5 करोड़ से ज़्यादा मरीज़ों के साथ डिप्रेशन भारत के लिए है एक बड़ी चुनौती

Posted by Gaurav Raj in #LetsTalk, Hindi, Mental Health, Society
March 30, 2017

अवसाद (डिप्रेशन) भारत और पूरी दुनिया के लिए एक चिंता का विषय है। मन की बात में भी हमारे प्रधानमंत्री ने एक बार इससे ग्रसित लोगों के लिए चिंता दिखाई थी। ये अपने-आप में एक बेहतर क़दम है। लेकिन क्या सिर्फ़ बात करने से इतनी बड़ी चिंता हल हो जायेगी? या फिर ज़रूरत है इसके कुछ पहलुओं पर बहस करने की? ऐसा क्यों है? कितने प्रतिशत लोग इससे पीड़ित है? विषय क्या है? इसके कारण क्या हैं? दुनिया भर के आंकड़े क्या कहते हैं? समाधान क्या है?

अवसाद की दुनिया में कोई मुख्य वजह नहीं है। कई अलग-अलग कारणों से एक अच्छा-भला व्यक्ति, कुछ सवालों के जवाब ढूंढते हुए, अवसाद के अंधेरे कोने में जा पहुंचता है। पारिवारिक कलह, आपसी मतभेद, करियर, नौकरी, रिश्ते, शारीरिक कमज़ोरी, बेरोज़गारी, आशा-निराशा, समाज, कुरीति और उम्मीदों के बोझ के कारणों से अवसाद की स्थिति पैदा हो सकती है। लेकिन एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण है वो है इसके लक्षण की पहचान करना। ज़्यादातर परिस्थिति में अवसाद को परखने में देर हो जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि लोगों को इसके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं होती या फिर वो इसे नज़रंदाज़ करने लगते हैं और गाड़ी छूट जाती है। तो क्या करें?

एक नज़र आंकड़ों पर। हिंदुस्तान टाइम्स में छपी वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन (WHO) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया भर में 322 मिलियन यानि कि लगभग 32 करोड़ लोग, अवसाद से पीड़ित हैं। ये विश्व की कुल आबादी का 4.4% प्रतिशत है। ये समस्या महिलाओं में ज़्यादा (5.1%) है और 3.6 % पुरुष इससे ग्रसित हैं। भारत में लगभग 57 मिलियन यानी कि 5 करोड़ 70 लाख लोग अवसाद से पीड़ित हैं। इनमें 3.8 करोड़ लोग ‘एंग्ज़ाइटी’, यानी कि बेचैनी से पीड़ित हैं। रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में हर 45 सेकंड में डिप्रेशन से एक मौत होती है। सालाना, उपचार के आभाव में 7,88,000 लोग आत्महत्या करते हैं। चिंता बढ़ा देने वाले इन आंकड़ों से कहीं ज़्यादा चिन्तनीय है इसके उपचार, लक्षण और इलाज के बारे में जानकारी न होना या इस पर परिवार के बीच बात न होना।

सबसे पहले तो आपको ये समझना है कि अवसाद एक बीमारी है, ठीक वैसे ही जैसे टीबी, मधुमेह, आदि। तो इसका मतलब ये कि इसका इलाज है। जैसा मैंने पहले कहा कि अवसाद के कोई मुख्य कारण नहीं होते। ये कई कारणों से पनपते हैं। जैसे हमारे दिमाग में रसायन ऊंच-नीच के कारण, कोई पुरानी बीमारी के कारण, ज़्यादा चिन्ता करने, दुःख, विपरीत परिस्थति और पैसे की तंगी आदि। ये तमाम चीज़ें एक इंसान को बीमार कर सकती हैं। युवाओं में अपने पार्टनर से रिश्ते की टूटने की वजह से अवसाद होता है, ये एक सबसे आम कारण है जो समय के साथ ठीक हो जाता। धैर्यपूर्वक अगर वो इसे समझें तो इससे पार पाना मुश्किल नहीं है।

