आत्महत्या करने पर उतारू जनसत्ता

Self-Published

हिंदी के प्रतिष्ठित अखबार जनसत्ता के कारनामे…
जनसत्ता कभी सिविल सेवा की तैयारी करने वालों का सबसे प्रिय अखबार होता था मगर पिछले कुछ सालों में जिस तरह से इसने अपनी भद्द पिटवाई है वह अचंभित करने वाली है। जनसत्ता में आई यह गिरावट मीडिया के छात्रों के बीच भी अक्सर चर्चा में रहती है। हम लोग जब आईआईएमसी में थे तो अक्सर जनसत्ता को देखकर माथा पिट लेते थे और चर्चा में यह समझ नहीं पाते थे कि यह इंडियन एक्सप्रेस को ही फॉलो क्यों नहीं करता है। अगर यह केवल इंडियन एक्सप्रेस को कॉपी-पेस्ट करने लगे तो इसका उद्धार हो जाए। क्योंकि यह जिस समूह का हिस्सा है वह अपनी एक्सक्लूसिव खबरों के लिए मिसाल बना रहता है। वैसे तो आजकल सभी हिंदी के अखबार एजेंसी की खबरों के ट्रांसलेशन ज्यादा कुछ नहीं करते मगर जनसत्ता पढ़कर ऐसा लगता है वहां संपादक नाम का कोई पद ही नहीं है। बस कुछ ट्रेनी पत्रकारों को रखकर खबरें छपवाने का काम किया जा रहा है। बाकी के अखबार खबरों को ट्रांसलेट तो करते हैं मगर उसमें अपने हिसाब से जरूरी बदलाव भी करते हैं।
अब नीचे दी गई तस्वीरों को ही देखिए…इसमें सबसे ऊपर जनसत्ता की कटिंग है और उसके बाद यह जिस समूह का हिस्सा है यानि इंडियन एक्सप्रेस की कटिंग है और फिर अमर उजाला की कटिंग है जिसे मैंने बनाया था। जब पीटीआई की पहली कॉपी आई तो उसकी हेडिंग में 721 ही लिखा हुआ था मगर नीचे पूरी खबर में 271 ही लिखा था। मैंने जैसे ही इसे देखा तुरंत जाकर कई अन्य साइटों से इसके 271 होने की पुष्टि की और 271 लिखते हुए ही खबर बनाई। हालांकि आधे-एक घंटे बाद पीटीआई की संशोधित कॉपी आ गई जिसमें हेडिंग में बदलाव कर 271 किया गया था। अब यह समझ में नहीं आ रहा है जनसत्ता जैसा नामी अखबार जिस खबर को पहले पेज पर लगा रहा है उसकी सही से जांच भी नहीं कर पाता है। वैसे तो यह खबर कहीं से भी पहले पेज लायक ही नहीं है उसके ऊपर से जनसत्ता ने इसे बाई लाईन के साथ छापकर और बड़ा कारनामा कर दिया है। एक बात और नहीं समझ में आती है कि आखिर एक्सप्रेस समूह जनसत्ता के साथ ऐसा कर क्यों रहा है? एक प्रतिष्ठित हिंंदी अखबार द्वारा इस तरह से आत्महत्या करना कई बड़े सवाल पैदा करता है जिसका जवाब सिर्फ एक्सप्रेस समूह ही दे सकता है।
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