आखिर क्यों आज राजनीतिक व्यवस्था फर्श पर हैं ?

Posted by हरबंश सिंह
March 29, 2017

Self-Published

मेरा स्कूल, एक सामान्य स्कूल ही था, आम स्कूल की तरह यहाँ घंटी की आवाज अपने समय के अनुसार ही बज जाती थी और अगर इसमें कुछ पल की भी देरी हो जाये तो हम सब बच्चो की बैचैनी आखरी हद तक बढ़ जाती थी लेकिन ऐसा अक्सर नही होता था, मसलन समाज-विधा के विषय में जब-जब इतिहास का जिक्र आता और हमारे यादव सर, यहाँ पाठ को पढ़ाने के साथ-साथ इसकी लोह में अपने आप को और हमें इस तरह बाँध लेते की घंटी के बजने की आवाज को भी अनसुना कर देते थे. इसके दो पहलू थे एक जो प्रवक्ता बोल रहा हैं उन की विषय के साथ इमानदारी कितनी हैं और वह जिस घटना या व्यक्ति विशेष के बारे में बात कर रहा हैं, उसका किरदार कितना बड़ा हैं.

अक्सर, चंद्र शेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, इत्यादि वतन पर मर मिटने वालों की गाथा, एक किरदार को जन्म देती थी, यहाँ नाम अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन किरदार जो की व्यक्ति की मानसिकता को दर्शाता हैं वह एक ही तरह का था और सही मायनो  में इतना महान था की इसे सलाम किया जा सकता हैं. यहाँ अपने कर्तव्य के लिये इमानदारी से बलिदान के लिये तैयार होना, अपने-अपने संगठन के साथ बिना किसी निजी स्वार्थ के जुड़े होना और सबसे विशेष, अपनी व्यक्तिगत ईर्षा, क्रोध, को त्याग कर उस हर जवाबदेही को समर्पित होना जिस से वतन की आजादी के लक्ष को प्राप्त किया जा सके.

यहाँ, भी दो व्यक्ति विशेष के विचारों के दरम्यान फासले होंगे, कई ऐसे मसले होंगे जहाँ एक आम राय बन नी मुश्किल होगी, इन सब के बीच इन घटनाओं का इतिहास में कही भी जिक्र तक नहीं आता यहाँ इतिहास के पन्नों पर बस सिर्फ बलिदान की ही मोहर लगी हैं. सार्वजनिक कलह,किरदार और नैतिकता के कद को छोटा कर देती हैं. और इस तरह की मुश्किल को दरकिनार करना, ये इसलिये मुमकिन हो सका की देश की आजादी में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने वाले योद्धा में नैतिकता कूट-कुर कर भरी थी और यही सबक था की इनका किरदार आसमान से भी बड़ा  था, जहाँ तल्ख़ का कोई स्थान नहीं था. लेकिन आज एक आम भारतीय का राजनैतिक व्यवस्था से जिस तरह विशवास उठता जा रहा हैं, वह हर मोड़ पर व्यवस्था से एक दूरी बनाये रखने के लिये मजबूर हैं इसका सबसे बढ़ा कारण राजनैतिक व्यवस्था के शीर्ष की नैतिकता और किरदार हैं जहाँ आज एक आम भारतीय इनसे ईमानदारी की उम्मीद करना भी बेईमानी समझता हैं, लेकिन ऐसा क्यों हैं ?

अगर यहाँ थोड़ा सा विश्लेषण किया जाये तो राजनीति की आधार शीला समाज का ही प्रतिबिंब हैं और हमारे व्यक्तिगत किरदार से समाज की रचना होती हैं, मतलब राजनीति व्यवस्था का गिरता हुआ आचरण कही ना कही हमारी ही मानसिकता का उदाहरण हैं. मसलन, आज बचपन मोबाइल फ़ोन पर अक्सर विडियो गेम खेलता हुआ नजर आता हैं जहाँ इसकी जीत एक जशन का परिचय देती हैं वही इसकी हार एक घोर निराशा का, ये तथ्य इतना सच हैं की आज का बचपन हर कीमत पर विजयी होना चाहता हैं. आज चाहे फिर मैट्रो को पकड़ने की हड़बड़ी हो या सडक पर गाड़ी को आगे निकाल कर लेकर जाने की, जीवन के हर मोड़ पर हम विजयी होना चाहते हैं. आज हमारे व्यक्तिगत स्वभाव में हार मंजूर नही, फिर वह चाहे सोशल मीडिया पर ही खुद को आगे दिखाने की होड़ ही  क्यों ना हो. अब इस जीत के लिये, समझौते भी होते हैं, मैट्रो को पकड़ने की दोड में अक्सर किसी को पीछे धकेलना भी जरूरी समझा जाता और गाड़ी को तेज निकालने के चक्कर में सड़क के नियम कानून को ताक पर रख दिया  जाते हैं, कही-कही तो इस जुनून में जिंदगी को भी खतरे में डाल देना एक शोक के रूप में दर्शाया जाता हैं. आज हमारे समाज में विजय को ही मान्यता प्राप्त हैं जिसकी आड़ में भ्रष्टाचार, नैतिकता, किरदार, इत्यादि शब्दों को कोई अर्थ नही रह जाता.