इसे परखने के और भी कई उपाय हैं। अगर आप बार-बार किसी एक मुद्दे को लेकर अपने विचारों को बदल रहे हैं तो कहीं न कहीं अवसाद की तरफ बढ़ रहे हैं। अगर आप किसी के साथ रिलेशन में हैं और अचानक आपको उसपे प्यार आता है, फिर अचानक उसी व्यक्ति को आप नापसन्द करने लगते हैं तो आप अवसाद की तरफ बढ़ रहे हैं। अकेले होने पर आप अपने करियर को लेकर चिंतित होते हैं, ख़ुद को प्रेरित करते हैं कि प्रशासनिक सेवा में उत्तीर्ण हो जाएंगे, फिर अचानक आपको ये सब बेकार लगने लगता है तो आप अवसाद के काफ़ी नज़दीक हैं।

लंबे समय तक अपने दोस्तों से नहीं मिलना और उनको नज़रंदाज़ करना आपको अवसाद से ग्रसित करता रहेगा। ख़ुद की परेशानियों को ख़ुद तक रखना आपकी इस परिस्थिति को और गहरा करता जाएगा। बेरोज़गारी के बारे में सोचते-सोचते लोग डिप्रेस हो सकते हैं। टूटे हुए रिश्ते को दोबारा जोड़ने की जिद्द आपको कमज़ोर करती रहेगी। आप ज़िंदगी की रेस में पीछे छूटते रहेंगे। आपके साथ वाले आगे निकल जाते हैं, आप तब भी अपनी किसी परेशानी का रोना रो रहे होंगे। ऐसा मत कीजिये…

ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है इसे व्यर्थ न गवाएं, इसके उपाय मौजूद हैं। इसके बारे में बात करने से लोग क्या कहेंगे, ये सोचने में समय न गवाएं। अपने परिवार के लोगों को अपनी मनोस्थिति के बारे में बताएं। ऐसा नहीं करने आप ख़ुद को और संकट में डाल रहे हैं। ख़ुद को समाज व दोस्तों से अलग न करें। आईसोलेट रहकर समाधान निकालने में बहुत लंबा वक़्त निकल सकता है। अपनी ऊर्जा को व्यर्थ न जाने दें, इसे सही दिशा में इस्तेमाल करें, मैडिटेशन करें। ये सबसे कारगर माना जाता है।

दुनिया में ‘एंटी-डिप्रेस्सन्ट पिल्स’ की बढ़ती मांग इस बात का संकेत है कि हर मिनट, हर सेकंड डिप्रेस लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है। 2013 से 2016 के बीच इन दवाइयों का कारोबार 750 करोड़ से बढ़कर 1093 करोड़ हो गया है। सिर्फ़ 3 सालों में कुल 30% की ये बढ़ोतरी एक ख़तरे की घंटी है। भारत में 15-29 के उम्र के बीच वाले युवा सबसे अधिक आत्महत्या करते हैं या कोशिश करते हैं।

हमारा देश युवाओं का देश कहा जाता है। अगर इतनी बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़ेंगे तो राष्ट्र के लिए ये एक सबसे गंभीर समस्या है। आज अपने आस-पास हम ऐसे लोगों से मिलते तो हैं कहीं न कहीं उन्हें गंभीरतापूर्वक नहीं लेते। समय है उनको उनकी बीमारी से बाहर निकालने की, उनसे बात करने की। लेकिन सबसे पहले पीड़ितों को ख़ुद आगे आना होगा और इस प्रयास में परिवार और दोस्तों का सहयोग सर्वोपरि है। ये देश अपने प्रतिभावान युवाओं का भविष्य यूं बिगड़ते नहीं देख सकता। इसका इलाज आसान है, संभव है और बेहद कम ख़र्चीला है।

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