिया।

कैमरा-लेंस और बाकी तकनीकी उपकरणों के लिए हमने कुछ पैसे का इंतज़ाम किया और शूट के लिए निकल पड़े। अब जब फिल्म की शूटिंग पूरी हो चुकी है तो सोचने पर लगता है की ये सब एक नशा और जिद्द ही थी जिसकी बदौलत मैं ये कर पाया।

मुझे मालूम है कि इस फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाना आसान नहीं होगा। अभी काफी कुछ बाकी है, लेकिन इनता तो तय है कि अब इस कहानी को आपके पास पहुंचने से कोइ नहीं रोक सकता। बस अब पोस्ट प्रोडक्शन के लिए कुछ पैसों के इंतज़ाम में लगा हूं, वो भी हो ही जाएगा। फिल्म तो अब दिखानी  ही है। बस आप लोगो का साथ चाहिए, विश्वास बनाए रखियेगा। एक नई और सार्थक कहानी ज़रूर लेकर आऊंगा।

Life of an Outcast

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