जब, हमारे लिये विजय / जीत ही एक मक़सद हैं तो हमारी राजनीति व्यवस्था किस तरह इस से अछूत रह सकती हैं, यहाँ भी लोकतंत्र प्रणाली के दायरे में हो रहे चुनाव को जीतना ही एक निशाना  होता हैं, उसके लिये  राजनीति अपना आचरण, सहनशीलता, नैतिकता, इमानदारी, इत्यादि किताबी शब्दों को भूल कर पूरी इमानदारी से इस होड़ में लग जाती हैं, यहाँ चुनावी भाषण विकास से शुरू होता हैं लेकिन अगर जरा सी भी शंका हो गयी की इस बार विकास से जीत दर्ज नहीं की जा सकती तो इन्ही  चुनावी भाषण से हम और वह कहकर समाज को बांटने की कवायद शुरू करने में कोताही नहीं बरती जाती. यहाँ हम का मतलब सर्वोच्च, इमानदार, परिपूर्ण, इत्यादि  और वह का अनुमान तुच्छ, बेईमान, इत्यादि जहाँ इस तरह का किरदार ईर्षा को दर्शाता हैं वही अहंकार को जन्म देता हैं,  ये, हम और वह, की दहलीज़ हर राजनीति पार्टी / व्यक्ति  पार करता हैं कही शब्दों में उग्रता होती हैं और कही इन शब्दों को भावात्मक रूप से कहा जाता हैं. यहाँ, उम्मीदवार के रूप में हर उस चेहरे से परेशानी होती हैं जो हैं तो इमानदार लेकिन वोट नहीं जुटा सकता और वही हर उस शख़्स को आखो पर बैठाया जाता हैं जो वोट बैंक पर असर रखता हैं और जीत को निश्चित करता हैं. यहाँ, जीत के लिये हर तरह के मापदंड अपनाये जाते हैं. ये कहना गलत नही होगा की आज राजनीतिक जीत, महज़ एक विजय ना होकर जुनून बन गया हैं तो गलत नही होगा.

समाज वही हैं बस इसके समीकरण बदल गये हैं जहाँ एक सदी पहले इसी समाज ने भगत सिंह जैसे किरदार की रचना कर, विजयी होने का सम्मान प्राप्त किया था जहाँ व्यक्तिगत प्रमाण में नैतिकता, ईमान, किरदार की रचना पहले होती थी और बाद में विजयी होने का दम भरा जाता था, वही आज इसी समाज में विजयी होने का महत्व बढ़ गया हैं. इस समय में, अक्सर हर व्यक्तिगत किरदार पहले निशाना फ़तह करने की मंशा रखता हैं और इसका यकीन हैं की विजयी होने के बाद नैतिकता, ईमान, इत्यादि शब्द अपने-आप इसके किरदार में तगमै की तरह जड़ दिये जायेगे. व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना हैं की हमारा व्यक्तिगत किरदार ही समाज की रचना करता हैं और यही राजनीति व्यवस्था को जन्म देता हैं, अब सवाल भी हमें खुद से ही होना चाहिये की जहाँ भगत सिंह के किरदार को हम इच्छा से सलाम करते हैं वही ऐसा क्या हो गया की आज राजनीतिक व्यवस्था फर्श पर एक तमाशा बन कर रह गयी हैं, कही इसके लिये हमारा व्यक्तिगत किरदार तो जवाबदार नहीं.  धन्यवाद.

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